मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Saturday, 25 April 2015

एनजीओ - फंडिंग पर टकराव

                                                      ग्रीन पीस और फोर्ड फाउंडेशन पर भारत सरकार द्वारा की गयी कार्यवाही के बाद इस बात की आशंका पहले से ही थी कि इस मामले में कहीं न कहीं से अमेरिकी सरकार भी पूरी तरह से दखल दे सकती है क्योंकि इन दोनों संगठनों के अतिरिक्त भी बहुत से अन्य संगठनों के माध्यम से अमेरिका भारत में बहुत सारे सामाजिक और रचनात्मक काम किया करता है जिनको अमेरिका और ये सगठन समाज के उत्थान के लिए किये गए प्रयास बताते हैं जबकि संघ की नीतियों से संचालित भाजपा को शुरू से ही अमेरिका के इस तरह के संगठनों से समस्या रहा करती है. ऐसा भी नहीं है कि इस क्षेत्र में काम कर रहे सभी संगठन बहुत ईमानदारी से काम कर रहे हैं पर इस तरह से वर्षों से सामाजिक कार्यों में लगे हुए इन सगठनों पर इस तरह से प्रतिबन्ध लगा देना भी उस भारतीय मंशा और परंपरा के अनुरूप नहीं कहा जा सकता है जिसको पूरी दुनिया जानती है. इस मामले में भाजपा का बैर अनायास ही गुजरात से ही जुड़ जाता है जिसमें सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में तीस्ता सीतलवाड पर कई तरह के आरोप लगे हैं और उन पर कई तरह के मुक़दमे भी चल रहे हैं पर किसी एक मामले को लेकर पूरे परिदृश्य पर एक जैसी नज़रें रखने से देश में अन्य सामाजिक क्षेत्रों में इन संगठनों के माध्यम से चलने वाले कार्यों पर भी विपरीत असर पड़ने की पूरी संभावनाएं भी हैं.
                                          मोदी सरकार के लिए इस तरह की परिस्थिति इसलिए भी और विषम हो जाती है क्योंकि भले ही गुजरात से जुड़े मामलों में मोदी को क्लीन चिट मिल चुकी हो पर दुनिया में आज भी बहुत सारे देश और संगठन ऐसे भी हैं जो उन्हें अभी भी दोषी ही मानते हैं जिस कारण से भी सरकार के इस तरह के क़दमों को देश की सुरक्षा और सामाजिक ताने बाने को खतरा मानने वाले कम ही लोग हैं उनको यह सब बदले की कार्यवाही अधिक लगती है. फोर्ड फाउंडेशन अपन हिसाब से चलता है और अब जब अमेरिका की सरकार भी उसके मामले में भारत से स्पष्टीकरण मांगने की तरफ बढ़ चुकी है तो मोदी सरकार के लिए काम करना उतना आसान भी नहीं रहने वाला है. ग्रीन पीस के बारे में पूरी दुनिया जानती है कि विकास की आधुनिक अवधारणा में उसकी पर्यावरण को बचाने की ज़िद के चलते उसे खुद अमेरिका में भी कई बार कडा विरोध झेलना पड़ता है मोदी सरकार जिस तरह से देश में औद्योगिक गतिविधियों को बढ़ाने के लिए काम करने में लगी हुई है उसमें उसकी पर्यावरण चिंताएं प्राथमिकता में रखने की ख़बरें सामने आ रही हैं. भारत जैसे विकासशील और औद्योगिक क्रांति से बचे हुए देश के लिए आने वाले दशक में क्या नीतियां बनेंगीं और उन पर कितना क्रियान्वयन किया जा सकेगा यह देखने का विषय होगा.
                                         भारत सरकार के इस तरह के एक जैसे कदम उठाये जाने से जहाँ आने वाले समय में उस पर कानून के बहाने सामाजिक संगठनों पर प्रतिबन्ध लगाये जाने की कोशिशों का देश में कम पर विदेशों में अधिक विरोध होने की सम्भावना है क्योंकि फोर्ड फाउंडेशन तो इस सबसे दूर है पर ग्रीन पीस के कार्यकर्ता लगभग हर देश में हैं और इस पर भारत सरकार के तरह के प्रतिबन्ध के बाद इस बात की संभावनाएं भी हैं जिनमें आने वाले समय में किसी भी विदेश यात्रा पर भारतीय पीएम का इन कार्यकर्ताओं द्वारा विरोध भी किया जाने लगे ? संघ परिवार का अधिकांश विदेशी संगठनों पर यही आरोप रहा है कि वे सामाजिक कार्यों के बहाने समाज का कमज़ोर वर्गों में धर्मपरिवर्तन करने की कोशिशें करने में लगे हुए हैं और काफी हद तक भाजपा भी इसे चुनावी मुद्दा बनती रही है अब इस तरह के सामाजिक कार्यों में इस तरह के विवादों के सामने आने पर भारत सरकार को यह सिद्ध भी करना होगा कि उनकी आशंकाएं सही हैं क्योंकि केवल प्रतिबन्ध किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकता है और पूरे विश्व में भारत की स्वीकार्य छवि के स्थान पर इस तरह की नयी तानाशाही छवि बनाये जाने से भी सरकार को पूरी तरह से बचने की आवश्यकता भी महसूस की जा रही है. 
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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