मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Tuesday, 14 June 2011

काला धन और कानून

      वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने इस बात के साफ़ संकेत दिए हैं कि काले धन के मुद्दे पर सरकार इसी मानसून सत्र में एक विधेयक पारित करवाने का पूरा प्रयास करने वाली है क्योंकि अभी तक ऐसा कोई भी कानून देश में नहीं है जो देश में काले धन के बारे में कुछ ठोस कर सके. इस कानून में बैंकों के काम काज में और पारदर्शिता लाने की बात भी कही जा रही है जिससे गोपनीयता का हवाला देकर कोई भी इस तरह से काले धन का लेन देन आसानी से न कर पाए. आज के समय में विदेशियों द्वारा भारत में जमा काले धन के बारे में सरकार के पास कोई प्रभावशाली कानून नहीं हैं जिस कारण भी बहुत बार विदेशियों के साथ इस मुद्दे पर सख्ती नहीं हो पाती है. जिस तरह से देश में विदेशियों द्वारा आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ रही हैं उसे देखते हुए अब इस तरह का कानून एक आवश्यकता बन गया है. कोई भी कानून एकदम से नैन बन सकता है उसके लिए एक प्रक्रिया का पालन करना होता अहि और इन सभी मामलों में अगर केंद्र ने कुछ शुरू किया है तो उसका स्वागत ही किया जाना चाहिए.
             ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेंट (ओईसीडी) की महासचिव एंडेल गुरिया के साथ एक संयुक्त संवाददाता सम्मलेन में मुखर्जी ने यह बात कही और यह भी कहा कि इस कानून के बन जाने के बाद भारत दूसरे देशों के साथ भी इस तरह की संधियाँ करने में नहीं चूकेगा. अभी तक जिन देशों के साथ बात चल रही है वहां से सार्थक जवाब भी मिल रहे हैं. यह सही है कि देश में बहुत सारे कानून अभी भी वैसे ही चल रहे हैं जैसे वे अंग्रेजों के शासन में थे और उनके अनुसार दमनात्मक कार्यवाही करके ही बहुत सारी बातों से निपटा जा रहा था. आज के समय इन सभी कानूनों में मूलभूत परिवर्तनों की आवश्यकता है और इस बारे में किसी बी तरह कि फालतू राजनीति करने की अनुमति किसी को भी नहीं दी जा सकती है. जिस तरह से अन्ना और बाबा रामदेव दबाव बनाने में सफल हो रहे है उसके पीछे की मंशा भी सरकार को समझ आने लगी है क्योंकि अब यह सारी लड़ाई पूरे देश की होती जा रही है और कोई भी सरकार इस मुद्दे पर चुप होकर नहीं बैठ सकती है ? क्योकि अब चुप रहने वालों को जनता आने वाले समय में माफ़ करने वाली नहीं है.
     सवाल यहाँ पर राजनीति से ऊपर उठकर कुछ आगे बढ़ने का है पर हमारे नेताओं की आज तक की जो रणनीति रही है उसे देखते हुए आज भी यह नहीं कहा जा सकता है कि देश इन नेताओं के भरोसे बहुत आगे तक जा पायेगा. क्योंकि जब तक सटीक और कड़े फैसले सोच समझकर तेज़ी से लेने की आदत हमारे नेताओं में नहीं आएगी तब तक इस तरह के नाटक दिखाई देते रहेंगें. पूरे देश में विधायिका के पास क्या काम है ? अगर अन्ना हजारे और बाबा रामदेव इस तरह के आन्दोलन चला रहे है तो उसके पीछे किसका लाभ होने वाला है ? इस मामले में सभी दल एक जैसे हैं क्योंकि अगर कोई भी दल इस पर इतना गंभीर होता तो वह कम से कम अपने शासन वाले राज्य में तो ऐसा कुछ करने का प्रयास करता ? आज जो कांग्रेस को गालियाँ निकाल रहे हैं जब उनके हाथ में सत्ता थी तो उन्होंने क्यों नहीं कुछ किया था ? ज़ाहिर सी बात है कि कोई भी नहीं चाहता के इन लोगों के आंदोलनों से नेताओं के पेट पर लात लगे और उनके भ्रष्ट आचरण खुलकर सबके सामने आ जाएँ ? अच्छा होगा कि राज्य सरकारें अपने यहाँ पर इस तरह के तंत्र को मज़बूत करने का प्रयास करें जिससे देश का वास्तव में भला हो सके.
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