मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Friday, 29 April 2011

हड़ताल और आवश्यक सेवाएं

      जिस तरह से एयर इंडिया के हड़ताली पायलटों ने कोर्ट के आदेश को भी मानने से इनकार कर दिया है उससे यही लगता है कि इनकी यूनियन इस मामले को लम्बा खींचने के बारे में सोच चुकी है. एयर इंडिया प्रबंधन ने जिस तरह से अत्यावश्यक याचिका के द्वारा इस मामले की सुनवाई दिल्ली उच्च न्यायालय में करायी उससे पायलट यूनियन बिफरी हुई है. यह सही है कि हर कर्मचारी को अपने हिसाब से अपनी उचित मांगों को मंगवाने का अधिकार मिला हुआ है पर जब कहीं से आकर निजी स्वार्थ इसमें जुड़ जाते हैं तो काम करना भी मुश्किल हो जाता है. देश की सार्वजानिक क्षेत्र की यह विमान सेवा वैसे ही सरकार के रहमो-करम पर चल रही है और ऐसे में इस तरह की हड़ताल से इसकी आर्थिक स्थिति और व्यापारिक साख़ पर बट्टा लगना निश्चित ही है. हो सकता है कि कहीं न कहीं से सरकार भी इन लोगों की उचित मांग पर ध्यान न दे रही हो पर इसका यह अर्थ तो नहीं है कि ये लोग अपनी मनमानी करने पर उतर आयें ? यदि ये लोग इसे अपना नहीं समझते हैं तो सरकार किस तरह से इन्हें अपना मान सकेगी ?
        देश में जिस तरह से हवाई यातायात में बराबर वृद्धि हो रही है ऐसे में एयर इंडिया के पास अपने अनुभव और विस्तृत नेटवर्क के कारण बहुत बड़ा हिस्सा बनाये रखने के लिए पूरा माहौल था पर सरकारी कामकाज का तरीका और हर मामले में सरकारी अनुमति की आवश्यकता ने पूरा परिदृश्य ही बदल दिया है और एक समय में देश के आकाश पर राज करने वाली सार्वजानिक क्षेत्र की विमानन कम्पनियाँ आज अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करती हुई दिखाई दे रही हैं. जब तक निगमों और सार्वजानिक क्षेत्र के उपक्रमों को पूरी तरह से काम करने की छूट नहीं दी जाएगी तब तक किसी भी स्तर पर वे प्रतिस्पर्धा में नहीं टिक पायेंगें फिर भी सरकार और इन उपक्रमों के कर्मचारी पता नहीं किस गलत फ़हमी में जीते रहते हैं कि वे कड़ी प्रतिस्पर्धा में घटिया सेवा देकर भी बचे रहेंगें ? अब भी समय है कि दोनों पक्षों को आपस में बैठकर उचित मांगों पर विचार करना चाहिए और साथ ही सरकार को भी यह स्पष्ट कर देना चाहिए कि जितने दिन ये सेवाएं बाधित हैं उतने दिनों में होने वाले नुकसान की भरपाई भी इन्हीं कर्मचारियों के वेतन से की जाएगी.
      अगर इतने के बाद भी ये हड़ताली पायलट नहीं मानते हैं तो सरकार को इस सरकारी उपक्रम का भी तुरंत विनिवेश कर देना चाहिए और इतने बड़े स्तर पर परिचालन सम्बन्धी समस्याओं से जूझने के स्थान पर सरकार के ख़ज़ाने में विनिवेश से वृद्धि कर लेनी चाहिए. इससे दो लाभ होंगें एक तो सरकार इस बिना बात के पचड़े में भविष्य में फंसने से बच जाएगी और इसके निजीकरण होने से इसकी सेवाएं भी बची रहेंगी. देश को आज इस तरह की प्रतिस्पर्धी कम्पनियों की आवश्यकता है अपर जब सरकारी कर्मचारी के रूप में यूनियन काम नहीं करना चाहती हैं तो उन्हें निजी क्षेत्र के हाथों बेचकर सरकार को इस तरह के तमाशों से भी मुक्ति पा लेनी चाहिए. अब भी समय है कि हड़ताली लोग चेत जाएँ जिससे आने वाले समय में उनकी बातें सुनी जा सकें वरना कहीं सरकार ने विनिवेश की प्रक्रिया अपना ली तो ये सभी कहीं के भी नहीं रहेंगें. देश में कोई भी हो उसे कानून का सम्मान करना चाहिए और जिस तरह से पायलटों की यूनियन ने अपने मन की करने के बारे में सोच ली है उससे यदि कोर्ट भी उनके खिलाफ कड़े कदम उठाये तो अच्छा ही होगा.        

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