मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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सोमवार, 13 अक्टूबर 2014

इंडियन सुपर लीग

                                                             क्रिकेट के दीवाने देश में अब जिस तरह से कबड्डी के बाद फुटबॉल को लेकर भी सनसनी दिखाई दे रही है वह आने वाले दिनों में देश में खेले जाने वाले खेलों के लिए एक अच्छी खबर है. १९८३ में भारतीय क्रिकेट टीम द्वारा विश्व कप जीतने के बाद से देश में क्रिकेट को लेकर जो दीवानगी बढ़ी उसके कारण ही कभी हॉकी में सिरमौर रहे इस देश में अन्य खेलों को पूछने वाला कोई और रहा ही नहीं. टीम के रूप में खेले जाने वाले खेल क्रिकेट के अलावा हमारे सभी टीम आधारित खेलों में देश का प्रदर्शन रोज़ ही गिरता चला गया जिसका असर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर होने वाले आयोजनों में देश के प्रदर्शन से ही जाना जा सकता है. पिछले तीन दशकों से अभी तक देश ने केवल क्रिकेट ही खेला और जिया है बीच बीच में व्यक्तिगत प्रदर्शन के दम पर कुछ खिलाडियों ने ओलम्पिक, एशियाई और राष्ट्रमंडल खेलों में देश की इज़्ज़त काफी हद तक बचाये रखी थी जिससे हम इन प्रतियगिताओं में भी कुछ हासिल कर लिया करते थे.
                                                             कबड्डी लीग के शुरू होने और उसमें पहली बार में सफलता और लोकप्रियता के आयाम जुड़ने के बाद से ही यह स्पष्ट होने लगे था कि अब भारत में अन्य खेलों के बारे में भी जागरूकता बढ़ाने का समय आ गया है. कभी फ़ुटबाल के लिए दीवाने रहे पूर्वी क्षेत्र और विशेषकर कोलकाता से इंडियन सुपर लीग की जो भव्य शुरुवात हुई है वह आने वाले समय में देश में फुटबॉल को लेकर भी नयी सोच पैदा करने वाली है. अभी तक सरकारी स्तर पर जिस तरह से इन खेलों के साथ औचारिकता ही निभायी जाती थी अब इनके उससे बाहर निकलने का समय भी आ गया है क्योंकि जब तक क्रिकेट के मुकाबले इन खेलों में पैसे नहीं दिखाई देंगें तब तक युवाओं में इसे अपने करियर के रूप में अपनाने में बड़ी अड़चने सामने आने वाली हैं. क्रिकेट में जिस तरह से अब एक स्थायित्व आ रहा है तो १२५ करोड़ की आबादी वाले देश के युवाओं के सामने खेलों में कोई अन्य विकल्प होना एक शुभ संकेत भी है.
                                                             कोलकाता समेत देश के पूर्वोत्तर राज्यों में आज भी फुटबॉल को लेकर दीवानगी देखी जा सकती है अब समय आ गया है कि इस लीग के माध्यम से देश के युवाओं के मन में क्रिकेट के अलावा फुटबॉल खेलने के लिए भी जागरूकता पैदा की जा सकती है. अब देश के बड़े खिलाड़ियों और नामी कम्पनियों द्वारा इस लीग में टीम खरीदने से जहाँ खिलाड़ियों को उचित आर्थिक सुरक्षा मिलेगी वहीं उनके लिए खेल के बेहतर संसाधन भी उपलब्ध हो पायेंगें. किसी भी खेल में यदि निचले स्तर से ही प्रतिस्पर्धा को शुरू करने में देश को सफलता मिलने लगी तो आने वाले समय में इन टीम आधारित खेलों में भी देश का प्रदर्शन बहुत अच्छा हो जायेगा. सरकारी खेल विभागों को अपने स्तर पर कोशिशें जारी रखनी चाहिए क्योंकि जब तक दोनों क्षेत्रों में समन्वय नहीं होगा तब तक राष्ट्रीय स्तर पर बेहतर टीम के चयन को भी सुगम नहीं बनाया जा सकेगा. साथ ही जिन खिलाड़ियों का देश की टीम में चयन नहीं हो पायेगा वे भी लीग की इन टीमों से जुड़े होने के कारण आर्थिक रूप से अपने को सुरक्षित भी महसूस कर सकेंगें.      
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

खेल संघों में राजनेता

                                   देश के खेल संघों में जिस तरह से नेताओं का वर्चस्व रहा करता है उस स्थिति में आज देश में खेलों का पूरी तरह से बंटाधार ही हो गया है क्योंकि जो निर्णय खेल को नज़दीक से समझने वाले खिलाडी आसानी से ले सकते हैं उनके बारे में सही जानकारी न होने के कारण खेलों के विस्तार पर आज बहुत बुरा असर पड़ रहा है. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने हॉकी संघों को लेकर चल रहे विवाद के परिप्रेक्ष्य में चल रही सुनवाई के बीच इस बात को भी स्पष्ट रूप से कहा है कि खेल संघों की बागडोर केवल खिलाडियों के हाथों में ही होनी चाहिए जिससे देश में खेलों का स्तर सुधर कर विश्व स्तरीय हो सके. कोर्ट ने इस बात पर भी अपनी चिंता और नाराज़गी व्यक्त की कि एक समय ओलम्पिक पदकों को जीतने वाली हॉकी आज ओलम्पिक के लिए क्वालीफाई करने के लिए संघर्ष करती नज़र आती है ? यह सही है कि हॉकी के साथ देश के किसी भी खेल संघ में खेलों पर ध्यान दिए जाने के स्थान पर अब राजनीति के माध्यम से राजनेता इन संघों पर कब्ज़ा ज़माने की फ़िराक़ में ही रहा करते हैं.
                                     कोर्ट ने इस बात पर भी नाराज़गी दिखायी कि आज सरकारें देश के खेल संघों पर नियंत्रण नहीं कर पा रही हैं और इससे खेलों पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है क्योंकि खेल संघों में नेताओं के बढ़ते हुए दखल के कारण जहाँ वहाँ पर गुटबाज़ी बढ़ रही है वहीं दूसरी तरफ खेलों पर पूरा ध्यान नहीं दिया जा रहा और उसका सीधा असर देश के अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शन में दिखायी भी देता है. जब तक नेताओं और उनके समर्थकों के हाथों से खेलों की बागडोर लेकर पूरी तरह से खिलाड़ियों के हाथों में नहीं सौंपी जायेगी तब तक किसी भी दशा में खेल में देश का  प्रदर्शन सुधर नहीं पायेगा. अब एक बार फिर से सुप्रीम कोर्ट के इस वक्तव्य के बाद सरकार पर एक राष्ट्रीय खेल नीति बनाकर खेल संघों को केवल खिलाडियों तक ही सीमित किये जाने के बारे में सोचना ही होगा क्योंकि जब तक खेलों को आज के युग में पेशेवर तरीके से नहीं लिया जायेगा तब तक खेलों का सुधार किसी भी तरह से नहीं किया जा सकता है और खेलों की राजनीति खेलों का बंटाधार करने में लगी रहेगी.
                                      देश ने आज़ादी के बाद खेलों में बहुत से सुखद पल जिए हैं पर इतनी बड़ी आबादी के अनुसार यदि हमारा प्रदर्शन बहुत ही लचर है तो अब उसके कारणों पर भी विचार किये जाने की ज़रुरत है क्योंकि केवल खेलों के लिए चिंतित रहकर हम खेलों का किसी भी तरह से अब भला नहीं कर सकते हैं. कोर्ट को अब इस मामले में एक समय सीमा रखते हुए केंद्र और राज्य सरकारों को अपना रुख स्पष्ट करने के लिए बुलाना चाहिए और यह भी पूछना चाहिए कि खेलों की इस दुर्दशा को देखते हुए आख़िर क्यों न नेताओं को खेल संघों में दखल देने से पूरी तरह से वंचित कर दिया जाये ? साथ ही एक राष्ट्रीय खेल नीति के प्रारूप पर भी ध्यान देकर उसे कोर्ट में जमा करने के लिए कहना चाहिए क्योंकि सभी सरकारें आज केवल उन्हीं बातों पर ध्यान देना चाहती हैं जिनसे किसी भी तरह से उन्हें वोटों का लालच होता है वरना कोई भी खेल चाहे जिस हालत में पहुँच जाये उससे उन्हें कुछ भी नहीं करना होता है. अब जब इस मामले में कोर्ट के पास मसला पहुंचा हुआ है तो सम्भवतः कोर्ट इस दिशा में स्पष्ट निर्देशों के साथ सरकार को आदेश भी जारी कर दे और खेल का माहौल शायद आने समय में सुधर जाये.     
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शुक्रवार, 17 मई 2013

भद्र या अभद्र क्रिकेट ?

