मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शुक्रवार, 16 सितंबर 2011

खेल नीति में राजनीति

एशिया विजेता बनकर भारत लौटने वाली हाकी टीम के साथ ईनाम के नाम पर जो मज़ाक किया गया उसे हाकी खिलाड़ियों समेत देश के खेल प्रेमी कभी भी नहीं भूल पायेंगें क्योंकि इतनी बड़ी स्पर्धा में इतने अरसे बाद सर्वोत्तम बनना किसी भी देश के लिए गर्व की बात होती है पर हमारे देश ने जैसे अपने ही विजेताओं को अपमानित करने की क़सम खा रखी है. देश में खेलों के लिए एक समान नीति और अवसर की बातें करने वाले लोग यह भूल जाते हैं कि इस देश में क्रिकेट के नाम पर अन्य खेलों के साथ सौतेलापन हमेशा ही किया जाता रहता है ? इतने दिनों के बाद इस टीम ने बड़ी सफलता पाई थी तो उनके सम्मान की उचित व्यवस्था की जानी चाहिए थी पर इसे भी सामान्य रस्म अदायगी के रूप में ले रूप में लिया गया और जब टीम ने अपमानित करने वाली धनराशि २५००० रु० लेने से मना कर दिया जाये तब जाकर मंत्रालय की नींद टूटी और यह राशि बढ़ाई गयी. बात यहाँ पैसों की नहीं वरन उचित सम्मान की है जिसकी यह टीम हक़दार थी.
    क्या देश के राजनैतिक तंत्र की इतनी औकात है कि वो क्रिकेट कि किसी बड़ी स्पर्धा में जीतने केबाद टीम को इतनी धनराशि देने की हिम्मत जुटा सके ? अगर नहीं तो खेल मंत्रालय के अधिकारियों या नेताओं को इस एशिया विजेता टीम का अपमान करने की हिम्मत कैसे हो गयी ? ये खिलाड़ी हमारे वास्तविक गौरव हैं और क्रिकेट जैसे अप्रत्याशित खेल के स्थान पर ये उस खेल का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसमें हर खिलाड़ी के लिए पूरे समय खेलने का दम भी बहुत कुछ दिशा तय करता है क्रिकेट में आज चोट खाए और केवल पैसों के नाम पर खेलने वाले केवल बड़े नामों को ढो रही टीम की जिस तरह से अंग्रेजों द्वारा धुलाई की जा रही है उससे मुझे तो बहुत संतोष मिल रहा है क्योंकि जिस टीम के पास देश के लिए समय नहीं है उसके साथ ऐसा ही होना चाहिए. देश में खेलों का गौरव केवल क्रिकेट से कैसे जुड़ गया यह तो नेता ही बता सकते हैं पर किसी भी तरह से इस बात को अब बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है कि किसी भी खेल के साथ इस तरह का भेद भाव किया जाये. क्रिकेट के खिलाड़ी ज़्यादा पैसे मिलने पर फिट हो जाते है और देश के लिए खेलने के समय जैसे वे खेलना ही भूल जाते हैं.
   जिन नेताओं ने देश में नीतियां बनाने के लिए जनता के पैसे और संसद की गरिमा का ध्यान रखना बंद कर दिया है उनके लिए भी कुछ ऐसा ही होना चाहिए उन्हें कैसा लगेगा कि अगर उन्हें भी कोई अच्छा काम करने पर १० रु प्रति सांसद ईनाम में देने लगे ? आज देश को इस बात की ज़रुरत है कि जनता विरोध स्वरुप इन नेताओं को संख्या के हिसाब से ईनाम के रूप में कुछ पैसे अवश्य दे जिससे इन्हें इस तरह के अपमान का महसूस हो सके ? पर नैतिकता की बातें करने वाले खोखले हो चुके किसी भी तंत्र के लिए जगाने का कोई भी प्रयास कहाँ तक कारगर हो पायेगा यह तो समय ही बताएगा पर आज देश में खेलों की दुर्दशा पर पूरी संजीदगी से विचार किये जाने की आवश्यकता है और बिना इसके कुछ भी सही ढंग से नहीं किया जा सकता है. देश को आज एक सही और व्यापक खेल नीति की आवश्यकता है जिसमें क्रिकेट को पूरी तरह से शामिल किया जाना भी ज़रूरी है क्योंकि पूरे देश के खेल परिदृश्य को बिगाड़ने वाले इस खेल पर लगाम लगाये बिना कुछ भी ठीक ढंग से नहीं किया जा सकेगा.

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