मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Monday, 13 August 2012

लन्दन में ६ पर ५५ ?

               लन्दन ओलम्पिक में पेइचिंग के मुक़ाबले अधिक पदक जीतने की ख़ुशी के साथ ही एक बात तय हो गयी कि अगर देश कि प्रतिभा को विकसित होने के अवसर मिलें तो देश के लिए पदक जीत कर लाने में कहीं से भी पीछे नहीं रहने वाले हैं. भारत ने इस बार जहाँ पदकों की संख्या में बढ़ोत्तरी की है वहीं गोल्ड पर दावा न ठोंक पाने के कारण उसकी मेडल रंकिंग में में गिरावट देखी गयी है, फिर भी जिस तरह से व्यक्तिगत स्पर्धाओं में हमारे खिलाड़ियों ने बेहतर प्रदर्शन किया है वह अपने आप में बहुत बड़ी उपलब्धि है क्योंकि खेलों में प्रतिभा को नज़र अंदाज़ करके जिस तरह से राजनीति चलायी जाती है उस कारण से भी किसी भी युगल या टीम स्पर्धा में हमारा प्रदर्शन हमेशा की तरह लचर ही रहता है. जिस तरह से देश के दूर दराज़ के क्षेत्रों में रहने वाले खिलाड़ियों ने संसाधनों के अभाव में भी अपनी तैयारियों को जारी रखते हुए देश को ख़ुशी के ये क्षण दिए हैं उन्हें देश कभी भी नहीं भूल पायेगा. प्रतिभा का सम्मान करना हम जब तक नहीं सीखेंगें तब तक किसी भी तरह से खेलों में हमारा प्रदर्शन टीम के रूप में सबके सामने नहीं आ पायेगा. १२० करोड़ लोगों वाले देश का स्कोर ६ पदक और ५५ वाँ स्थान आख़िर किस खेल नीति की तरफ इशारा करता है ?
       कहने के लिए तो देश में बहुत सारे खेल संघ हैं जो देश में कथित तौर पर खेलों को बढ़ावा देने का काम कर रहे हैं पर वास्तव में अगर देखा जाये तो इन संघों में जिस तरह से मनमानी करते हुए खिलाड़ियों के साथ नाइंसाफी की जाती उसका ही नतीज़ा यह है कि खेल संघों पर टिके हुए अधिकतर खेलों में भारत का प्रदर्शन शर्मनाक ही रहा है. व्यक्तिगत स्पर्धा में जहाँ एक खिलाड़ी पर ही सब कुछ निर्भर करता है और मीडिया के दख़ल के कारण ही आज व्यक्तिगत प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों के साथ कुछ हद तक न्याय होने लगा है जिससे भी भारत के प्रदर्शन में सुधार आया है. अगर खेल के स्तर में वास्तव में सुधार करना है तो सबसे पहले नेताओं को इन खेल संघों के चुनावों में भाग लेने पर रोक लगा दी जानी चाहिए क्योंकि ये अपनी व्यक्तिगत राजनीति के आगे देश के सम्मान को भी तक पर रखने से नहीं चूकते हैं. नेताओं को राजनीति के अतिरिक्त किसी भी गतिविधि में भाग लेने से रोकने के लिए एक व्यापक नीति की आवश्यकता है क्योंकि जब तक नेताओं को अपनी नेतागिरी यहाँ चलाने का अवसर मिलता रहेगा ये अपने हितों के लिए प्रतिभाओं का सम्मान नहीं कर पायेंगें.
       जिस तरह भारत को टेनिस में एक पदक तो आसानी से मिल सकता था पर टेनिस खिलाड़ियों और संघ की राजनीति के चलते हमारे विश्व स्तरीय खिलाड़ी लन्दन में केवल भाग लेकर अपनी खेल भावना का प्रदर्शन करके वापस लौट आये उससे भले ही खिलाड़ियों और टेनिस संघ की ऐंठ बच गयी हो पर देश को तो एक पदक कम मिला इस बात का जवाब क्या हमारे खिलाड़ियों या खेल संघ के पास है ? अब यह कहने से काम नहीं चलने वाला है कि व्यक्तिगत कारणों से कुछ खिलाड़ी एक साथ नहीं खेल सकते हैं पर देश के लिए खेलने में भी अगर उनको परेशानी होती है या फिर उनका अहम् सामने आ कर रूकावट डालता है तो देश को ऐसे खिलाड़ियों से तुरंत पीछा छुड़ाने की ज़रुरत है. देश में एक स्पष्ट खेल नीति का अभाव में भी हमारे प्रदर्शन को ख़राब करता है क्योंकि चीन और जापान जैसे देश अपनी बेहतर और सख्त खेल नीति के कारण ही इतनी बड़ी संख्या में पदकों को जीत लेते हैं जबकि हमारे यहाँ किसी भी खेल संघ में पूरे वर्ष खेल गतिविधियाँ ही नहीं चला करती हैं. एशियन, राष्ट्रमंडल या ओलम्पिक खेलों से पहले ही खेलों पर ध्यान दिया जाता है जबकि विश्व स्तर पर प्रदर्शन करने के लिए सतत मेहनत की आवश्यकता होती है जिसकी हमारे यहाँ कमी ही रहती है फिर भी अपने दम पर देश का नाम रोशन करने वाले इन खिलाड़ियों पर देश को नाज़ है....    
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