                           खेल में पैसों की चमक का वास्तविक स्वरुप क्रिकेट में काफी लम्बे समय से दिखाई दे रहा है फिर भी देश में इसके दीवानों की संख्या को देखते हुए जिस तरह से इसमें सटोरियों का दख़ल बढ़ता ही जा रहा है उसके बाद अब इस खेल का क्या भविष्य होगा यह तो कोई भी नहीं जनता है पर जिस तरह से इस खेल में खेल के नाम पर पैसों का खेल खेल जाने लगा है उसके बाद निश्चित रूप से बहुत सारे लोग इस खेल के बारे में कुछ अलग ढंग से सोचना शुरू कर सकते हैं. यहाँ पर सवाल यह है कि खेल में इतना पैसा आख़िर कहाँ से आ रहा है जो खिलाड़ियों के आत्म बल पर इतना भारी पड़ने लगा ही कि उन्हें कुछ मैच फिक्स करके आजीवन न खेल पाने का कोई मलाल ही नहीं होता और वे अपने दम पर फिक्सिंग के इस घटिया खेल में शामिल हो जाते हैं ? भारत की बड़ी क्रिकेट प्रशंसक आबादी ने जिस तरह से क्रिकेट के प्रति अपना प्यार दिखाया और उसके एवज में बोर्ड और खिलाडियों ने अपने इन दीवानों के लिए क्या किया यह इसका एक घिनौना उदाहरण है ?
                           आख़िर क्या कारण है कि इस खेल के प्रबंधन में केवल राजनेता और बड़े उद्योगपति ही शामिल रहा करते हैं जबकि इसके भविष्य को और उज्जवल बनाये रखने के लिए इसमें पूर्व खिलाडियों की बड़ी भागीदारी भी होनी ही चाहिए. खेल के इस खेल में जिस तरह से क्रिकेट से आने वाले अकूत धन को सँभालने में नेता और उद्योगपति लग गए हैं उस परिस्थिति में खेल का सत्यानाश तो होना ही है क्योंकि इनके लिए खेल से बढ़कर केवल धन का ही महत्व है और आज से कुछ वर्षों पहले दुनिया के अन्य देशों में जो फिक्सिंग चल रही थी वह यहाँ भी आ चुकी है अब खिलाडियों में भी पैसों की भूख बढ़ने के कारण उनके लिए चोर रास्ते से ऐसी हरक़तें करना आसान हो गया है ? पहले खिलाडी अपने पूरे जीवन में देश के लिए खेलने के लिए तरसा करते थे और एक बार भी अवसर मिल जाने को अपना सौभाग्य माना करते थे पर अब आर्थिक ताकतों के इस पर हावी हो जाने के कारण खेल की तो धज्जियाँ ही उड़ चुकी हैं और उसके कारण देश को भी शर्मिंदगी उठानी पड़ रही है ? पर पैसों के भूखे इन लोगों के लिए शायद देश की अस्मिता का कोई महत्त्व ही नहीं है और उन्हें केवल अपने आर्थिक हित ही दिखाई देते हैं।
                       सबसे पहले इस खेल के प्रारूप में ही बदलाव करने की आवश्यकता के बारे में सोचा जाना चाहिए क्योंकि एक समय में इस खेल में कलात्मकता का बहुत स्थान हुआ करता था पर अब पैसों की धमक के साथ हाथों के दम पर ही पूरा खेल टिक गया है ? एक समय जब किसी टेस्ट मैच में सुनील गावस्कर और गुंडप्पा विश्वनाथ दोनों छोरों पर बैटिंग किया करते थे तो उनके खेल को देखने से इस खेल के तकनीकी पहलुओं और गहराई को समझने में मदद मिला करती थी पर आज यह पूरे खेल केवल दमखम के आधार पर ही खेला जाने लगा है उससे भी पूरे खेल का बंटाधार ही हुआ है. वैसे भी जो दीवानगी खेल के लिए लोगों में पहले हुआ करती है आज वह किसी भी परिस्थिति में वापस नहीं लौट सकती है क्योंकि पैसों ने इस खेल को जितना नुक्सान पहुँचाना था वह हो चुका है और जब तक इस खेल में एक बार फिर से पैसे के महत्त्व को खेल से आगे नहीं रखा जायेगा तब तक कोई भी खिलाड़ी इस खेल को उस भावना से नहीं खेल पायेगा. इस तरह के आरोपों में फंसे हुए लोगों पर आजीवन प्रतिबन्ध लगाने से मसले का हल नहीं निकल सकता है इन पर कड़ी कार्यवाही करके इनका बहिष्कार करना ही उचित होगा.     
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बुधवार, 12 दिसंबर 2012

अशांत पाक सीमा

                          पिछले वर्षों के मुकाबले इस वर्ष पाकिस्तान से लगी नियंत्रण रेखा और अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर जिस तरह से पाक ने अशांति मचाई हुई है उससे यही लगता है कि पाक भारत के साथ अपने संबंधों को कभी भी ठीक नहीं रखना चाहता है. वह एक तरफ़ जहाँ क्रिकेट संबंधों की बहाली के साथ संबंधों को सामान्य दिखाना चाहता है वहीं आतंकियों, कट्टरपंथियों और फौज के दबाव में भारत के ख़िलाफ़ तथाकथित जिहाद भी चलाये रखना चाहता है ? जिस तरह से पूँछ जिले के कृष्णा घाटी और बलनोई में पाक सेना के सहयोग से आतंकी शिविर सीमा के और करीब ले आये गए हैं और पाक सेना भी अपने तोपखाने को आगे सीमा पर तैनात कर रही है उस स्थिति में भारत-पाक सम्बन्ध किस तरह से सामान्य हो सकते हैं ? पाक पिछले कुछ वर्षों से कश्मीर में अपने भाड़े के सैनिकों और आतंकियों को सीमा पर नहीं करा पा रहा है जिससे भी उसमें हताशा घर करती जा रही है इस स्थिति में भारत पर यह दबाव बढ़ जाता है कि वह अपनी सुरक्षा पर और अधिक ध्यान दे. पाक के इस अनावश्यक अतिवादी कदम के जवाब में इस बार भारतीय सेना ने भी उन सेक्टरों में भारी गोलीबारी की है जहाँ पर सीमा से लगते हुए आतंकी शिविर चलाये जा रहे हैं जिसमें बड़ी संख्या में आतंकियों के मारे जाने और उनके ढांचे को बड़ा नुकसान पहुँचने की अपुष्ट ख़बरें भी आ रही है.
           पाक की अर्थव्यवस्था या तो अमेरिका से मिली हुई सहायता पर निर्भर करती है या फिर जिहाद के नाम पर इस्लामी देशों से आतंकियों के लिए मिलने वाले धन से. इस स्थिति में वह कभी भी यह नहीं चाहेगा कि भारत के साथ उसके सम्बन्ध सामान्य हो जाएँ क्योंकि तब वह इस्लामी दुनिया से किस मुंह से जिहाद के लिए पैसे इकठ्ठा कर पायेगा ? आज पूरे पाक में भारत विरोधी भावनाओं को भड़काने का काम पहले से अधिक बड़े स्तर पर किया जाने लगा है उस स्थिति में भारत के पास और क्या विकल्प शेष बचते हैं जिनसे वह अपनी सुरक्षा को और मज़बूत कर सके ? भारत ने पहले के मुकबले सजगता बढ़ाकर घुसपैठ के स्तर को काफी कम तो कर दिया है पर आज भी कई सेक्टर ऐसे हैं जहाँ तक पहुँच पाना आसान नहीं होता है और आतंकी इन स्थानों का लाभ उठाकर घुसपैठ करने में कामयाब होते रहते हैं. इस बार घुसपैठ में असफल रहने वाले आतंकी वापस जाते समय आईईडी लगाकर भाग जाते हैं जिससे अभी तक ५ जवान अधिकारी इसकी चपेट में आकर गंभीर रूप से घायल हो चुके हैं इससे बचने के लिए सीमा पर चौकसी के स्तर को और मज़बूत किये जाने की आवश्यकता है और उस पर अविलम्ब विचार किया जाना चाहिए.
           भारत को पाक के साथ अपने संबंधों को अब पाक की हरकतों से जोड़कर देखने की आवश्यकता है क्योंकि हमारी सेना और देश के बहुमूल्य संसाधनों को भाड़े के आतंकियों के दम पर पाक तबाह करने के जो मंसूबे पालकर बैठा है उसका तोड़ ढूँढा जाना आवश्यक है. पूर्व में क्रिकेट के ज़रिये भारत ने पाया तो कुछ भी नहीं है पर खो बहुत कुछ दिया है इस बार भी जिस तरह से दोस्ती क्रिकेट के नाम पर पाक ढोंग कर रहा है और सीमा पर अपनी घटिया और नकारात्मक हरकतों से बाज़ नहीं आ रहा है उस स्थिति में भारत को अपने पाक के साथ क्रिकेट संबंधों की बहाली पर एक बार फिर से विचार करने की ज़रुरत है. क्या क्रिकेट के ज़रिये सम्बन्ध सुधारने का ज़िम्मा केवल भारत का ही है भले ही पाक जब चाहे अपनी नापाक हरकतों से भारत के लिए समस्याएं खड़ी करने में लगा रहे ? पाक के पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी और वर्तमान में राजनीति में अपने दांव आजमाने वाले इमरान ने भी भारत पाक श्रंखला के लिए दर्शकों को आने जाने की छूट देने की मांग की है जिससे जो आतंकी अब सीमा पार से घुसपैठ करके नहीं आ पा रहे हैं वे क्रिकेट देखने के बहाने से भारत आ जाएँ और यहाँ के स्लीपिंग मोड्यूल के संपर्क में आकर अपने काम को अंजाम दे सकें ? अब भारत को पाक से स्पष्ट शब्दों में कह देना चाहिए कि भारत विरोधी इस तरह की गतिविधियों को चलाने के कारण उससे क्रिकेट श्रंखला को रद्द भी किया जा सकता है जिसकी पूरी ज़िम्मेदारी पाक की ही होगी तब जाकर ही पाक को यह समझ में आएगा वर्ना उसके दोगले काम हमेशा की तरह जारी रहेंगें.         
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सोमवार, 13 अगस्त 2012

लन्दन में ६ पर ५५ ?

