मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 3 November 2010

खेल के खेल में खेल...

न्यायमूर्ति दीपक मिश्र के द्वारा सुनाये गए निर्णय के बाद भारत में खेलों की दशा सुधरने की आशा की जा सकती है. सरकार द्वारा जारी किये गए दिशा निर्देशों को न मानने के कारण ये खेल महासंघ कुछ राहत पाने के लिए कोर्ट की शरण में गए थे पर यहाँ पर कोर्ट ने इनकी बात को नहीं माना और सरकार को आदेश दिया है कि वह जल्दी से जल्दी नए दिशा निर्देश जारी कर दे. देश में एक घातक परंपरा चली आ रही है कि जो भी मिल जाये उससे चिपके रहो और चूंकि हर मामले में नियम बनाने की ज़िम्मेदारी विधायिका पर होती है तो वहां पर बैठे कुछ स्वार्थी तत्व बिना किसी शर्म के कुछ ऐसा जुगाड़ कर ही लेते हैं कि वर्षों तक उनकी कुर्सी सही सलामत रहे भले ही जिस कुर्सी पर वे बैठे हैं उस खेल की दुर्दशा हो जाये ?
            यहाँ पर सवाल यह नहीं है कि आख़िर किस तरह से इन खेलों की दशा सुधारी जाये बल्कि उससे बड़ा सवाल यह है कि कैसे इन खेलों के चुनाव में होने वाले खेलों पर रोक लगायी जाये ? किसी भी संस्था को चलने के लिए लोकतान्त्रिक तरीका सबसे बेहतर होता है पर जिस तरह से लोक तंत्र का लाभ केवल अपने हितों के लए ही उठाया जाने लगा है उससे तो यही लगता है कि अब कोई और तरीका निकाला जाना चाहिए जिससे यह सारा काम ठीक ढंग से चलता रहे ? किसी भी खेल में किसी भी नेता के चुने जाने से कोई नुक्सान नहीं है पर जब ये नेता अपनी राजनैतिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए इन खेल संघों के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को भूल जाते हैं तब बहुत दिक्कत आने लगती है ?आखिर क्यों नहीं हमारे नेता इस बात को स्वीकार कर लेते हैं कि खेल के बारे में सही जानकारी न होने के अभाव में ही वे देश में खेलों का कबाड़ा किये दे रहे हैं ?
         इस मामले में सभी नेता दलगत भावना से ऊपर उठे हुए दिखाई देते हैं क्योंकि हर खेल संघ में हर पार्टी के लोग मलाई खाने के लिए घुसे हुए हैं ? खेल विशेष से जुड़े खिलाडी उस खेल के बारे में सब जानते हैं और वे उसको आगे ले जाने में अपना बहुत अच्छा सहयोग दे सकते हैं पर वहां पर भी भष्ट राजनेता अपनी नाक घुसाए बैठे रहते हैं और खेल के नाम पर बहुत बड़े बड़े घोटाले करते रहते हैं ? किसी खेल के लिए क्या आवश्यकता है यह नेता कभी भी नहीं समझ सकते हैं और जो समझ सकते हैं उनके पास इस मसले पर करने के लिए कुछ भी नहीं होता है. अब भी समय है कि ये नेता यह समझ लें कि उच्च न्यायालय ने देश में खेलों को सुधारने की दिशा में सरकार द्वारा किये जा रहे प्रयासों को सही माना है और अब नेताओं को इन कुर्सियों को खाली कर देना चाहिए पर ये नेता मानने वाले नहीं और अब ये सर्वोच्च न्यायालय जाने की तैयारियों में लगे होंगें ?   

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