मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Tuesday, 14 September 2010

उमर की धमकी

जब रोम जल रहा था तो नीरो वंशी बजा रहा था ? आज के समय में जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह पर यह बात बिलकुल सही साबित होती है. जब जून के महीने से घाटी में आग सुलगाने की कोशिशें शुरू हुई थीं तब उन्होंने किसी भी तरह से आम जनता को साथ में लेने का कोई प्रयास नहीं किया और अब जब कश्मीर को एक ठोस नेतृत्व की ज़रुरत है तो वे बच्चों जैसी हरकतें करके इस्तीफ़ा दने जैसी बातें करने में लगे हुए हैं ? वास्तव में जब उन्होंने इस अशांत राज्य की कमान संभाली थी तब लोगों को लगा था कि वे कश्मीर की युवा पीढ़ी के नेता हैं और वे कुछ करने के जज़्बे के साथ कश्मीर के लिए बहुत कुछ अच्छा सोचने और करने में सक्षम होंगें पर उनका यह कार्यकाल उनकी पार्टी और कश्मीर के लिए बहुत भारी पड़ रहा है और जिस तरह से घाटी में अशांति भी प्रायोजित तरीके से फैलाई जा रही है उससे तो यही लगता है  कि पिछले कुछ वर्षों में देश ने कश्मीरियों को अलगाववादियों से दूर करने का जो प्रयास किया था उस पर इनकी निकम्मी सरकार ने पानी फेर दिया है ?
                आज जब इस संकट की घड़ी में उमर को आगे बढ़कर कश्मीर के युवाओं को यह बताना चाहिए कि उनके हित बिलकुल सुरक्षित हैं तो वे उलटे बंद कमरों में बैठकर केंद्र सरकार को धमकी देने का काम करने में लगे हुए हैं ? इस बात से यह तो साबित ही होता है कि कहीं न कहीं उनको भी यह पता चल चुका है कि आम कश्मीरी अब उनकी निकम्मी सरकार के साथ चलने को तैयार नहीं हैं ? आखिर कैसे यह सब हो जाता है कि जो सरकार बहुत बड़े बड़े दावे लेकर सामने आती है कुछ समय बाद वह जनता को बिलकुल भी बर्दाश्त नहीं होती है ? असल में सारा मामला सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून से जुड़ा हुआ है आतंकी संगठन इन प्रदर्शनों से अपने हित साधना चाहते हैं जिस कानून के कारण ही कश्मीर और उत्तर पूर्व से आतंकियों को खदेड़ा जा सका है वही आज इन अलगाववादियों को यह कानून ही बहुत अखर रहा है ?
             यह बात सही है कि जब दोनों तरफ से गोलियां चलती हैं तो आम जन और आतंकियों में फर्क करना मुश्किल हो जाता है ? आतंकियों को सुरक्षा बल तो आते जाते दिखाई देते हैं पर सुरक्षा बल के लोग आतंकियों के आम लोगों में घुल मिल जाने से कोई भी कार्यवाही आसानी से नहीं कर पाते हैं ? आतंकी पता नहीं कितनी लाशें बिछाकर चले जाते हैं पर सुरक्षा बलों द्वारा आत्म रक्षा में चलायी गयी कोई भी गोली बाद तक अपना हिसाब मांगती रहती है ? कश्मीर और दिल्ली में अति सुरक्षा के क्षेत्र में बैठकर कुछ भी कह देना बहुत आसान होता है पर यदि सुरक्षा बलों के बंकर में एक रात गुज़ार कर देखी जाए तो यह पता चल जायेगा कि उन्हें पता नहीं  कितने और कानूनों की आवश्यकता अभी और है ? जिन सुरक्षा बलों की जांबाजी के कारण कश्मीर में ये नेता सुरक्षित हैं आज वे उन्हीं के खिलाफ़ हुए जा रहे हैं ? आज आतंकियों की घुसपैठ घाटी में काफी कम हो चुकी है तो वे इन स्थानीय अलगाववादियों के माध्यम से अपने एजेंडे को चालू रखना चाहते हैं ? अच्छा ही है कि केंद्र सरकार ने इस मसले पर सर्वदलीय बैठक बुला ली है अब जो भी किसी को कहना है वहीं पर आकर कहे ? साथ ही अब उमर को धमकी देना बंद करके पद छोड़कर फारुख को फिर से मुख्यमंत्री पद सौंप देना चाहिए.    

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