               लन्दन ओलम्पिक में पेइचिंग के मुक़ाबले अधिक पदक जीतने की ख़ुशी के साथ ही एक बात तय हो गयी कि अगर देश कि प्रतिभा को विकसित होने के अवसर मिलें तो देश के लिए पदक जीत कर लाने में कहीं से भी पीछे नहीं रहने वाले हैं. भारत ने इस बार जहाँ पदकों की संख्या में बढ़ोत्तरी की है वहीं गोल्ड पर दावा न ठोंक पाने के कारण उसकी मेडल रंकिंग में में गिरावट देखी गयी है, फिर भी जिस तरह से व्यक्तिगत स्पर्धाओं में हमारे खिलाड़ियों ने बेहतर प्रदर्शन किया है वह अपने आप में बहुत बड़ी उपलब्धि है क्योंकि खेलों में प्रतिभा को नज़र अंदाज़ करके जिस तरह से राजनीति चलायी जाती है उस कारण से भी किसी भी युगल या टीम स्पर्धा में हमारा प्रदर्शन हमेशा की तरह लचर ही रहता है. जिस तरह से देश के दूर दराज़ के क्षेत्रों में रहने वाले खिलाड़ियों ने संसाधनों के अभाव में भी अपनी तैयारियों को जारी रखते हुए देश को ख़ुशी के ये क्षण दिए हैं उन्हें देश कभी भी नहीं भूल पायेगा. प्रतिभा का सम्मान करना हम जब तक नहीं सीखेंगें तब तक किसी भी तरह से खेलों में हमारा प्रदर्शन टीम के रूप में सबके सामने नहीं आ पायेगा. १२० करोड़ लोगों वाले देश का स्कोर ६ पदक और ५५ वाँ स्थान आख़िर किस खेल नीति की तरफ इशारा करता है ?
       कहने के लिए तो देश में बहुत सारे खेल संघ हैं जो देश में कथित तौर पर खेलों को बढ़ावा देने का काम कर रहे हैं पर वास्तव में अगर देखा जाये तो इन संघों में जिस तरह से मनमानी करते हुए खिलाड़ियों के साथ नाइंसाफी की जाती उसका ही नतीज़ा यह है कि खेल संघों पर टिके हुए अधिकतर खेलों में भारत का प्रदर्शन शर्मनाक ही रहा है. व्यक्तिगत स्पर्धा में जहाँ एक खिलाड़ी पर ही सब कुछ निर्भर करता है और मीडिया के दख़ल के कारण ही आज व्यक्तिगत प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों के साथ कुछ हद तक न्याय होने लगा है जिससे भी भारत के प्रदर्शन में सुधार आया है. अगर खेल के स्तर में वास्तव में सुधार करना है तो सबसे पहले नेताओं को इन खेल संघों के चुनावों में भाग लेने पर रोक लगा दी जानी चाहिए क्योंकि ये अपनी व्यक्तिगत राजनीति के आगे देश के सम्मान को भी तक पर रखने से नहीं चूकते हैं. नेताओं को राजनीति के अतिरिक्त किसी भी गतिविधि में भाग लेने से रोकने के लिए एक व्यापक नीति की आवश्यकता है क्योंकि जब तक नेताओं को अपनी नेतागिरी यहाँ चलाने का अवसर मिलता रहेगा ये अपने हितों के लिए प्रतिभाओं का सम्मान नहीं कर पायेंगें.
       जिस तरह भारत को टेनिस में एक पदक तो आसानी से मिल सकता था पर टेनिस खिलाड़ियों और संघ की राजनीति के चलते हमारे विश्व स्तरीय खिलाड़ी लन्दन में केवल भाग लेकर अपनी खेल भावना का प्रदर्शन करके वापस लौट आये उससे भले ही खिलाड़ियों और टेनिस संघ की ऐंठ बच गयी हो पर देश को तो एक पदक कम मिला इस बात का जवाब क्या हमारे खिलाड़ियों या खेल संघ के पास है ? अब यह कहने से काम नहीं चलने वाला है कि व्यक्तिगत कारणों से कुछ खिलाड़ी एक साथ नहीं खेल सकते हैं पर देश के लिए खेलने में भी अगर उनको परेशानी होती है या फिर उनका अहम् सामने आ कर रूकावट डालता है तो देश को ऐसे खिलाड़ियों से तुरंत पीछा छुड़ाने की ज़रुरत है. देश में एक स्पष्ट खेल नीति का अभाव में भी हमारे प्रदर्शन को ख़राब करता है क्योंकि चीन और जापान जैसे देश अपनी बेहतर और सख्त खेल नीति के कारण ही इतनी बड़ी संख्या में पदकों को जीत लेते हैं जबकि हमारे यहाँ किसी भी खेल संघ में पूरे वर्ष खेल गतिविधियाँ ही नहीं चला करती हैं. एशियन, राष्ट्रमंडल या ओलम्पिक खेलों से पहले ही खेलों पर ध्यान दिया जाता है जबकि विश्व स्तर पर प्रदर्शन करने के लिए सतत मेहनत की आवश्यकता होती है जिसकी हमारे यहाँ कमी ही रहती है फिर भी अपने दम पर देश का नाम रोशन करने वाले इन खिलाड़ियों पर देश को नाज़ है....    
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शुक्रवार, 16 सितंबर 2011

खेल नीति में राजनीति

एशिया विजेता बनकर भारत लौटने वाली हाकी टीम के साथ ईनाम के नाम पर जो मज़ाक किया गया उसे हाकी खिलाड़ियों समेत देश के खेल प्रेमी कभी भी नहीं भूल पायेंगें क्योंकि इतनी बड़ी स्पर्धा में इतने अरसे बाद सर्वोत्तम बनना किसी भी देश के लिए गर्व की बात होती है पर हमारे देश ने जैसे अपने ही विजेताओं को अपमानित करने की क़सम खा रखी है. देश में खेलों के लिए एक समान नीति और अवसर की बातें करने वाले लोग यह भूल जाते हैं कि इस देश में क्रिकेट के नाम पर अन्य खेलों के साथ सौतेलापन हमेशा ही किया जाता रहता है ? इतने दिनों के बाद इस टीम ने बड़ी सफलता पाई थी तो उनके सम्मान की उचित व्यवस्था की जानी चाहिए थी पर इसे भी सामान्य रस्म अदायगी के रूप में ले रूप में लिया गया और जब टीम ने अपमानित करने वाली धनराशि २५००० रु० लेने से मना कर दिया जाये तब जाकर मंत्रालय की नींद टूटी और यह राशि बढ़ाई गयी. बात यहाँ पैसों की नहीं वरन उचित सम्मान की है जिसकी यह टीम हक़दार थी.
    क्या देश के राजनैतिक तंत्र की इतनी औकात है कि वो क्रिकेट कि किसी बड़ी स्पर्धा में जीतने केबाद टीम को इतनी धनराशि देने की हिम्मत जुटा सके ? अगर नहीं तो खेल मंत्रालय के अधिकारियों या नेताओं को इस एशिया विजेता टीम का अपमान करने की हिम्मत कैसे हो गयी ? ये खिलाड़ी हमारे वास्तविक गौरव हैं और क्रिकेट जैसे अप्रत्याशित खेल के स्थान पर ये उस खेल का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसमें हर खिलाड़ी के लिए पूरे समय खेलने का दम भी बहुत कुछ दिशा तय करता है क्रिकेट में आज चोट खाए और केवल पैसों के नाम पर खेलने वाले केवल बड़े नामों को ढो रही टीम की जिस तरह से अंग्रेजों द्वारा धुलाई की जा रही है उससे मुझे तो बहुत संतोष मिल रहा है क्योंकि जिस टीम के पास देश के लिए समय नहीं है उसके साथ ऐसा ही होना चाहिए. देश में खेलों का गौरव केवल क्रिकेट से कैसे जुड़ गया यह तो नेता ही बता सकते हैं पर किसी भी तरह से इस बात को अब बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है कि किसी भी खेल के साथ इस तरह का भेद भाव किया जाये. क्रिकेट के खिलाड़ी ज़्यादा पैसे मिलने पर फिट हो जाते है और देश के लिए खेलने के समय जैसे वे खेलना ही भूल जाते हैं.
   जिन नेताओं ने देश में नीतियां बनाने के लिए जनता के पैसे और संसद की गरिमा का ध्यान रखना बंद कर दिया है उनके लिए भी कुछ ऐसा ही होना चाहिए उन्हें कैसा लगेगा कि अगर उन्हें भी कोई अच्छा काम करने पर १० रु प्रति सांसद ईनाम में देने लगे ? आज देश को इस बात की ज़रुरत है कि जनता विरोध स्वरुप इन नेताओं को संख्या के हिसाब से ईनाम के रूप में कुछ पैसे अवश्य दे जिससे इन्हें इस तरह के अपमान का महसूस हो सके ? पर नैतिकता की बातें करने वाले खोखले हो चुके किसी भी तंत्र के लिए जगाने का कोई भी प्रयास कहाँ तक कारगर हो पायेगा यह तो समय ही बताएगा पर आज देश में खेलों की दुर्दशा पर पूरी संजीदगी से विचार किये जाने की आवश्यकता है और बिना इसके कुछ भी सही ढंग से नहीं किया जा सकता है. देश को आज एक सही और व्यापक खेल नीति की आवश्यकता है जिसमें क्रिकेट को पूरी तरह से शामिल किया जाना भी ज़रूरी है क्योंकि पूरे देश के खेल परिदृश्य को बिगाड़ने वाले इस खेल पर लगाम लगाये बिना कुछ भी ठीक ढंग से नहीं किया जा सकेगा.

