मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Monday, 9 November 2015

बिहार परिणाम और भविष्य

                                                          राजनैतिक रूप से भाजपा के लिए लोकसभा चुनावों के बाद दिल्ली और बिहार से जिस तरह से जनता की तरफ से सन्देश आने शुरू हुए हैं तो अब समय आ गया है कि वह उनका सही स्तर पर विश्लेषण करे और जिन कारणों से चुनावों में उसे सर्वाधिक मत प्रतिशत मिलने के बाद भी बहुत कम सीटों से सन्तोष करना पड़ा है अब उस पर भी ध्यान दिए जाने की ज़रुरत है. भाजपा के लिए ऐसा क्यों हुआ या क्या गलतियां हुईं इस पर सभी स्तरों पर विमर्श चलता ही रहने वाला है पर अब संभवतः पीएम मोदी के लिए जनता की तरफ से स्पष्ट सन्देश भी आ चुका है कि सोशल मीडिया पर ट्रेंड चलने और गंवाई गाँव में उनके वोटों में परिवर्तित होने में बहुत बड़ा अंतर होता है. लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के दस सालों के शासन और उनकी तरफ से अनमने ढंग से चुनाव लड़े जाने के चलते भी बेहतर विकल्प के रूप में मोदी के होने से जनता ने उन्हें सत्ता दी थी पर चुनाव में बहुत अच्छी सफलता मिलने के बाद भी उन्होंने जिस तरह से पार्टी और उससे जुड़े हुए वैचारिक संगठनों के लोगों को कुछ भी बोलने से नहीं रोका संभवतः इस बार उन्हें उसी का खामियाज़ा भुगतना पड़ा है.
                        नितीश के लिए इस बार अपनी सत्ता को अच्छे से चलाये जाने के लिए लालू प्रसाद की बहुत आवश्यकता पड़ने वाली है और इस स्थिति में जब बेहतर शासन ही एक बाद मुद्दा बन चुका है तो उस परिस्थिति में लालू जैसे नेता को भी यह पता है कि बेटों के लिए अच्छे अवसर उत्पन्न होने तक उन्हें किस तरह से व्यवहार करना है. आज की परिस्थिति में जब कानूनी बाध्यताओं के चलते लालू चुनावी राजनीति से बाहर ही किये जा चुके हैं तो उनकी यह बात समझ में भी आती है और यह उनके बेटों की राजनीति के लिए संभवतः अच्छा भी है कि उन्हें मौका मिलने पर नितीश सरकार में मंत्री बनकर उनके साथ अच्छा कम सीखने का अवसर भी मिलने वाला है. राजनीति में कोई भी विचारधारा कभी भी समाप्त नहीं होती है और २०२० तक पटना में क्या कुछ बदलने वाला है सारा दारोमदार अब इस बात पर ही निर्भर होने वाला है कि लालू अपने बेटों को लेकर व्यावहारिक राजनीति करते हैं या फिर पुत्र प्रेम में कुछ भी करने के बारे में सोचना शुरू कर देते हैं ? समय से पहले कुछ भी करना उनके लिए घातक होने वाला है और लालू इसे बहुत अच्छी तरह से समझते हैं क्योंकि लोकसभा में करारी हार होने के बाद उन्होंने नितीश कुमार के फ़ोन पर जो कदम आगे बढ़ाये थे आज के परिणाम उसी का प्रतिफल हैं.
                   कांग्रेस के पास नब्बे के दशक में सब कुछ खोने के बाद अब पहली बार बिहार में सम्मान जनक सीटें आ पायी हैं तो उसकी ज़िम्मेदारी भी इस गठबंधन में बढ़ ही गयी है अभी तक इस स्थानों पर सरकार को समर्थन देने के बाद उसके हाथ कुछ भी नहीं लगता है क्योंकि सरकार को समर्थन कहीं भी दिया जाये तो समर्थक दल होने के चलते सत्ता की विफलताएं भी साथ ही चलती हैं. अब यदि कांग्रेस बिहार के विकास को लेकर गंभीर है तो उसे अपनी सीटों के अनुपात में मिलने वाले मंत्री पदों को पूरी ज़िम्मेदारी के साथ सम्भालना चाहिए और सरकार के सही गलत फैसलों पर अपनी राय भी देनी चाहिए क्योंकि सरकार के साथ होकर भी सरकार में शामिल न होना किसी भी तरह से लाभदायक नहीं होता है और जब स्पष्ट बहुमत साथ हो तो स्थिरता के बारे में सही कदम भी उठाने चाहिए जिससे राज्य में पार्टी के कैडर का मनोबल भी ऊंचा बना रहे. बिहार की सत्ता में राजनैतिक संख्या के रूप से कमज़ोर वापसी कर रहे नितीश ने यदि सुशासन को अपना एजेंडा बनाये रखने में सफलता पायी और लालू के समर्थकों की अराजकता से बिहार को बचाये रखा तो बिहार के साथ उनकी राजनैतिक पारी को और भी ऊंचाइयां मिल सकती हैं.                    
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