मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Saturday, 29 January 2011

अतिथि देवो भव ....

         २६/११ के हमले के बाद ताज होटल के अधिकारियों और कर्मचारियों जिस तरह से अपने अद्भुत कौशल और शौर्य का परिचय दिया वह दुनिया के सामने एक मिसाल बनकर आया है और इनसे उपजे सवालों पर हावर्ड बिजनेस स्कूल में एक शोध किया जा रहा है. अभी तक दुनिया की समझ में यह नहीं आया है कि आख़िर जब उस संकट की घडी में ये होटल कर्मचारी सारे रास्तों को जानते थे फिर भी उन्होंने अपनी जान की बाज़ी लगाकर मेहमानों को बचाने में क्यों लगे रहे जबकि इनमें से कोई भी कर्मचारी किसी भी स्तर पर इस तरह के हमले से निपटने के लिए प्रशिक्षित नहीं थे ? इस बात ने भारतीयों की उस भावना को मजबूती प्रदान की जिसमें हम कहा करते हैं कि प्राचीन समय से हम अपनी जान देकर भी मेहमानों की रक्षा करते रहे हैं.
              वे विदेशी मेहमान जिन्हें उस होटल के बाहर शायद कुछ भी नहीं पता था तो उस समय अगर उनको उनके हालत पर छोड़ कर ये कर्मचारी भाग भी जाते तो शायद अन्य देशों में इस पर कुछ भी नहीं होता पर जिस तरह निहत्थे होते हुए भी उन सभी ने अपने ज्ञान का उपयोग कर मेहमानों को वहां से सुरक्षित निकालने का काम किया वह अपने आप में बिलकुल अनोखा था. कोई भी कोई शोध करे या न करे उस समय तो इन कर्मचारियों के मन में केवल एक ही बात गूँज रही थी कि किसी भी तरह से इन मेहमानों को कम से कम नुक्सान के साथ बचा लिया जाए. इनके उस समय साहस की गाथा देखकर तो वास्तव में यही लगता है कि इन सभी ने संकट की उस घड़ी में भारत और ताज होटल की गरिमा को बचाने की पूरी कोशिश की थी और यह उनकी सूझ बूझ का ही नतीजा था कि कहीं से भी आतंकी जितना नुक्सान कर सकते थे नहीं कर पाए ?
         जिस तरह से इन लोगों ने अपने कर्त्तव्य पर अपनी जान की बाज़ी लगायी वह अपने आप में बेमिसाल है और अभी भी हम सभी को इस तरह से यह जानने और समझने की ज़रुरत है कि अगर संकट की घड़ी में हम सब शांत रहने की कोशिश  करते हुए कुछ करने का प्रयास करें तो उसका अच्छा परिणाम सामने आता ही है. देश में आज सभी को आपदा प्रबंधन पर पूरी तरह से ध्यान देना चाहिए क्योंकि आबादी के हिसाब से जो भी संसाधन हमारे पास उपलब्ध हैं उनको देखते हुए कभी भी सरकार चाहते हुए भी हमारी पूरी तरह से सुरक्षा नहीं कर सकती है तो आख़िर क्यों नहीं हम सभी इस तरह की परिस्थितयों में फंसने पर अपने को इन सभी परिस्थियों से निकालने का कोई प्रयास क्यों नहीं करते हैं ? अगर हम सभी अपने को सुरक्षित रखने की तरफ़ ध्यान देना शुरू कर दें तो आगे से इस तरह की किसी भी घटना में हम खुद और दूसरों को सुरक्षित रख सकेंगें. भारत में अतिथियों की रक्षा करने की परंपरा प्राचीन समय से ही है. अब समय है कि बड़े बड़े उपदेश देने वाले लोग भी इस सत्य को समझें और अपने को भी इसी तरह का बनाए का प्रयास करें.        

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

1 comment:

  1. इसी पर चलते हुये हम बांग्लादेशियों, पाकिस्तानियों सब को पनाह दे देते हैं..

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