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

बुधवार, 31 अगस्त 2011

वाह क्रिकेट आह क्रिकेट

आख़िर बीसीसीआई ने इस बात को स्पष्ट रूप से कहकर अपनी मंशा ज़ाहिर कर ही दी की वह किसी भी तरह के खेल संघ में बदलना नहीं चाहता है और साथ ही यह भी कह दिया कि वह सूचना अधिकार के अंतर्गत भी नहीं आना चाहता है ? क्रिकेट के लिए पागल हुए जा रहे इस देश में इसकी संस्था आख़िर किस तरह से ऐसा बर्ताव कर सकती है यह सोचने का विषय है क्योंकि आज भारत में इस खेल से बहुत पैसा बनता है जब धन का प्रवाह इतने बड़े स्तर पर होने लगता है तो कहीं न कहीं से कोई जवाबदेही बननी ही चाहिए जिससे जनता के उगाहे गए इस धन का सही प्रयोग किया जा सके ? पर सरकार की मंशा के अनुरूप बोर्ड ने अपना राग अलग से छेड़ रखा है जिसका कोई मतलब नहीं बनता है. कोई भी बोर्ड या अन्य खेल संघ देश के कानून से ऊपर नहीं हो सकता है पर यहाँ पर सब कुछ बोर्ड अपनी मर्ज़ी से करना चाहता है जिसे किसी भी स्थिति में सही नहीं कहा जा सकता है.
     इस बात पर विचार किये जाने की आवश्यकता है कि आख़िर बोर्ड की इतनी हिम्मत कैसे हो जाती है कि वह कुछ भी कहने और करने लगे ? इसका एक मात्र कारण यहाँ अपर नेताओं के जमे होने से ही पैदा हो जाता है क्योंकि इनको ही संसद में कानून बनाना है और इन्हें ही बोर्ड को भी चलाना है. यहाँ भी नेताओं के निहित स्वार्थ आड़े आने लगते हैं जिससे वे किसी भी स्तर पर कोई भी सुधार लागू होने ही नहीं देते हैं. आज देश के अधिकांश खेल संघों पर नेताओं का कब्ज़ा है क्योंकि यहाँ पर आने वाले पैसे को ये अपनी मर्ज़ी के हिसाब से खर्च करने को अपना अधिकार समझते हैं और सुधार लागू होने से इनकी दुकान बंद होने का ख़तरा भी होने लगता है. आज शायद ही कोई ऐसा खेल संघ हो जिसमें वास्तव में उस खेल से जुड़े हुए खिलाड़ियों को कुछ स्थान मिला हो ? देश में खेलों की दुर्दशा के पीछे इस तरह की नियति ही हमेशा से ज़िम्मेदार रही है और आज भी कहीं से कोई सुधार होने की आशा नहीं दिखाई दे रही है. नेताओं को देश के खेल संघों पर दया करनी चाहिए और अपनी राजनीति संसद तक ही सीमित रखनी चाहिए.
  अब वास्तव में इस पूरे तंत्र में सुधार करने की आवश्यकता है क्योंकि जब तक इनमें वित्तीय पारदर्शिता नहीं लागू की जाएगी तब तक कुछ भी सही नहीं हो पायेगा. देश में क्रिकेट ने इतना पैसा उड़ेल रखा है कि पूरी दुनिया में यह पहले स्थान पर आ गया है बोर्ड हर बड़े टूर्नामेंट से बहुत बड़ी मात्रा में धन इकठ्ठा करता है और उसका किस तरह से दुरूपयोग किया जाता है यह कोई नहीं जान पाता है जिससे इन संघों पर नेताओं का काम करने का अधिक मन भी होता है. जब नेताओं के पास काम करने के लिए अन्य क्षेत्र खुले हुए हैं तो उन्हें इस तरह से देश में खेलों का भट्ठा बैठाने की क्या ज़रुरत है ? कोई भी व्यक्ति कई कामों के साथ एक साथ में न्याय नहीं कर सकता है जिस कारण से भी खेल पीछे छूट जाया करता है और पीछे के खेल में लोग लग जाया करते हैं. बोर्ड के पैसे को सार्वजनिक और पारदर्शी तरह से चलाया जाए जिससे हर नागरिक यह जान सके कि आख़िर बोर्ड किस तरह से काम कर रहा है ? पर यह तभी हो सकेगा जब सरकार कड़ाई से पेश आएगी.  
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

यू० पी० खेल मंत्री चेते...

आख़िर कार यू पी के खेल मंत्री अयोध्या प्रसाद ने अपनी गलती मानते हुए माफ़ी मांग कर खिलाड़ी सुधा सिंह को फिर से प्रदेश की तरफ से खेलने के लिए राज़ी कर ही लिया है. शनिवार को लखनऊ में आयोजित एक कार्यक्रम में इस खिलाड़ी की जिस तरह से खेल मंत्री के आने के बाद उपेक्षा की गयी उससे आहत होकर सुधा ने भविष्य में प्रदेश की तरफ से खेलने से भी तौबा कर ली थी. पहले तो सरकारी स्तर पर चुप्पी छाई रही पर जैसे ही यह खबर अपनी पूरी तेज़ी के साथ फैली तो प्रदेश सरकार हरकत में आई और खेल मंत्रालय समेत खेल मंत्री को भी अपनी ग़लती का अहसास हुआ.
          देश को हमारे माननीय नेता कितना नुकसान पहुंचा रहे हैं यह किसी से भी छिपा नहीं है पर अब जिस तरह से प्रतिभाओं के साथ दुर्व्यवहार भी किया जाने लगा है वह किसी भी तरह से ठीक नहीं है. विपरीत परिस्थियों में भी इन खिलाड़ियों ने पाने दम ख़म से जो कुछ भी पाया है उसका सम्मान करने लायक तो ये नेता होते नहीं हैं उलटे इनको उपेक्षित करके पता नहीं क्या दिखाना चाहते हैं ? अगर नेता और सरकारें खिलाड़ियों को कुछ दे नहीं सकती हैं तो उनको यह हक़ किसने दे दिया है कि वे किसी के साथ कुछ भी होने दें ? देश में वैसे भी गिनती के विश्व स्तरीय खिलाड़ी ही उभर कर सामने आ पाते हैं फिर उनको इस तरह से उपेक्षित करके आख़िर हम क्या दिखाना चाहते हैं ? एक सवाल और कि अगर सुधा सिंह की जगह कोई क्रिकेट खिलाड़ी होता तो क्या मंत्री जी की इतनी औक़ात थी कि वे उसको अनदेखा कर पाते ?
        कभी नहीं क्योंकि किसी थोड़े से भी ख्यति प्राप्त क्रिकेट खिलाड़ी को इतने लोग जानते हैं कि मंत्री तो क्या प्रधान मंत्री भी उसकी अनदेखी नहीं कर सकते हैं ? देश में खेलों के साथ आख़िर कब तक इस तरह का दुर्व्यवहार किया जाता रहेगा ? अब भी अगर हम नहीं चेते तो कभी भी हमारे देश में खिलाड़ी कोई और खेल खेलने के बारे में नहीं सोचेंगें और इतनी बड़ी आबादी वाला हमारा देश केवल कुछ मेडल्स के लिए हमेशा ही तरसता रहेगा ? चेतो नेता चेतो कहीं ऐसा न हो कि आने वाली पीढ़ी केवल टी वी पर दूसरों को मेडल जीतते हुए ही देख पाए ? 


मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

बुधवार, 3 नवंबर 2010

खेल के खेल में खेल...

