मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Monday, 8 August 2011

बिजली संकट और हम

देश में जिस तरह से ऊर्जा का संकट गहराता जा रहा है उसके बारे में कभी कोई विचार नहीं करना चाहता है क्योंकि आज जितनी बिजली हमारे पास उपलब्ध है उसका हम कितना सदुपयोग करते हैं यह कोई नहीं सोचना चाहता ? यह सही है की देश में बिजली की जितनी किल्लत बनी हुई है और जिस तेज़ी के साथ इसकी मांग बढ़ रही है उसके अनुपात में हम इसका उत्पादन नहीं कर पा रहे हैं. पर हमारे पास जितनी बिजली उपलब्ध है उसका सही उपयोग करने की इच्छा शक्ति भी तो हमारे पास नहीं है. आज जिस तरह से भ्रष्टाचार ने पूरे देश को अपने में जकड़ रखा है उसी तरह से बिजली विभाग में भी इसने अपनी जड़ें जमा रखी है जो किसी भी तरह से देश की ऊर्जा ज़रूरतों के अनुसार संसाधन उपलब्ध करने के हर प्रयास पर पानी फेरती रहती है. 
   आज शायद ही देश में कोई नगर ऐसा हो जहाँ पर सड़कों पर लगने वाली सार्वजानिक प्रकाश व्यवस्था को ठीक ढंग से चलाया जा रहा हो ? अधिकांश जगहों पर दिन रात बिजली जलती रहती हैं और उसके बाद बिजली की कमी का रोना भी रोया जाता है. यदि बड़े शहरों और स्थानीय निकायों में इस तरह से बिजली के दुरूपयोग को रोका जाये तो इससे दूर दराज़ के कई गाँवों तक बिजली पहुंचाई जा सकती है. पिछले कुछ वर्षों में केवल दिखावे के लिए छोटे छोटे स्थानों पर भी बड़ी बिजली के खम्भे लगाकर सार्वजानिक प्रकाश व्यवस्था को किया जा रहा है वह भी कहीं न कहीं से इस तरह से ऊर्जा के संकट को बढाने में लगे हुए हैं. 
   अच्छा हो की इस तरह के सार्वजानिक प्रकाश को सौर ऊर्जा के माध्यम से चलाया जाये क्योंकि आजकल उन्नत तकनीक वाली व्यवस्था आने के बाद से इनके काम करने की क्षमता में कई गुना वृद्धि हुई है. इस तरह की व्यवस्था करने से जहाँ एक तरफ शाम के समय बिजली न होने पर भी उजाला मिल सकेगा वहीं दूसरी तरफ बिजली की खपत इनमें होती है उसकी भी बचत की जा सकेगी. पर आज हर जगह लोग केवल अपने हितों के बारे में ही सोचते रहते हैं. देश में इस तरह से बिजली का संकट बढ़ाने में कहीं न कहीं से हम लोग भी दोषी हैं क्योंकि हमारे मन में इसकी बचत करने की भावना होती ही नहीं है. अब समय है की बिजली से चलने वाले उपकरणों का समुचित प्रयोग किया जाए तथा अपने अस पास के ऐसे स्थानों पर समितियां बनाकर सार्वजनिक प्रकाश वाले तंत्र को जगाया जाए जिससे वे दिन में बिजली जलाकर इसके दुरूपयोग को रोक सकें.    
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