मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Sunday, 20 December 2015

मनरेगा की उपयोगिता

                                                      एक समय देश की ग्रामीण आबादी की आर्थिक स्थिति में नाटकीय परिवर्तन के माध्यम से उनके जीवन स्तर को सुधारने के काम को सफलता पूर्वक आगे बढ़ाने में सफल रही मनरेगा आज केंद्र सरकार के लिए कई तरह के प्रयोगों की कार्यशाला बनी हुई है. भारत की आर्थिक प्रगति में देश के गांवों को जोड़ने और अपनी भागीदारी सुनिश्चित करवाने के उद्देश्य से शुरू हुई मनरेगा एक तरफ तो भाजपा को फूटी आँख नहीं सुहाती थी पर दूसरी तरफ इतनी सावधानी से बनायीं गयी इस योजना का लाभ उठाने में खुद सीएम के रूप में नरेंद्र मोदी, शिवराज सिंह चौहान और रमन सिंह ने महत्वपूर्ण काम भी किया था जिससे इस योजना का इन राज्यों को भरपूर लाभ भी मिला. अब जब रोज़ ही नहीं घोषणाएं कर रही मोदी सरकार के पास फिर से अपनी नयी योजनाओं को सही रूप में धरातल पर उतरने की चुनौती है तो उसे एक समय भ्रष्टाचार का अड्डा लग रही मनरेगा की याद आने लगी है क्योंकि स्वच्छ भारत अभियान के लिए नए सिरे से कुछ भी कर पाना पिछले वर्ष में इस योजना में पलीता लगने जैसा ही साबित हुआ है जिससे सीख लेकर अब मोदी सरकार इसमें मनरेगा के कामगारों को भी जोड़ने की बात सोचने में लगी हुई है.
                             एक सफल योजना के तहत जिस तरह से अब मनरेगा को ही सम्पूर्ण भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में योजनाओं के क्रियान्वयन का प्लेटफार्म माना जा सकता है वह स्वीकार करने में अभी भी मोदी सरकार को राजनैतिक कारणों से कुछ हिचक महसूस हो रही है क्योंकि मनरेगा के साथ जिस तरह से मनमोहन सिंह और कांग्रेस का नाम जुड़ा हुआ है उस परिस्थिति में मोदी सरकार तो इसे समाप्त करने के लिए तैयार बैठी थी पर आर्थिक रूप से संसाधनों को नए सिरे से झोंकने की कोई भी ज़िद सरकार को आर्थिक रूप से भारी भी पड़ सकती है. इस काम के सही क्रियान्वयन के लिए जिस तरह से तमिलनाडु ने कचरा प्रबंधन में मनरेगा मजदूरों का इस्तेमाल शुरू किया और उसके बेहतर परिणाम भी दिए हैं तो केंद्र सरकार आज उसका भी अध्ययन करने में लगी हुई है. इसके अतिरिक्त केंद्र सरकार ममता सरकार की उस पहल का अध्ययन भी कर रही है जिसमें उसने ग्रामीण स्वच्छ्ता के लिए पहले से आये अन्य फंडों का सफलतापूर्वक इस्तेमाल कर स्वच्छता के क्षेत्र में बड़ी पहल कर दी है.
                           राज्यों के पास भी ऐसे अधिकारी और नेता मौजूद हैं जो समय आने पर बेहतर परिणाम देने में सक्षम हैं बस आवश्यकता इस बात की है कि उनको इस तरह से काम करने की प्रायोगिक रूप में छूट भी दी जाये. आज तमिलनाडु मॉडल का स्वच्छता अभियान वाला हिस्सा तेलंगाना और आंध्र प्रदेश की सरकारें अपनाने के लिए राज़ी हो गयी हैं और उनके परिणाम देखकर आने वाले समय में इसे पूरे देश की इच्छुक राज्य सरकारों के साथ मिलकर आगे बढ़ाया भी जा सकता है. केंद्र सरकार को मनरेगा प्रति अपने पूर्वाग्रहों को छोड़कर इसको और भी अधिक सुधार के साथ लागू करने के बारे में सोचना चाहिए क्योंकि किसी भी बड़ी और सामाजिक परिवर्तन करने में सक्षम योजना से सिर्फ इसलिए ही किनारा नहीं कर लिया जाना चाहिए कि वह विपक्षी दल द्वारा बनायीं गयी थी. अच्छा ही कि पूरे देश में हर राज्य सरकार की योजनाओं पर केंद्र नज़र रखे तथा उनमें से जो कुछ भी अच्छा निकल कर सामने आये उसका लाभ देश के हर राज्य तक पहुँचाने की कोशिश भी करे. पिछले कई दशकों के बाद अब जब देश में राजस्व का स्तर बेहतर होता जा रहा है तो आने वाले समय में इसका लाभ उन पिछड़े इलाकों तक सही तरह से पहुंचा कर ही देश को संपन्न और ग्रामीण नागरिकों को भी आर्थिक रूप से मज़बूत किया जा सकता है.  
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