न्यायमूर्ति दीपक मिश्र के द्वारा सुनाये गए निर्णय के बाद भारत में खेलों की दशा सुधरने की आशा की जा सकती है. सरकार द्वारा जारी किये गए दिशा निर्देशों को न मानने के कारण ये खेल महासंघ कुछ राहत पाने के लिए कोर्ट की शरण में गए थे पर यहाँ पर कोर्ट ने इनकी बात को नहीं माना और सरकार को आदेश दिया है कि वह जल्दी से जल्दी नए दिशा निर्देश जारी कर दे. देश में एक घातक परंपरा चली आ रही है कि जो भी मिल जाये उससे चिपके रहो और चूंकि हर मामले में नियम बनाने की ज़िम्मेदारी विधायिका पर होती है तो वहां पर बैठे कुछ स्वार्थी तत्व बिना किसी शर्म के कुछ ऐसा जुगाड़ कर ही लेते हैं कि वर्षों तक उनकी कुर्सी सही सलामत रहे भले ही जिस कुर्सी पर वे बैठे हैं उस खेल की दुर्दशा हो जाये ?
            यहाँ पर सवाल यह नहीं है कि आख़िर किस तरह से इन खेलों की दशा सुधारी जाये बल्कि उससे बड़ा सवाल यह है कि कैसे इन खेलों के चुनाव में होने वाले खेलों पर रोक लगायी जाये ? किसी भी संस्था को चलने के लिए लोकतान्त्रिक तरीका सबसे बेहतर होता है पर जिस तरह से लोक तंत्र का लाभ केवल अपने हितों के लए ही उठाया जाने लगा है उससे तो यही लगता है कि अब कोई और तरीका निकाला जाना चाहिए जिससे यह सारा काम ठीक ढंग से चलता रहे ? किसी भी खेल में किसी भी नेता के चुने जाने से कोई नुक्सान नहीं है पर जब ये नेता अपनी राजनैतिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए इन खेल संघों के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को भूल जाते हैं तब बहुत दिक्कत आने लगती है ?आखिर क्यों नहीं हमारे नेता इस बात को स्वीकार कर लेते हैं कि खेल के बारे में सही जानकारी न होने के अभाव में ही वे देश में खेलों का कबाड़ा किये दे रहे हैं ?
         इस मामले में सभी नेता दलगत भावना से ऊपर उठे हुए दिखाई देते हैं क्योंकि हर खेल संघ में हर पार्टी के लोग मलाई खाने के लिए घुसे हुए हैं ? खेल विशेष से जुड़े खिलाडी उस खेल के बारे में सब जानते हैं और वे उसको आगे ले जाने में अपना बहुत अच्छा सहयोग दे सकते हैं पर वहां पर भी भष्ट राजनेता अपनी नाक घुसाए बैठे रहते हैं और खेल के नाम पर बहुत बड़े बड़े घोटाले करते रहते हैं ? किसी खेल के लिए क्या आवश्यकता है यह नेता कभी भी नहीं समझ सकते हैं और जो समझ सकते हैं उनके पास इस मसले पर करने के लिए कुछ भी नहीं होता है. अब भी समय है कि ये नेता यह समझ लें कि उच्च न्यायालय ने देश में खेलों को सुधारने की दिशा में सरकार द्वारा किये जा रहे प्रयासों को सही माना है और अब नेताओं को इन कुर्सियों को खाली कर देना चाहिए पर ये नेता मानने वाले नहीं और अब ये सर्वोच्च न्यायालय जाने की तैयारियों में लगे होंगें ?   

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शनिवार, 16 अक्टूबर 2010

अब होगी जांच

सफलता असफलता की तमाम आशंकाओं के बीच झूलते हुए राष्ट्रमंडल खेल आख़िरकार बहुत अच्छे प्रदर्शन के साथ समाप्त हो गए. इस मामले में सरकार की तरफ से पहले ही कहा गया था कि किसी भी तरह के किसी के भी खिलाफ लगाये जा रहे आरोपों की गहन जांच करायी जाएगी. इसी क्रम में मनमोहन सिंह ने एक जांच समिति बनाकर ३ महीने में उससे रिपोर्ट देने को कहा है. इस समिति की अध्यक्षता पूर्व नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक वी के शुंगलू करेंगें जबकि उल्लेखनीय है कि शुक्रवार से ही कैग ने अपनी जाच फिर से शुरू कर दी है जिसे खेलों के दौरान सुरक्षा कारणों से रोक दिया गया था क्योंकि जहाँ से दस्तावेज़ इकट्ठे करने थे वहां पर खिलाडियों के रहने आदि की भी व्यवस्था थी.
            इस समिति को खेलों से जुड़े हर पहलू पर जांच करने के आदेश और अधिकार दिए गए हैं वह निर्माण के ठेके से लेकर प्रसारण सम्बन्धी विवादों तक की जांच करने के लिए स्वतंत्र है. सरकार ने समिति को जितने अधिकार दिए हैं उससे लगता है कि वह इस बात के लिए बहुत गंभीर है कि पूरे मसले की सच्चाई सामने आनी चाहिए. देश की प्रतिष्ठा को इन खेलों की तैयारियों को लेकर जो गंभीर क्षति पहुँचाने की कोशिश की गयी थी उससे तो बचा लिया गया पर अब जब हम भविष्य में देश में ओलंपिक कराने के लिए दावेदारी करने की सोचे बैठे हैं तो इस तरह की किसी भी गतिविधि से हमारी छवि दागदार होती है. अच्छा ही है कि समिति पूरे मामले की जांच को स्वतंत्र है. अगर किसी भी तरह के भ्रष्टाचार के पाए जाने पर हम दोषियों के खिलाफ़ कार्यवाही करते हैं तो इससे हमें अपने को आगे के लिए तैयार करने में मदद मिलेगी. यह भी सही है कि ओलंपिक करने के लिए बहुत संसाधनों की आवश्यकता होगी पर तब तक भारत इतना सशक्त हो चुका होगा कि इस की बातें होनी ही बंद हो जायेंगीं.
           अभी भी देश में हमें बहुत कुछ सीखने की ज़रुरत है और जब तक हम अपने को ज़िम्मेदार नहीं मानेंगें तब तक इस तरह के भ्रष्टाचार होते ही रहेंगें. अब समय है कि देश के भवष्य से जुड़ी हुई किसी भी परियोजना पर विचार करते समय यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि कहीं से भी पारदर्शिता पर आंच न आने पाए. कोई भी बड़ा आयोजन करते समय या विकास की बड़ी परियोजनाओं से जुड़े हर मसले पर देश को साथ लेना होगा क्योंकि जब बहुत सारे आँख कान होंगें तो गड़बड़ी करना आसान नहीं रह जायेगा. ऐसे हर मामले में एक स्थायी समिति किसी भी तरह की राजनीति से अलग हटकर बनायीं जानी चाहिए जो पूरे मामले की चरण बद्ध तरीके से समीक्षा करती रहे. फिलहाल यह माना जा सकता अहि कि सरकार निष्पक्ष तरीके से इस मामले में जांच करने के लिए संकल्पित है.     

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गुरुवार, 14 अक्टूबर 2010

सफल राष्ट्रमंडल खेल....

आज शाम जब भारत में चल रहे राष्ट्रमंडल खेलों के समापन की घोषणा की जाएगी और साथ ही सभी को ग्लासगो में २०१४ में फिर से जुड़ने के लिए स्काटलैंड की तरफ से न्योता मिलेगा तो देश अपने आप में एक और इतिहास रचने के करीब होगा. यह सही है कि इस तरह के बहुत बड़े आयोजनों में बहुत सारी खामियां रह जाती हैं पर इस बार इन खामियों की जिस तरह से मीडिया ने धज्जियाँ उडायीं उससे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि को बहुत धक्का लगा. मीडिया देश में पूरी तरह से काम करने के लिए स्वतंत्र है पर कहीं न कहीं से ऐसा भी तो दिखाई देना चाहिए कि कुछ खामियों के बीच में भी देश ने इस तरह के आयोजन को पूरी सफलता से आयोजित का लिया है.
          मीडिया ने जिस तरह से अचानक ही जून में सक्रिय होकर इन खेलों की नकारात्मक छवि बनानी शुरू कर दी उससे भाग लेने वाले देशों और खिलाड़ियों के बीच में बहुत ही गलत सन्देश गया. खिलाड़ियों को तो पूरी तरह से खेल गाँव में ही रहना था पर खेल देखने आने वाले पर्यटकों और खेल प्रेमियों के बीच यह झूठी छवि ही भारी पड़ गयी और इन खेलों के लिए देश के पर्यटन उद्योग को जो कुछ हासिल हो सकता था वह नहीं मिल सका. देश ने इन नकारात्मक छवि प्रस्तुतीकरण के कारण ही बहुत कुछ वह हासिल नहीं किया जो उसे मिल सकता था. देश में भ्रष्टाचार बहुत फ़ैल चुका है तो हम सुरेश कलमाड़ी से यह कैसे उम्मीद लगा सकते हैं कि वे बिलकुल साफ़ सुथरा काम करने वाले लोगों को ढूंढ कर लायेंगें और सारे काम उनसे ही कराये जायेंगें. फिलहाल कुछ लोगों ने नियोजित तरीके से इन खेलों का विरोध करने का जो तरीका अपनाया था उसमें उन्हें कुछ हद तक कामयाबी भी मिल गयी पर इन सबके चक्कर में देश का बहुत नुकसान हो गया.
          बहुत से लोगों को इस बात पर भी आपत्ति है कि जब देश में भूख और गरीबी है तो इस तरह के खेलों का कोई मतलब नहीं है ? पर यह सवाल उठाने वाले इस मसले का कोई समाधान क्यों नहीं ढूंढते ? आलोचना करना बहुत आसान है और जब धरातल पर कुछ करना पड़ता है तो सब कुछ पता चलता है. खेल सभ्य समाज का एक हिस्सा हैं और जब पहले और १९८२  में सीमित संसाधनों से हमने एशियाई खेल करा लिए थे तो अब आर्थिक रूप से संभालता भारत आखिर यह सब क्यों नहीं कर सकता है ? खेलों के आलोचना करने वाले अगर अपनी यह शक्ति सरकारी योजनाओं को सही व्यक्ति तक पहुँचाने का संकल्प ही ले लें तो देश सुधर जाये. फिलहाल देश में इन खेलों के सफल आयोजन के बाद अब भारत को ओलंपिक खेलों की मेजबानी मिलने में बहुत देर नहीं लगेगी.        

