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Saturday, 20 February 2016

आरक्षण का स्वरुप और देश

                                                       हरियाणा में एक बार फिर से जाट समुदाय द्वारा आरक्षण की मांग के समर्थन में जिस तरह से विरोध प्रदर्शन शुरू हुए और खट्टर सरकार की तरफ से इससे निपटने में प्रारंभिक ढिलाई बरतने के बाद भीड़ में शामिल अराजक तत्वों ने जिस तरह से रोहतक में हरियाणा के कैबिनेट मंत्री कै. अभिमन्यु सिंह के घर पर पथराव करके आग लगाने की कोशिश की उससे स्थिति की गंभीरता का अंदाज़ा लगाया जा सकता है. आमतौर पर शांतिपूर्वक शुरू किये गए किसी भी अभियान पर सरकार की बेरुखी के चलते ही कुछ लोग इस तरह की अराजकता का सहारा लेना शुरू कर देते हैं जिससे आने वाले समय में उनकी बात सुनी जा सके पर इससे अंत में जनता के धन से इकठ्ठा किये गए संसाधनों के अलावा व्यक्तिगत संसाधनों को भी बड़े पैमाने पर नुकसान होता है. देश में किसी भी तरह के आंदोलन से निपटने के लिए सरकार के पास क्या विकल्प होते हैं यह सोचने और समझने का विषय है पर घटनाओं को अपने आप घटने देने की नीति से देश का कभी भी भला नहीं हो सकता है. आज पूरे देश में आर्थिक रूप से संपन्न जातियों और समुदायों द्वारा जिस तरह से आरक्षण माँगा जाने लगा है उससे यही लगता है कि अब आरक्षण सामाजिक आवश्यकता न रहकर प्रतिष्ठा का विषय बन चुका है और सभी लोगों को इसकी आवश्यकता भी है.
                                           आज़ादी के समय देश की वर्ण व्यवस्था के लम्बे समय तक दुरुपयोग के चलते वंचित समुदायों को सँभालने और आर्थिक तथा सामाजिक बराबरी सुनिश्चित करने के लिए १० वर्षों के लिए अस्थायी तौर पर आरक्षण देने का प्रावधान किया गया था पर इतने काल तक जिनकी उपेक्षा की गयी थी १० वर्षों में उनकी एक पीढ़ी तो प्राथमिक शिक्षा भी नहीं पा सकती थी इसलिए इस आरक्षण के सीमित लाभ को देखते हुए इसे पुनः १० वर्षों के लिए लागू किया गया था. यह वह समय था जब देश के संसाधनों की कमी थी और पाकिस्तान तथा चीन की तरफ से भी सीमाओं पर परेशानियां खड़ी की जा रही थीं जिससे हमारे नेता आरक्षण के स्वरुप को डॉ अम्बेडकर के वंचितों को शिक्षित कर आगे बढ़ाने के सपने के स्थान पर केवल आरक्षण का आसान झुनझुना पकड़ाते हुए अपना काम आसान करने की नीति पर चल पड़े. इसके लिए किसी भी दल विशेष को ज़िम्मेदार ठहरना उचित नहीं कहा जा सकता है क्योंकि आरक्षण आगे बढ़ाया जाये इस पर लगभग हर बार ही संसद ने पूर्ण सहमति ही दिखाई है और आज आरक्षण वंचितों का भला करने के स्थान पर इस तरह से विभिन्न जातियों द्वारा किसी भी तरह आरक्षण पाने की परिणीति तक पहुँच चुका है.
