मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Saturday, 23 July 2011

विशेष पुलिस अधिकारी और नियम

     छत्तीसगढ़ सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद से ४८०० विशेष पुलिस अधिकारियों को वापस बुला लिया था अब उनकी फिर से नियुक्ति किये जाने की सम्भावना बनने लगी है. राज्य सरकार के सलवा जुडुम कार्यक्रम और अन्य नक्सल विरोधी अभियानों में कोर्ट के भी निर्देश आने के बाद से इस इलाके में नक्सल विरोधी अभियान को झटका लगना तय ही था. छत्तीसगढ़ सरकार ने यह तय किया है कि अब राज्य के युवक युवतियों के लिए शिक्षा और शारीरिक मानदंडो को कम किया जायेगा और उन्हें इनमें छूट दी जाएगी जिससे स्थानीय लोगों की इसमें भर्ती की जा सके. यह सही है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में कानून का शासन पूरी तरह से समाप्त हो गया सा लगता है और किसी भी सरकार के पास ऐसा कोई सुझाव नहीं है जो इनसे पार पा सके. ऐसे में इस तरह की नियुक्ति के अलावा राज्य सरकार के पास कोई चारा भी नहीं बचता है राज्य में सुरक्षा का माहौल बनाना राज्य सरकार की ज़िम्मेदारी होती है जिसके लिए वह कानून सम्मत हर कदम उठाने के लिए स्वतंत्र होती है. 
    कोर्ट में बचाव पक्ष ने अपनी दलीलों से यह बात मनवा ली कि इस तरह के विशेष पुलिस अधिकारी संविधान के विरुद्ध हैं और इस तरह से उनकी नियुक्ति नहीं की जा सकती है जिसके बाद कोर्ट ने इस तरह की नियुक्तियों को अवैध बताया और सलवा जुडुम भी बंद करने के आदेश दिए. राज्य सरकार का तर्क था कि इन लोगों के माध्यम से केंद्रीय सुरक्षा बलों को स्थानीय भौगोलिक स्थिति का पता लगाने में मदद मिलती है जिससे नक्सलियों के ख़िलाफ़ चलाया जाने वाला अभियान प्रभावी ढंग से चलाया जा सकता है. केंद्रीय सुरक्षा बलों के लिए सब कुछ आसान होता है पर किसी भी नए स्थान पर काम करने के लिए वहां के पूरे माहौल की जानकारी होना भी आवश्यक होता है इसमें ज़रा सी भी चूक होने पर इन बलों को बहुत बड़ा नुकसान हो जाया करता है. आज इस तरह के किसी भी कदम से दो बातें हो जाती है कि जो बेरोजगार युवक अपनी मजबूरी के चलते इन नक्सलियों के चंगुल में फँस जाते हैं वे भी इससे बचे रहेंगें और साथ ही नक्सलियों के ख़िलाफ़ किसी भी अभियान में सुरक्षा बलों को प्रभावी ढंग से कदम उठाने में सहायता भी करेंगें. अगर बेरोजगार युवक इस तरह से कुछ धन पाकर सरकार की प्रभावी मदद कर सकते हैं तो उसमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए पर यह सब नियम विरुद्ध भी नहीं होना चाहिए.
     किसी भी अभियान को चलाने के लिए सुरक्षा बलों को न जाने कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं जिससे कई बार उनसे अधिक सावधानी में कुछ ज्यादतियां भी हो जाती हैं पर जिस परिस्थिति में ये लोग काम करते हैं उसमें आसानी से काम करना आसान भी नहीं होता है. जब कोई घोषित दुश्मन हो तो उससे लड़ना आसान होता है पर जब स्थानीय लोगों में से कोई अचानक ही दुश्मनों की तरह व्यवहार करने लगे तो क्या किया जा सकता है ? इस तरह के अभियानों में लगे हुए सुरक्षा बलों से तो हम पूरी तरह से कानून के अनुपालन की आशा करते हैं जबकि उनके सामने ऐसे दुश्मन होते हैं जो बिना किसी पहचान और चेहरे के होते हैं जिनसे लड़ पाना बहुत ही मुश्किल हो जाता है. इस तरह के किसी भी प्रयास का केंद्र सरकार द्वारा जिस तरह से राजनीति से ऊपर उठकर समर्थन किया जा रहा है वह देश के लिए यह अच्छी बात है क्योंकि हर बात में राजनीति खोजने और करने वाले हमारे सभी राजनैतिक दल पता नहीं कब क्या कहना और करना शुरू कर दें यह किसी को भी नहीं पता होता है. फिर भी राज्य सरकार को जो भी करना है वह कानून के दायरे में रहकर ही करे जिससे आने वाले समय में कोई कानून की मदद से इस तरह के अभियानों को कमज़ोर न कर सके.  
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