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सोमवार, 6 सितंबर 2010

खेल भावना और दलाली

जिस तरह से क्रिकेट ने पूरे एशियाई महाद्वीप को अपनी चपेट में ले रखा है उसको देखते हुए यहाँ की टीम भी जब तब नए विवादों में फंसती ही रहती हैं. पहले मैच फिक्सिंग के आरोपों ने भारत के कई बड़े नामों की बलि ले ली थी  और अब भी यह भूत क्रिकेट का पीछा छोड़ता नज़र नहीं आ रहा है. बहुत सारे खेलों की चकाचौंध में खिलाडी और जनता जिस तरह से अंधी होती जा रही है उसे देखते हुए कुछ भी हो सकता है. एक ऐसा घटिया खेल जिसमें अगर किस्मत साथ दे जाये तो दुनिया की सबसे फिसड्डी टीम सबसे ताकतवर टीम को हरा सकती है ? खेल के इस तरह के संस्करण के लिए और क्या सोचा भी जा सकता है ? अभी तक यही समझा जा रहा था कि केवल अधिक पैसे और रोमांच के कारण ही क्रिकेट में इस तरह की गंदगी सामने आ रही है पर अब जिस तरह से खिलाड़ी केवल पैसों के लिए ही खेलना चाहते हैं और केवल पैसा ही उनके लिए सब कुछ हो गया है उससे क्रिकेट का ही बेड़ा गर्क होने वाला है.
            यह खेल पहले भद्र जनों का खेल ही कहा जाता था पर अब जिस तरह से सारा खेल किसी और दिशा में ही घूमता दिखाई देने लगा है उससे अब कुछ भी नहीं सोचा और समझा जा सकता है ? खेल को साफ़ सुथरा बनाये रखने की पूरी जिमेदारी अब केवल इसको नियत्रित करने वाली संस्था के ऊपर ही आ जाती है. जिस तरह से केवल कुछ लोगों ने खेल को बंधक बनाने का प्रयास किया है उससे तो यही लगता है कि आई सी सी केवल बातें करना ही जानती है और कुछ भी ठोस कर पाना उसके बस की बात नहीं रह गयी है ? पैसे ने भारत में इस खेल को जिस मुकाम तक पहुंचा दिया है वह किसी भी देश के लिए गर्व की बात हो सकती है पर इसी पैसे ने इस खेल की मूल  भावना को ही मार डालने का काम भी किया है.
          किसी भी खेल को खेलने वालों के भविष्य की गारंटी तो होनी ही चाहिए पर जिस तरह से भारत में इस खेल ने पूरा धंधा बना लिया है उस से अन्य खेलों पर ग्रहण सा लग गया है ? राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय बोर्ड अपनी टीम को सिर्फ पैसों के लिए ही तो नहीं भेज रहा है क्योंकि अगर वह यहाँ पर अपनी टीम को खिलाता है तो उसका बहुत बड़ा आर्थिक नुकसान हो जायेगा ? देश की प्रतिष्ठा से बहुत आगे अब पैसा आ गया है और यह सब तब हो रहा है जब मराठा क्षत्रप शरद पावर इस संस्था के प्रमुख हैं ? क्या हो गया है इस देश की आत्मा को जो इस तरह के घटिया खेल में अपना समय व्यर्थ करने में लगी हुई है ? अब चाहे जो भी हो क्रिकेट के समर्थकों और प्रशंसकों को अपने से यह सवाल तो पूछना ही होगा की क्या इसी तरह की ओछी हरकतें देखने के लिए वे क्रिकेट देखते हैं ? तब तक क्रिकेट का भट्ठा इसे खेलने वाले अंतर्राष्ट्रीय खिलाडियों को बैठाने का मौका दिया जाना चाहिए ?  


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सोमवार, 21 जून 2010

साइना की जीत....

इस देश में खेल के नाम पर बहुत कम बार ही खुश होने के मौके आते हैं क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हमारा प्रदर्शन इतना लचर होता है कि हम कहीं भी टिक नहीं पाते हैं. फिर भी व्यक्तिगत प्रतिस्पर्धा में हमारे बहुत सारे खिलाड़ी कभी कभी हमें यह ख़ुशी दे जाते हैं. आज भी यह देश क्रिकेट ओढ़ता और बिछाता है फिर भी गन्दी मानसिकता से खेले जाने वाले तथा कथित भद्र जनों के खेल क्रिकेट में अब कितनी गंदगी भर गयी है इसका अंदाज़ा अभी तक किसी को नहीं हो पाया है. टेनिस, कुश्ती, निशानेबाज़ी और अब बैडमिन्टन ने देश में खिलाडियों की प्रतिभा का बखान तो कर ही दिया पर हमारा खेल तंत्र किसी भी खेल को जीने नहीं देता है. एक बात जिस पर विचार किया जाना बहुत आवश्यक है कि जिस भी देश ने अपने यहाँ एशियाई या ओलम्पिक खेल कराये उसके बाद से वह कुछ खेलों के साथ बड़े देशों को भी चुनौती देने लगे पर भारत के मामले में यह बिलकुल उल्टा ही साबित हुआ है. किसी बड़ी स्पर्धा के बाद हमारा प्रदर्शन और लचर ही हो जाता है.
          आज साइना के प्रदर्शन ने हर भारतीय को गौरव प्रदान किया है अभी तक केवल क्रिकेट का गुणगान करने वाले मीडिया ने भी अब अन्य खेलों में खिलाडियों के प्रदर्शन को खबर के रूप में लेना शुरू कर दिया है जो कि एक अच्छा संकेत है. मीडिया अभी तक क्रिकेट में भारत की हर हार जीत पर पूरे पन्ने रंग दिया करता था और व्यक्तिगत प्रदर्शन करने वाले खिलाडियों के बारे में कहीं कोने में कोई खबर लगा दिया करता था. अब समय के साथ कुछ बदलाव आया है. जब से एशियाई खेलों में बोर्ड ने अपनी टीम भेजने से मना कर दिया है तब से निश्चित तौर पर बोर्ड के बारे में लोगों की ख़राब राय तो बनी ही है. अब भारत में क्रिकेट की एक ऐसी संस्था की आवश्यकता है जो यह तय कर सके कि देश की टीम को कैसे कहाँ पर और कब खेलना है. एशियाई खेलों में टीम न भेजने के फैसले पर बोर्ड की मान्यता रद्द कर दी जानी चाहिए और उसकी टीम को भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली टीम न माना जाये. क्रिकेट के सामने नतमस्तक नेताओं ने ही अन्य खेलों को पनपने का अवसर नहीं दिया है. अब भी समय है कि इस मामले में भूल सुधार ली जाये.
    फिल हाल तो साइना जैसे खिलाड़ियों को बहुत बहुत बधाई है कि उन्होंने इस देश में इत्तनी विपरीत परिस्थितयों में भी अपनी भावना को जिंदा रखकर किसी अन्य खेल को खेलने और उसमें भी ऊपर चढ़ने का जज्बा दिखाया है. साइना देश तुम्हारे साथ है और तुम्हारे जैसे खिलाड़ी ही इस देश से क्रिकेट का बुखार उतार सकते हैं.   


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शुक्रवार, 14 मई 2010

केवल क्रिकेट ही क्यों ?

देश में लगता है अब लोग बहुत खाली रहने लगे हैं. आज जिधर देखो केवल क्रिकेट की बातें ही होती हैं जिन्हें इस खेल के बारे में कुछ भी नहीं पता वे भी विशेषज्ञों की तरह सलाह देते दिखाई देते हैं. भारत के १९८३ में विश्व कप जीतने के बाद इस खेल के लिए कुछ ऐसी दीवानगी बढ़ी कि आज हर कोई इसके पीछे पागल हुआ जा रहा है. टी २० विश्व कप से बाहर होने के बाद जिस तरह से खिलाडियों को बुरा भला कहा जा रहा है उसके लिए केवल खिलाडी ही ज़िम्मेदार नहीं हैं. पैसे ने इस खेल के स्वरुप को इतना बिगाड़ के रख दिया है कि कोई इसकी बुराई को देखना भी नहीं चाहता. देश में क्रिकेट एक नए जुएँ के रूप में सामने आ गया है किसी भी महत्वपूर्ण मैच पर पता नहीं कितने रुपयों का सट्टा लगाया जाता है और इस तरह से इस भद्र जनों के खेल में सारी गंदगी घुसी जा रही है.
      देश की महिला क्रिकेट टीम ने पुरुषों की अपेक्षा अच्छा प्रदर्शन किया पर कहीं उसका व्यापक ज़िक्र नहीं है, विश्वनाथन आनंद ने टोपलोव को हराकर फिर से शीर्ष वरीयता हासिल की यह खबर कहाँ दिखाई दी ? हमारी हाकी टीम जितना अच्छा प्रदर्शन मलेशिया में कर रही है कितने लोग जानते हैं ? बस यहीं से बुराई शुरू हो जाती है क्योंकि हम सभी ने केवल क्रिकेट को खेल माना है और बाकी भारत के खिलाड़ी कैसा प्रदर्शन कर रहे हैं इसकी तो लोगों को जानकारी भी नहीं होने पाती है ? देश में खेलों के इस तरह की दुर्दशा के लिए निश्चित तौर पर खेल संघ और नीतियां ज़िम्मेदार हैं पर समाज के अन्य लोग क्या अपनी ज़िम्मेदारी निभा रहे हैं ?
     देश के अन्य खेलों के लिए मीडिया के पास कितना स्थान है और क्या वास्तव में मीडिया वह स्थान ईमानदारी से अन्य खेलों को देना भी चाहता है ? आई पी एल ने जितने पन्ने पाए क्या कोई दूसरा खेल पूरे साल में भी उतना स्थान पा सकते हैं ? क्यों आख़िर मीडिया क्यों अपनी ज़िम्मेदारी से भाग रहा है ? शायद आज ज़िम्मेदारी से अधिक जिंदा रहना ज़रूरी है तो बस मीडिया भी वही दिखाना और पढ़वाना चाहता है जो बिक सकता है. अच्छा हो कि इस तरह की अन्य बातों पर ध्यान देने के स्थान पर सभी खेलों पर पूरा ध्यान दिया जाये.....  

