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Friday, 26 December 2014

रेल निजीकरण - पीएम का स्पष्टीकरण

                                                         अपनी एक दिवसीय वाराणसी यात्रा के दौरान पीएम नरेंद्र मोदी ने डीएलडब्लू परिसर में अत्याधुनिक डुएल एसी चैम्बर वाले रेल इंजन के लोकार्पण के बाद यह स्पष्ट किया कि सरकार का रेलवे के निजीकरण का कोई इरादा नहीं है उससे यही लगता है कि चुनावों में रेल को भारत की अर्थव्यवस्था पर बोझ मानने वाले पीएम ने अब यह मान लिया है कि इस संस्थान का पूरी तरह से निजीकरण नहीं किया जा सकता है और देश के हित में इसका वर्तमान स्वरुप में ही उपयोग किया जाने वाला है. रेल का निजीकरण स्पष्ट रूप से मोदी के उन सपनों में से एक रहा है जिसको लेकर वे पिछली सरकार पर हमलावर रहा करते थे और साथ ही इसके बेहतर परिचालन के लिए इसके निजीकरण की वकालत भी किया करते थे पर अब मंत्रालय के कामकाज और इससे जुडी हुई संभावनाओं को देखने के बाद संभवतः उनके मन में इसे सरकारी उपक्रम के रूप में चलते रहने का विचार ही फिर से आ गया है जो कि रेल के लिए अच्छा कदम भी साबित होने वाला है.
                                    रेलवे ने जिन क्षेत्रों को निजीकरण के माध्यम से अभी तक खोला है उसका कितना असर पड़ा है यह उसे अच्छे से पता है और संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल के लिए पूरी तरह से निजीकरण के स्थान पर पीपीपी का मॉडल भी अपनाया जा सकता है. रेलवे के पास संसाधनों की कमी के कारण ही उसके नेटवर्क का बेहतर उपयोग नहीं हो पा रहा है इसलिए सबसे पहले संसाधनों को मांग के अनुसार किये जाने की ज़रुरत है जिससे वर्तमान में ही रेलवे अपनी आमदनी को इसी ढांचे में बढ़ाने की तरफ जा सके. अंतर्राष्ट्रीय स्तर की बड़ी परियोजनाओं के माध्यम से रेल कॉरिडोर आदि बनाये जाने की शुरुवात तो अभी की ही जा सकती है पर इसके साथ ही रेल के वर्तमान ढांचे के बेहतर दोहन के लिए भी सही दिशा में सोचने की आवश्यकता भी है. रेल अपने आप में बहुत बड़ा संस्थान तो है साथ ही इस पर आज़ादी के बाद से ही जनता के लिए काम करने का दबाव भी है जिसके चलते ही साधारण किराये सदैव ही राजनीति का शिकार रहा करते हैं और रेलवे को संसाधनों के लिए सरकार का मुंह ताकना पड़ता है.
                                   किराया प्राधिकरण की शुरुवात से जहाँ रेलवे के किराये को आने वाले वर्षों में तर्क संगत बनाया जा सकेगा वहीं उसके लिए न्यूनतम परिचालन के खर्चे को निकालना भी आसान हो जायेगा. २४ घंटे काम करने वाले संस्थान होने के कारण रेलवे के पास बहुत अधिक मानव शक्ति रखना एक मजबूरी है क्योंकि उसके बिना इसे सही तरह से नहीं चलाया जा सकता है पर अब परिचालन से जुडी समस्याओं को नए सिरे से खोजने और उन पर अमल किये जाने के बिना रेलवे अपने आप ही पिछड़ सकती है. अधिक आबादी वाले राज्यों में कम दूरी की यात्री गाड़ियों में अविलम्ब डिब्बे बढाए जाने के बारे में रेलवे को सोचना ही होगा तभी वह इन मार्गों पर अपनी कमाई को बढ़ा सकती है. आज भी कई रेलगाड़ियों में पांच डिब्बे ही लगाये जा रहे हैं जबकि उन मार्गों पर यात्रिओं की संख्या बहुत अधिक हो चुकी है तो इस समस्या से निपटने के लिए अब नए सिरे से सोचने की ज़रुरत है और लम्बी दूरी की यात्रा के लिए निरस्त किये गए डिब्बों को इन छोटी दूरी की गाड़ियों में लगाये जाने की एक नयी नीति पर फिर से काम करने की आवश्यकता भी है. पीएम ने जिस तरह से इस मामले को रेल कर्मियों के सामने स्पष्ट किया है तो अब रेल कर्मियों का भी उत्तरदायित्व है कि वे रेल को घाटे में जाने से रोकने के लिए समुचित प्रयास करें.    
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