मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Tuesday, 9 August 2011

नागरिक पलायन क्यों ?

नागरिक पलायन क्यों ?
देश के बड़े शहरों के सामने आज अजीब सी स्थिति बनती जा रही है क्योंकि उनके पास अब जितने भी संसाधन जुटाने की ताक़त है उससे वे अपने शहर के लोगों को मूलभूत सुविधाएँ भी नहीं दे पा रहे हैं. ऐसा तब हो रहा है जब पूरे देश के मध्यम और बड़े शहरों की तस्वीर बदलने के लिए केंद्र सरकार ने जवाहर लाल नेहरु शहरी मिशन चला रखा है. आज देश के हर हिस्से में एक भगदड़ सी देखी जा रही है जिसमें हर छोटे शहर और गाँवों के लोग बड़े शहरों की तरफ़ भागते दिखाई दे रहे हैं ? आख़िर क्या कारण है कि इस तरह से लोग पूरे देश में ही अपना घर बार छोड़कर नयी जगहों पर अपना नया आशियाना बनाए के बारे में सोचने लगे हैं ? इस बारे में कुछ सोचने की आवश्यकता ही नहीं क्योंकि जिस तरह से हमारे छोटे नगरों में मूलभूत सुविधाओं का अकाल सा पड़ता जा रहा है उसके बाद वहां पर कौन रहना चाहेगा ? आज जो कुछ भी हो रहा है उसके पीछे कहीं न कहीं से दीर्घकालिक सोच का न होना भी एक बड़ा कारण है.
      पूरे देश में अगर देखा जाये तो शायद नागरिकों के लिए आवास, भोजन, परिवहन और शिक्षा जैसी चीज़ें ही दुर्लभ हुई पड़ी हैं ऐसे में अगर २०० किमी का अन्दर कोई ऐसा बड़ा शहर पड़ता है जहाँ पर विकास की बयार कुछ हद तक दिखाई देती है तो लोग वहां जाकर रहना पसंद करते हैं. जिस व्यक्ति को नए सिरे से अपने लिए छत का जुगाड़ करना होता है वह कहीं से भी किसी भी तरह से नए और कुछ अच्छे शहर में बसना चाहता है. इस कारण से जहाँ इन शहरों के लिए सोचे गए प्लान धरे के धरे रह जाते हैं साथ ही वहां पर लोगों के तेज़ी से आने से पूरी व्यवस्था भी चरमराने लगती है. देश में हर जगह सरकारें केवल शहरों के विकास की बातें करती रहती हैं और इस भागदौड़ में छोटे शहरों की हालत गाँवों से भी बदतर होती जा रही है किसी से भी पूछा जाये की क्या वह कम सुविधा वाली संघर्षपूर्ण जिंदगी चाहता है या उसे अपेक्षाकृत अधिक सुविधा वाली जगह चाहिए तो कौन घटिया जगह पर रहना चाहेगा ?
     आज देश के समग्र विकास की आवश्यकता है किसी एक क्षेत्र में विकास की अंधी दौड़ और बाकि जगहों पर विकास के नाम पर केवल ठगी अब पूरे देश की प्रगति पर असर डालने लगी है. ऐसा नहीं है कि इस पूरे मसले का कोई हल नहीं है पर शायद जिनके हाथों में हम राज्यों और देश की कमान सौंपते हैं वे इस मामले में संजीदा नहीं होते हैं जिस कारण भी बहुत सारी छोटी समस्याएं पूरी तरह से विकास को मुंह चिढ़ाने लगती हैं. अब भी समय है कि हम इस मसले को पूरी गंभीरता से लेना शुरू करें क्योंकि जब समाज में असमानता एक हद से आगे हो जाती है तो जनता के सब्र का बाँध टूट जाता है जिससे कई अन्य तरह की समस्याएं सामने आने लगती हैं. आज देश को एक सोच चाहिए जिसके साथ हम विकास के पथ पर आगे बढ़ने का प्रयास कर सकें और वह विकास सभी जगहों पर एक सामान हो जिससे किसी को भी यह न लगे कि उसे उसका हिस्सा नहीं दिया जा रहा है.        
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