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सोमवार, 3 मई 2010

खेल संघों में सफाई

खेल मंत्री एम एस गिल ने जिस तरह से यह कहा है कि नए संशोधन के बाद खेल संघों के पदाधिकारी १० साल से अधिक समय तक अपने पदों पर नहीं रह पायेंगें उससे निश्चित ही खेलों के लिए कुछ अच्छा होने वाला है . सरकार में इस नए संशोधन की आवश्यकता बहुत दिनों से महसूस की जा रही थी. आज देश में खेलों की जो दुर्दशा है उसके पीछे इन खेल संघों के पदाधिकारियों की बहुत बड़ी भूमिका रहती है. कई मामलों में ऐसा देखा गया है कि चंद लोग इतने दिनों से यहाँ पर जमे हुए हैं की उनके लिए इन संघों का भला बुरा सोचने का समय ही नहीं है. देश में जब राष्ट्रपति के लिए सीमा है कि कोई व्यक्ति दो बार से अधिक नहीं बन सकता है तो अच्छे और सुचारू ढंग से चलाने के लिए इन खेल संघों में पूरी पारदर्शिता लाने के लिए इनके अध्यक्षों को भी अधिक समय तक पदों पर नहीं बने रहना चाहिए. खेल से जुड़े संघों पर अच्छा हो कि सम्बंधित खेलों से जुड़े व्यक्तियों को ही चुना जाये ताकि वे खेलों को नयी ऊंचाइयों तक ले जाने में सफल हो सकें. देश में खेलों की जो दशा है वह किसी से भी छिपी नहीं है और इनमें जुड़े लोगों के लिए अब यह मलाई खाने से अधिक कुछ भी नहीं है. जो लोग खेल के बारे में कुछ नहीं जानते वे यहाँ पर बैठे हैं जब वे सम्बंधित खेल के बारे में कुछ नहीं जानते तो किस तरह से वे खेलों का भला कर पायेंगें ?
अच्छा हो कि इस संशोधन के साथ ही नियमों में व्यापक परिवर्तन कर दिए जायें जिससे इन खेलों की दुर्दशा से बचा जा सके. पैसे ने क्रिकेट को किस तरह से नंगा कर दिया है और मज़े की बात यह है कि उस पर अभी तक केवल पर्दा डालने की बातें ही की जाती रही हैं. सहायता देने और खेलों के विकास की बात अपनी जगह है पर जब केवल पैसों से ही किसी खेल को तौला जाने लगे तब गड़बड़ तो होनी ही है. देश में बहुत कुछ आज के परिदृश्य में अप्रासंगिक हो चुका है कोई नियम जब बनाये जाते हैं तो उस समय के बेहतर नियम होते हैं पर समय के साथ उनमें सुधार की ज़रुरत होती ही है. समय के साथ परिवर्तन होना आवश्यक है जिन जगहों पर इसे अपनाया जाता है वहां पर सफलता साथ में चलती है पर पुराने नियमों से नए समय में नहीं चला जा सकता है. ऐसे नियम जो बोझ बने हों उन्हें तुरंत ही बदल देना चाहिए जिससे खेलों के भले के बारे में भी सोचा जा सके. हो सकता है कि देश में खेलों की दशा को सुधारने में यह नियम कुछ कारगर हो जाये और तब खेल मंत्री गिल का नाम लोग इस बदलाव के लिए हमेशा ही याद रखेंगें.  
   

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सोमवार, 19 अप्रैल 2010

थरूर का इस्तीफ़ा

अच्छा ही हुआ की विदेश राज्य मंत्री शशि थरूर ने अपना त्यागपत्र दे दिया क्योंकि जिस तरह से विपक्ष उनके इस्तीफे की मांग पर अड़ कर संसद को नहीं चलने दे रहा था उससे यह बहुत आवश्यक हो गया था कि संसद में गतिरोध को तोड़ा जाये. शशि विदेशों में पले बढ़े हैं उनको इस तरह के माहौल की आदत नहीं रही है जैसे कि विदेशों में होता रहता है ? इससे पहले भी वे कई बार नीतिगत मुद्दों पर सरकार से अपनी मत भिन्नता को सार्वजनिक रूप से इंटरनेट पर कह चुके हैं. आई पी एल में वास्तव में पैसे का बहुत बड़ा खेल हो रहा है  इसकी पूरी तरह से निष्पक्ष जांच होनी ही चाहिए फिलहाल पहले शिकार के तौर पर शशि सामने आ चुके हैं. आज के समय में किसी पर भी कीचड़ उछालने से अच्छा है कि इस पूरे मामले की एक विशेष जांच करायी जाये. देश में इतने बड़े आयोजन का होना अच्छा है पर सरकार को बिना पूरा टैक्स दिए कोई किस तरह से अपनी झोली भर सकता है जबकि सरकार से जुड़े कई मंत्री क्रिकेट में पूरी तरह से घुसे हुए हैं ?
  सरकार को बी सी सी आई से पूरी तरह से टैक्स लेना चाहिए क्योंकि यह दुनिया के सबसे धनी बोर्ड में से है और जब वह अपनी हर चीज़ को बेच कर पूरी तरह से लाभ कमा रहा है तो उससे किस तरह से रियायत की जा सकती है ? खेल के पीछे केवल खेल ही हो तो समझ में आता है पर खेल के पीछे और भी खेल चलने लगें तो देश का नुकसान ही होने वाला है ? यह सच है कि क्रिकेट बोर्ड ने बहुत अच्छा काम किया है पर केवल कुछ अच्छा किया है  इसलिए वे क्या कुछ भी करने के लिए स्वतंत्र हैं ? बिलकुल नहीं वहां पर केवल पैसा बोल रहा है. देश की टीम को ४०० करोड़ रुपयों में खरीदा जाता है तो आई पी एल की एक टीम १७०० करोड़ में बिकती है ? क्या आई पी एल की टीम देश की टीम से ऊपर हो सकती है ? क्या इस तरह के किसी भी आयोजन के लिए किसी को इतनी स्वतंत्रता दी जानी चाहिए ? अब समय है कि इस खेल के पीछे के पूरे खेल को सामने लाया जाया.      

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रविवार, 18 अप्रैल 2010

बेंगलुरु धमाका

बेंगलुरु में आई पी एल के मैच से ठीक पहले धमाका करके आतंकियों और देश द्रोहियों ने एक बार फिर से अपनी उपस्थिति का एहसास करा ही दिया है. देश में जनसंख्या और लापरवाही के कारण वैसे भी कोई भी नया व्यक्ति कहीं भी घूमता फिरता रहता है और कोई भी उसकी इस बात के लिए फ़िक्र नहीं करता है कि वह कौन है और कहाँ से आया है ? आज के समय में हम सभी को यह ध्यान देना ही होगा जिससे कभी भी कोई अजनबी इस तरह की घटना को अंजाम देकर आसानी से बचकर न निकल सके. जैसा कि स्पष्ट है कि आने वाले राष्ट्र मंडल खेलों से पहले पाक परस्त आतंकी यह दिखाने की पूरी कोशिश करेंगें कि भारत भी उतना सुरक्षित नहीं है जितना समझा जाता है और इसके लिए वे इस तरह के अन्य महत्वपूर्ण आयोजनों में बाधा डालने का काम करते ही रहेंगें. इतना सब होने के बाद भी जिस तरह से अभी तक आई पी एल का आयोजन पूरी सुरक्षा के साथ हो रहा है वह आतंकियों को रास नहीं आ रहा है.
आज इस घटना के पीछे चाहे जो भी हो पर एक बात तो तय है कि भारत विरोधी ताकतें हमारी छवि को नुकसान पहुँचाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती हैं. अब यह हमारी ज़िम्मेदारी बनती है कि हम अपने खुफिया तंत्र, पुलिस, जनता को इतना जागरूक कर लें कि किसी भी स्तर पर भ्रष्टाचार के कारण कोई पैसे लेकर देश विरोधियों को पनाह न दे बैठे ? देश में सबसे अधिक ध्यान देने की बात यह भी है कि माओवादियों और आतंकियों के बीच कोई सम्बन्ध भी न बनने पाए क्योंकि इस तरह से देश के अन्दर ही एक बहुत ख़तरनाक गठजोड़ बन जायेगा जिसका खामियाज़ा पूरे देश को भुगतना पड़ेगा. आज जब राष्ट्रीय पहचान अंक की बात की जा रही है तो हम सभी को इसमें और वर्तमान में चल रही जनगणना में अपना पूरा ध्यान देकर सही सूचनाएँ लिखानी चाहिए क्योंकि इन आंकड़ों से ही बाद में सरकार अपनी योजनायें बनाती हैं. फिलहाल तो हम सभी को आज से ही यह संकल्प लेना ही होगा कि अपने आस-पास की हर संदिग्ध गतिविधि की खबर पुलिस तक पहुँचने का काम करें साथ ही पुलिस में भी कुछ ऐसा किया जाना चाहिए कि इस तरह की सूचनाएँ गोपनीय रखी जाएँ और इन पर त्वरित कार्यवाही भी की जाए. यह तो अच्छा ही हुआ कि बेंगलुरु में जान माल का बहुत बड़ा नुकसान नहीं हुआ वरना सुरक्षा के मोर्चे पर कुछ लोगों को भारत को कटघरे में खड़ा करने का अवसर तो मिल ही जाता.      

