मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Tuesday, 18 November 2014

ऑस्ट्रेलिया-भारत और यूरेनियम

                                                   पीएम मोदी की ऑस्ट्रेलिया यात्रा के दौरान जारी किये गए संयुक्त बयान में जिस तरह से भारत को यूरेनियम आपूर्ति के मामले पर प्रगति दिखाई देने लगी है वह अपने आप में महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका के साथ २००८ में हुए १२३ समझौते के बाद जिस तरह से अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने भारत की आतंरिक राजनैतिक परिस्थितियों को देखते हुए समझौते करने में हिचकिचाहट दिखाई थी अब नीतिगत मुद्दों पर भाजपा द्वारा यूपीए की नीतियों के खुले और ज़ोरदार समर्थन से परिस्थितियां बदलती नज़र आने लगी हैं. देश की ऊर्जा आवश्यकताओं के परमाणु ऊर्जा के भरपूर दोहन और ईंधन के प्रबंधन से जुडी बहुत सारी समस्याओं के चलते आज भी केवल हमारे विश्वसनीय सहयोगी रूस को छोड़कर किसी भी अन्य देश के साथ इस दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति नहीं हो पायी थी. रूस हमारा आज़ादी के बाद से ही स्वाभाविक और पुराना सहयोगी रहा है इसलिए उसके साथ सम्बन्ध अंतरराष्ट्रीय मामलों से अछूते ही रहा करते हैं.
                                                 देश में मई में नयी सरकार के सत्ता सँभालने के बाद से ही जिस तरह से नीतिगत मुद्दों पर पीएम मोदी ने संघ, भाजपा और स्वदेशी जागरण मंच के एजेंडे को किनारे करते हुए मनमोहन सिंह की टीम की नीतियों को देश हित में तेज़ी से आगे बढ़ने का फैसला किया है उसी का नतीजा यह है कि उन्हें विश्व भर में सबसे तेज़ निर्णय लेने वाले सौ लोगों में शीर्ष पर रखा गया है. इस सारी कवायद में देश का भाजपा के पुराने नेतृत्व के चलते जो नुकसान हुआ है उसकी भरपाई तो असंभव ही है पर यदि आज भी उन नीतियों के मामले में देश से वैश्विक स्तर पर एक ही स्वर सुनाई दे तो आर्थिक रफ़्तार अपने आप ही तेज़ हो सकती है. देश चलाने के लिए जिस तरह पिछली सरकारों के साथ मोदी सरकार को भी इस बात का एहसास है कि ऊर्जा आवश्यकताओं में स्थिरता और सतत विकास के साथ ही भारत की आर्थिक स्थिति को और भी मज़बूत बनाये रखा जा सकता है और इस दिशा में काम करने की ज़रुरत भी है.
                                               इस क्षेत्र में किसी भी तरह की समय सीमा के साथ काम कर पाना लगभग असंभव ही होता है क्योंकि भारत की तरह अन्य देशों में विकास के नाम पर भी राजनीति नहीं की जाती है और वहां पर देश से सम्बंधित मामलों में पूरे देश के राजनैतिक तंत्र की सक्रिय भागीदारी होती है जबकि भारत में केवल सत्ताधारी दल ही इस तरह की कोशिशें किया करता है और मज़बूत या कमज़ोर विपक्ष हर स्तर पर उसका बिना कुछ सोचे विरोध ही किया करता है. आज यदि नीतियों के मुद्दे पर मोदी का स्वागत किया जा रहा है तो वह उनकी व्यक्तिगत सोच से अधिक भारत के बदलते स्वरुप का परिचायक ही है क्योंकि अभी भी अधिकांश देशों को यही लगता है कि भाजपा कांग्रेस से आर्थिक मुद्दों पर बहुत मतभिन्नता रखती है. मोदी द्वारा मनमोहन की नीतियों को पूरी तरह से आगे बढ़ाने के बाद विश्व भर में यह सन्देश भी चला गया है कि अब भाजपा की नीतियां भी कांग्रेस से भिन्न नहीं हैं जिसका भरपूर दोहन करने का समय अब आ गया है.    
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