मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Monday, 13 September 2010

न्यूयार्क में बवाल ?

पिछले कुछ दिनों से न्यूयार्क के ९/११ वाले स्थान के पास मस्जिद बनाने और न बनाने के बारे में जिस तरह से वहां के स्थानीय निवासी विरोध कर रहे हैं उससे तो यही लगता है कि लोकतंत्र के इस दबाव को अमेरिका की सरकार नहीं सह पायेगी और वहां पर सामान्य हालत में अब मस्जिद का निर्माण नहीं हो पायेगा. वैसे अगर देखा जाये तो वहां के लोगों की भावनाओं की अनदेखी करने की स्थिति में अब वहां का प्रशासन नहीं रह गया है. ऐसा नहीं है कि वहां पर कोई मस्जिद पहले से थी और अब उसको बनाने में कोई अड़चन आने वाली है ? पर जिस तरह से इस्लामी समाज ने इस बारे में अपनी प्रतिक्रिया दी उससे ही वहां के स्थानीय निवासी पूरी तरह से इस तरह की किसी भी मस्जिद के विरोध में खड़े हो गए हैं.
             इस बारे में विचार करने के लिए हमें पहले यह देखना होगा कि इस्लामी मुल्कों में गैर इस्लामी लोगों की आस्थाओं का किस तरह से ख़याल रखा जाता है ? एक तरफ यह कहा जाता है कि इस्लाम भाई चारे का पैगाम देता है तो वहीं दूसरी तरफ पूरी दुनिया में आज अगर सबसे अधिक अशांत कोई भी क्षेत्र देखे जाएँ तो शायद ९० % ऐसे होंगें जहाँ पर इस्लामी हुकूमत चल रही है ? तो क्या यह मान जाये कि जिन इस्लामी देशों को दुनिया इस्लामी मानती है वे वास्तव में कुछ और हैं या फिर वहां पर वहां के लोगों ने इस्लाम की सीख को भुला दिया है ? बात यहाँ पर केवल मस्जिद या पूजा घरों की नहीं हो रही है बल्कि यह बात देखने योग्य है कि आखिर क्यों इस तरह की प्रतिक्रिया हमेशा से ही इस्लामी समाज से आती रहती है और जो इस्लाम विरोधियों को उनके खिलाफ एक और हथियार दे जाती है ?
           आज के इस्लाम के अनुयायियों को इस बात पर ध्यान देना ही होगा कि चन्द लोग इस्लाम के नाम पर कहीं अपनी विचारधारा को थोपने में नहीं लगे हुए हैं ? क्योंकि अगर वे सच्चे अर्थों में इस्लाम के अनुयायी हैं तो वे भाई-चारे की बात पर भरोसा रखने वाले भी होने चाहिए. आज दुनिया में जो इस्लाम के नाम पर समस्या दिखाई जा रही है वह वास्तव में कुछ भी नहीं है क्योंकि असली समस्या यह है कि आम मुसलमान ने कुछ लोगों को इस्लाम के नाम पर कुछ भी कहने पर उनको रोकने का साहस दिखाना बंद कर दिया है. अगर आम मुसलमान इन चंद लोगों की उलटी सीधी बातों पर ध्यान देना और उनको रोकना शुरू कर दे तो बाकि दुनिया को यह पता चल पायेगा कि वास्तव में इस्लाम क्या है ? पर इस सबके लिए कौन सामने आएगा ? कहीं ऐसा न हो कि जब तक आम मुसलमान जागे तब तक लोगों के मन में बहुत घृणा भर चुकी हो ? जब तक उदारवादी लोग सामने नहीं आयेंगें तब तक दुनिया में बहुत सारे लोगों को यही लगेगा कि इस्लाम के नाम पर तो खून खराबा होता ही रहता है ? ९/११ के बाद अमेरिका में दाढ़ी और पगड़ी का मतलब आतंकवादी हो गया था ? यहाँ तक सिखों को यह समझाना पड़ा था कि वे मुसलमानों से अलग हैं ? अब इस तरह की घटनाओं के बाद भी अगर मुस्लिम समाज अपने सही नेतृत्व को सामने नहीं ला पाया तो इससे उसका ही बहुत बड़ा नुकसान होने वाला है......    

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

2 comments:

  1. मुझे तो ये दोहरा चरित्र लगता है.. अमरीका का.. माना मुसमानों की छवि खराब है... जबरन विचार थोपने में लगे है... पर इस वजह से आप बाकि मुसमानों को तो नहीं रोक सकते... जगह प्राइवेट है.. कानूनन वो गलत इमारत नहीं बना रहे.. उसमे लगने वाला पैसा जायज है (CNN पर एक रिपोर्ट देखी थी) फिर क्यों विरोध.. वो ग्राउड जीरो के पास है.. ये तो कोई तर्क नहीं है.. आज दो ब्लोक पर वेरोध ही. कर दस पर करेंगे.. फिर कहेंगे न्युयोर्क में न बनाओ.. कहाँ रुकोगे...

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  2. shaitaan ko manne vale to shaitaaniyat hii failaeinge- inhein koun samjha sakta hai.

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