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शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010

आई पी एल और पैसा ?

क्रिकेट की दुनिया में आई पी एल ने जिस तरह से तहलका मचाया हुआ है उसके शोर में बहुत सारे मुद्दे दबे जा रहे हैं. कोचीन की टीम की नीलामी में जिस तरह से शशि थरूर और ललित मोदी पर वित्तीय अनियमितता का आरोप लग रहा है उसकी अनदेखी अब केंद्र सरकार नहीं कर सकती है. यह सही है कि इस आयोजन ने सरकार को बेहिसाब आय करायी है पर इस तरह की आय में कितनी सच्चाई है अब इसका पता लगाना ही होगा. एक टीम की नीलामी में जिस तरह से तरह तरह की बातें सामने आ रही हैं उससे तो यही लगता है कि आने वाले समय में यह मामला और अधिक तूल पकड़ने जा रहा है. क्रिकेट का यह देश दीवाना है पर दीवानगी के चक्कर में किसी भी तरह की अनियमितता को सहन नहीं किया जाना चाहिए. जब से क्रिकेट के पैसों पर राजनेताओं की नज़रें लग गयी हैं तभी से इस में बहुत गंदगी आ गयी है. लोगों ने इस खेल के जरिये भी अपने व्यक्तिगत हित साधने का काम शुरू कर दिया है. भारत लोकतान्त्रिक देश है और कोई भी किसी को भी कोई काम करने से रोक नहीं सकता है पर करने वाले इस बात का भी ध्यान रखें कि किसी भी तरह के अनुचित काम कहीं भी बर्दाश्त नहीं किये जायेंगें.
    आज संसद में इस मामले पर काफी हल्ला मचने की संभावनाएं हैं क्योंकि विपक्षी दल इसी बहाने से सरकार को शशि थरूर को लेकर घेरना चाहते हैं. अच्छा है कि इस तरह के विशुद्ध खेल के मामले में जब इतनी गंदगी घुस गयी हो तो उसे साफ़ करने के लिए कहीं न कहीं से प्रारंभ तो करना ही होगा ? आई पी एल से जुड़ी हर गतिविधि पर अब सरकार को नज़र रखनी होगी क्योंकि यहाँ पर पूँजी का जिस तेज़ी से प्रवाह हो रहा है उस पर कोई रोक तो होनी ही चाहिए ? देश को यह जानने का पूरा हक़ है कि आख़िर कौन क्या कर रहा है ? आज नहीं तो कल यह सारा सामने आ ही जायेगा पर इस तरह के मामलों पर संसद को ठप करना कहीं से भी उचित नहीं है. संसद में इस मामले पर पूरी बहस करायी जानी चाहिए जिससे तथ्यों पर पूरी रौशनी पड़ सके. साथ ही छोटे छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में भी सट्टेबाजी पर नज़र रखनी चाहिए क्योंकि देश में कई स्थानों पर सट्टेबाजी की ख़बरें आती रही हैं. कहीं ऐसा न हो कि यह आयोजन इतना विवादित हो जाये कि आगे इसे चला पाना ही एक समस्या हो जाये ? इसके सुचारू सञ्चालन के लिए इससे जुड़े हर पक्ष को अपने काम में पारदर्शिता बरतनी ही होगी तभी यह दीर्घ काल तक चल पायेगा.


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शुक्रवार, 19 मार्च 2010

राष्ट्रीय स्तर के खिलाडी का हाल...

देश में सरकारें खेलों के विकास के लिए चाहे जितनी बड़ी बातें करें पर ज़मीनी स्तर पर सच्चाई कितनी कड़वी हो सकती है यह राजस्थान के भरतपुर जिले के पहलवान टिंकू खान के बारे में जानकर पता चल जाता है. खान ने ९९/२००० में राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में प्रदेश का प्रतिनिधित्व किया था पर अब वे अपनी आजीविका चलाने के लिए नरेगा के पंजीकृत मजदूर हैं. इस देश में जब आई पी एल में पैसों की बारिश हो रही है तभी अन्य खेलों से जुड़े खिलाड़ी इतने मजबूर हो गए हैं कि खेलने के बाद उनके लिए नौकरी तो बहुत दूर की बात है खाने पीने के भी लाले पड़े रहते हैं. आज भी देश में एक अच्छी और प्रभावी खेल नीति की कमी है हम सभी विश्व स्तरीय खेलों में अपने प्रदर्शन का रोना रोते रहते हैं पर इन परिस्थितयों में भी कोई अगर किसी खेल की तरफ जाता है तो वह वास्तव में धन्य है.
            आज भी देश में खेलों के नाम पर राजनीति हो रही है जबकि अच्छी प्रतिभाएं कहीं किसी दूर दराज़ के इलाके में दम तोड़ती चली जाती हैं. देश में नेताओं के पास क्या कुछ नहीं है पर अब तो खेल संघों में भी दलीय राजनीति का बोलबाला हो चुका है. विश्व भर में शायद भारत ही एक मात्र देश होगा जहाँ नेता हर चीज़ को अपने कब्ज़े में रखना चाहते हैं. अब नेता देश के नीति नियंता बन ही चुके हैं तो खेल को उन्हें खिलाड़ियों के लिए ही छोड़ देना चाहिए ? पर कुछ खेल संघों में पैसे की बहुतायत भी शायद उन्हें बैठने नहीं देती है और वे फिर से वहीं पर वापस लौट आते हैं . केवल इनको अपना स्वार्थ दिखाई देता है जिसके पीछे देश के खेलों का दुर्भाग्य शुरू हो जाता है. आज भी समय है कि कुछ ऐसा होना चाहिए जिससे ये व्यस्त नेता किसी भी खेल संघ में अनावश्यक हस्तक्षेप न कर सकें. शरद पवार जैसे लोग अपना मंत्रालय तो ठीक से संभल नहीं पा रहे हैं पर उन्हें क्रिकेट की ज्यादा चिंता हो रही है ? अच्छा हो कि यह सब खिलाड़ियों के हाथ में ही रहे जिससे भविष्य में कोई टिंकू खान नरेगा में मजदूर न बनने पाए.    
 


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गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

क्रिकेट परीक्षा के समय ही क्यों ?

कहा जाता है कि भारत में दो ही चीज़ें हैं जो पूरे देश को जोड़ कर रखती हैं रेल और क्रिकेट ! कल का दिन दोनों का ही था इन दोनों मसलों पर सारा देश सब कुछ भूल सा जाता है. रेल जहाँ हमारी आवश्यकता है वहीं क्रिकेट हमारी दीवानगी.... कल पूरे दिन ही दोनों ने खूब धमाल किया. सुबह से समाचारों में रेल थी तो सचिन की बुलेट ट्रेन चलने के बाद रेल की ख़बरें पीछे होती चली गयी. ठीक है कि खेल होने चाहिए खेलों से विकास होता है, सद्भाव बढ़ता है और भी बहुत सारी बातें खेलों को लेकर कही जाती हैं.... पर क्या इतने के बाद भी यह कहा जा सकता है कि जिस तरह से भारत में क्रिकेट को लिया जाता है वह दीवानगी से भी बहुत ज्यादा है ?
             यह सही है कि देश में क्रिकेट का यही समय है फिर बहुत गर्मी और बरसात में खेला ही नहीं जा सकता है पर जब पूरा भारत अपने बच्चों के भविष्य के बारे में चिंतित होता है कि पता नहीं उनके बच्चों की परीक्षाएं कैसी जायेंगीं ठीक उसी समय बच्चों के दिमाग में क्रिकेट भी चल पड़ता है. अब जब देश में ही खेल हो रहे हैं तो उसे आखिर कब तक बचा जा सकता है ? सारी जगहों पर केवल क्रिकेट की ही चर्चा हो तो बच्चों का ध्यान किस तरह से अपनी पढाई में लग सकता है ?
             यह सही है कि देश में सभी को अपनी बातें कहने और करने का हक है पर क्या खेल के चक्कर में बच्चों के भविष्य को इस तरह से दांव पर लगाया जाना चाहिए ? आज भी परीक्षा के समय पर इतना ज्यादा क्रिकेट कहीं न कहीं से बच्चों के भविष्य पर प्रभाव तो डालता ही है . अब भी समय है कि इन आयोजनों के समय के बारे में फिर से विचार किया जाना चाहिए. पहले इतने साधन नहीं थे और न ही इतना ज्यादा क्रिकेट होता था तो पढाई में कम व्यवधान आता था पर आज हर जगह सबके पास सारे संसाधन उपलब्ध हैं तो कोई भी हर समय इससे जुडा हुआ है. आज जब देश में क्रिकेट को लेकर खुशी है तो ही सही समय है इस पर विचार करने के लिए क्योंकि जब टीम का प्रदर्शन खराब हो जाता है तो जो आज चरण वंदना में लगे हुए हैं गाली देने में बिलकुल भी नहीं  चूकते हैं.....  


मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...