मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Sunday, 12 October 2014

कैप्टेन अब्बास अली

                                                                  देश की राजनीति किस तरह से करवटें बदलती है कि उसके पास अपने अतीत से जुड़े हुए लोगों के निधन पर दो शब्द कहने का समय भी नहीं हुआ करता है यह कैप्टेन अब्बास अली के देहांत पर स्पष्ट रूप से देखने को मिला. ३ जनवरी १९२० को बुलंदशहर ज़िले की खुर्जा तहसील के कलन्दरगढी गाँव में मुस्लिम राजपूत परिवार में जन्मे अब्बास अली बचपन से ही भगत सिंह से प्रभावित थे और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में गरम दल का समर्थन करने वाले क्रांतिकारियों में से एक थे. अलीगढ़ में अपनी पढाई के दौरान ही वे आल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन के सदस्य बन गए पर उनके दिमाग में अंग्रेज़ो की सेना में भर्ती होकर विद्रोह करने का जज़्बा सदैव ही बना रहा जिससे प्रेरित होकर उन्होंने सेना में जाना स्वीकार किया तथा १९३९ से १९४५ के दौरान चले द्वितीय विश्व युद्ध में कई मोर्चों पर उन्होंने संयुक्त भारत और पूर्व एशिया में कमान भी संभाली. १९४५ में नेताजी सुभाष चंद बोस के आह्वाहन पर उन्होंने सेना की नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और आज़ाद हिन्द सेना के लिए काम करने लगे.
                                                                आज़ादी के बाद उन्होंने सोशलिस्ट आंदोलन की राह पकड़ी जिस कारण से उन्हें पचास से अधिक बार जेल भी जाना पड़ा. आज देश के स्थापित राजनेताओं को सोशलिस्ट आंदोलन और जनता पार्टी के समय में उन्होंने राजनीति का ककहरा सिखाया था जिसके दम पर मुलायम सिंह जैसे समाजवादी नेता आज इस मुकाम तक पहुंचे हुए हैं. समाजवाद के पुरोधा के रूप में उनके संघर्ष को लोहिया और जेपी से कम भी नहीं माना जा सकता है क्योंकि उन्होंने जिस तरह से ज़मीनी परिस्थितियों को संभाला था वैसे उदाहरण कम ही देखने को मिलते हैं जिस टिकट पर मुलायम सिंह यादव ने यूपी विधान सभा का पहली बार सामना किया था वह भी उन्हें अब्बास अली के हाथों ही मिला था. इतने बड़े कद के जुझारू नेता के निधन पर देश के समाचार तंत्र में उनके बारे में नाममात्र की ख़बरें भी प्रसारित नहीं होने से यही पता चलता है कि आज हम अपने अतीत को कैसे भूलते जा रहे हैं.
                                                             यह विडम्बना ही है कि उनके निधन पर यूपी सरकार की तरफ से भी केवल औपचारिकता ही निभायी गयी है और केंद्र सरकार ने तो इसकी भी आवश्यकता नहीं समझी क्योंकि संभवतः वे उस विचारधारा का समर्थन नहीं किया करते थे जिस पर आज की सरकार चल रही है. देश के लिए इतना योगदान करने वाले किसी व्यक्ति के निधन पर भी इस तरह से अनजान बने रहना क्या प्रदर्शित करता है यह समझ से बाहर ही है पीएम खुद सोशल मीडिया पर इतने एक्टिव दिखाई देते हैं तो उनकी तरफ से इस बारे में एक ट्वीट या पोस्ट की आशा तो देश करता ही है. संभवतः आज वे गैर भाजपाई दलों के उन नेताओं पर अपना अधिकार ज़माने में लगे हुए हैं जिनका उन पर कोई प्रभाव नहीं था तो कल जेपी को भुनाने के चक्कर में उनके सहयोगी रहे अब्बास अली के निधन पर कौन संवेदना जताता ? इस मुद्दे पर कांग्रेस की तरफ से भी संवेदना के दो शब्दों की स्पष्ट कमी दिखाई दी जबकि देश में इस तरह की विभाजनकारी राजनीति का कोई स्थान नहीं होना चाहिए पर आज यह सब हो रहा है जिससे देश में राजनैतिक और सामाजिक आधार पर अलगाव दिखाई दे रहा है मोदी को इस मामले में गंभीरता दिखानी चाहिए और देश के उन सपूतों के प्रति अपनी न्यूनतम संवेदना प्रदर्शित करनी चाहिए जिसकी देश उनसे पीएम के रूप आशा करता है.     
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