मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Tuesday, 26 July 2011

निर्वाचन सुधार

भारत में मतदान के लिए प्रयोग की जाने वाली इलेक्टानिक वोटिंग मशीनों का मामला अब बिना बात के तूल पकड़ता जा रहा है. पूरी दुनिया के विशेषज्ञ इनकी कार्यक्षमता का लोहा मान चुके हैं इसके बाद भी कुछ लोगों को यह लगता है कि कहीं न कहीं से कुछ दल इनमें भी गड़बड़ी करवा कर अपने मन मुताबिक चुनाव परिणाम हासिल कर लेते हैं. शेषन के मुख्य चुनाव आयुक्त रहते हुए भारत में जो चुनाव सुधार लागू हुए और उसके बाद से चुनाव आयोग की जो धमक और प्रतिष्ठा देश में बनी है उसको कमोबेश सभी ने आज तक बनाये रखा है और आने वाले दिनों में कुछ भी नया और अधिक सुरक्षित करने के लिए चुनाव योग हमेशा से कमर कसे रहता है. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस मामले में योग से यह कहा जाना भी ठीक ही है कि वह ३ महीनों के अन्दर एक मतदान के बाद तुरंत एक स्लिप जारी करने की व्यवस्था के बारे में निर्णय ले. यह व्यवस्था जांचने के लिए आज ही निर्वाचन आयोग एक टेस्ट चुनाव चेरापूंजी में करा रहा है जिसमें सभी राजनैतिक दलों और अन्य प्रेक्षकों को भी आमंत्रित किया गया है जो इस तरह की किसी भी योजना को परखने वाले हैं.
       जिस तरह से भारत में चुनाव को गोपनीय किया गया और उसके पीछे मतदाताओं को भय मुक्त माहौल देने की जो सिफ़ारिश की गयी है इस तरह की किसी भी पर्ची देने से मतदान की गोपनीयता भंग होने का खतरा बढ़ जायेगा. देश की राजधानी और बड़े शहरों में तो यह व्यवस्था कारगर हो सकती है पर देश के दूर दराज़ के स्थानों में जहाँ पर आम लोगों को हमेशा ही मतदान से वंचित रखा जाता है वहां पर इस तरह की किसी भी व्यवस्था से लोगों के लिए वोट डालना और मुश्किल हो जायेगा क्योंकि तब मतदान केंद्र पर बैठे दबंग लोग उनकी पर्ची देखकर ही उनके लिए जीना मुश्किल कर देंगें ? अभी देश में इस तरह का माहौल नहीं बन पाया है कि हर जगह पर केंद्रीय सुरक्षा बालों की देखरेख में ही चुनाव कराये जा सकें तो स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर आख़िर सरकारें और छुटभैय्ये नेता लोग कैसे चुप रह जायेगें क्योंकि इस तरह की किसी भी पर्ची से वे गाँव में रहने वाले लोगों पर पूरा दबाव बना पाने में सफल हो जायेगें ? इसलिए ऐसी किसी भी व्यवस्था को लागू करने से पहले इस तरह की हर बात पर गंभीर विचार किये जाने की आवश्यकता है. 
       मतदान को जिस कारण से गोपनीय रखा गया था वह आज भी मौजूद है पर लोग किसी भी व्यवस्था पर संदेह करके कोर्ट चले जाते हैं जिसकी परिणिति कई बार कुछ ऐसे आदेशों के रूप में सामने आ जाती है जिनको लागू करवा पाना किसी के बस की बात नहीं होती है. एक विकल्प यह रखा जा सकता है कि जो लोग अपने वोट को देखना चाहें तो उनको वोट देने से पहले और बाद में मशीन का डिस्प्ले देखने दिया जाये कि वोट देने से पहले और बाद में उनके प्रत्याशी के खाते में वोट जुड़ा भी है या नहीं ? इससे हर हाथ में स्लिप नहीं होगी और लोगों को अतिरिक्त समस्या का सामना नहीं करना पड़ेगा. वोट देखने और दिखाने की व्यवस्था कुछ इस तरह से होनी चहिये कि उस समय पोलिंग एजेंट को भी मशीन के आस पास होने से मना किया जाये क्योंकि उसकी उपस्थिति मतदाताओं को डराने में भूमिका निभाने में नहीं चूकेगी. मतदान को किसी भी स्तर पर इस तरह से प्रदर्शन की वस्तु नहीं बनाया जाना चाहिए हो सकता है कि कहीं से गड़बड़ी सामना आ रही हों तो उनके कारण पर विचार करने की आवश्यकता है न कि पूरे तंत्र को बदलने की कवायद करने की ज़रुरत है.      
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