                                          यदि देश के सभी लोगों को सामाजिक भेदभाव से बचाना है तो पूरे समाज में समरसता का होना बहुत ही आवश्यक है यदि संसद वास्तव में इस दिशा में कुछ काम करना चाहती है तो उसे आरक्षण पर एक दीर्घावधि योजना पर काम करना ही होगा जिससे समाज के सभी वर्गों को आगे बढाकर उनको प्रतिस्पर्धी बनाकर पूरे देश से सही प्रतिभा का चयन किया जा सके. वर्तमान में आरक्षण से किसी भी तरह की छेड़छाड़ संभव ही नहीं है क्योंकि इसमें किसी भी तरह के संशोधन को एक सीमा से अधिक नहीं किया जा सकता है और आरक्षण के आंतरिक स्वरुप को बदलने का उन समूहों द्वारा कडा विरोध किया जाता है जो पहले से इसका लाभ उठा रहे हैं. संसद भी सरकार की पहल पर ही कोई बड़ा कदम उठा सकती है जिसमें शिक्षा के वर्तमान स्वरुप को बदलने के साथ ही एक समय सीमा निर्धारित करते हुए समाज के हर वर्ग के मेधावी बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए आगे बढ़ाने के लिए एक स्पष्ट नीति की आवश्यकता है. सरकार अगले बीस तीस वर्षों के लिए देश की शिक्षा व्यवस्था को वास्तव में सुधारते हुए आरक्षण को लागू रखने की अंतिम सीमा के साथ एक कार्ययोजना लाने के बारे में सोच सकती है पर इसके लिए पूरी तरह से भ्रष्टाचार और पूर्वाग्रह से मुक्त होकर काम करने वाले लोगों के द्वारा ईमानदारी से प्रयास किये जाने की आवश्यकता पड़ने वाली है. जब तक समाज के सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचितों के लिए स्पष्ट कार्ययोजना बनाकर उस पर अमल नहीं किया जाता है तब तक आरक्षण को आखिर किस नीति के तहत हटाया जा सकता है ? आज जब आरक्षण मांगने वाले समूह इतनी अराजकता फैला सकते हैं तो जो समूह आज़ादी के बाद से इसका लाभ उठा रहे हैं उनकी तरफ से क्या किसी भी परिवर्तन का कडा प्रतिरोध नहीं किया जायेगा ?
                                       सरकार को आरक्षण के टुकड़े के स्थान पर सभी के लिए समानता के अवसर उत्पन करने के बारे में नए सिरे से सोचना होगा क्योंकि जब तक समाज के सभी वर्गों को एक साथ आगे बढ़ने के अवसर हर क्षेत्र में नहीं मिलेंगें तो वंचितों को बिना आरक्षण के फिर से वर्ण वादी व्यवस्था में धकेलना कहाँ तक उचित होगा ? हमारे देश में आज भी बहुत से क्षेत्र ऐसे भी हैं जहाँ समाज के कमज़ोर वर्गों के लोग आज भी शादी विवाह में ऊंची जातियों जैसे रस्म रिवाज़ों को नहीं प्रदर्शित कर सकते हैं तो इस समाज में उन्हें बराबरी का अवसर समाज से स्वतः ही मिल जायेगा यह सोचना भी मूर्खता ही होगी. समाज की हज़ारों वर्षों से चली आ रही कुप्रथाओं को दूर करने के लिए समाज के सभी वर्गों का दायित्व भी बनता है आरक्षण को ऊंची जातियों के हितों पर डाके के स्थान पर वंचितों के विकास का एक साधन तब तक माना जाना चाहिए जब तक सामाजिक समरसता को एकसार न किये जा सके. राजनैतिक कारणों को दूर रखते हुए सभी दलों को इसके लिए एक आयोग के गठन के बारे में सोचना चाहिए जिसमें नेताओं को स्थान नहीं मिलना चाहिए समाज की समझ रखने वाले विशेषज्ञों को इस बारे में कार्ययोजनाओं पर सोचना चाहिए और विचार विमर्श के बाद आरक्षण की व्यवस्था पर एक राष्ट्रीय नीति बनाने के बारे में सोचना चाहिए जो हर तरह की राजनीति और पूर्वाग्रहों से मुक्त हो.        
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