मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Tuesday, 4 October 2011

रेल और राजनीति

रेल मंत्रालय ने अपने बढ़ते हुए खर्चों से निपटने के लिए वित्त मंत्रालय से ब्रिजलोन के तहत २००० करोड़ रुपयों की मांग करते हुए एक पत्र लिखा है जिससे आज की रेल की आर्थिक सेहत का भी पता चलता है. यह सही है कि देश की नब्ज़ और धड़कन सब कुछ होने के कारण रेल पर ज़िम्मेदारियों का बहुत बड़ा बोझ भी रहता है पर ऐसा क्यों है कि जो जिम्मेदारियां निभा रहा है उसी पर अतिरिक्त भार भी डाला जा रहा है ? राजद और तृणमूल कांग्रेस के पास पिछले ७ वर्षों से भी अधिक समय से यह मंत्रालय है पर उनकी लोक लुभावन नीतियों के कारण आज रेल दीवालिया होने की कगार पर पहुँच चुकी है जबकि आर्थिक मसलों से जुड़े मामलों में एक हद के बाद की जाने वाली राजनीति अंततः उस संगठन को समाप्त कर देती है शायद यह बात बिहार और बंगाल को संवारने के चक्कर में लालू और ममता भूल गए थे और आज भी रेल मंत्री दिनेश द्विवेदी किराया बढ़ाये जाने के ख़िलाफ़ हैं ? क्यों क्या इन लोगों ने देश के नक़्शे से रेल को सार्वजानिक क्षेत्र से ख़त्म करके उसे निजी हाथों में सौंपने का मन बना लिया है ?
     ऐसा नहीं है कि अगर किराया बढ़ाया जायेगा तो कोई आफ़त आ जाएगी पर किराये को तर्क संगत बनाये बिना आख़िर सरकार की तरफ कब तक हाथ फैलाये जाते रहेंगें ? किराये का मामला एक जगह पर सही है पर आज भी रेलवे अपनी परिचालन लागत को कम करने के लिए किये जाने वाले उपायों पर ध्यान देना ही चाहती है जो कि शायद कुछ नेताओं के कारण नहीं हो पा रहा है ? आज बिना किसी विलम्ब के रेल के किरायों में मामूली बढ़ोत्तरी भी की जानी चाहिए जिससे परिचालन घाटे को कुछ कम किया जा सके साथ ही पूरी तरह से कार्यकुशलता पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए जिससे रेलवे की छवि भी सुधर सके. इतने वर्षों से बिहार और बंगाल के ही रेल मंत्री होने के कारण वहां के पिछड़े इलाकों में क्या सुधार हुआ यह कोई भी नहीं बता सकता है पर आज भी देश के किसी भी हिस्से से समय पर आने वाली सभी तरह की गाड़ियाँ केवल इन्हीं दोनों राज्यों में समय को भूल जाती हैं जबकि होना तो यह चाहिए था कि इस बात लाभ उठाकर इन राज्यों में समय अनुपालन पर रेलवे अधिक ध्यान से पाती.
   केवल राजनैतिक हित लाभ के लिए चलने वाली सभी गाड़ियों की समीक्षा करने का अब समय आ गया है ऐसा नहीं है कि उन इलाकों को अच्छे रेल तंत्र की ज़रुरत नहीं है पर केवल नेताओं के अहम् को संतुष्ट करने में रेलवे की सेहत को ख़राब करने का काम अब बंद होना ही चाहिए. रेलवे को अब इस बात पर ध्यान देना ही होगा कि समय विशेष पर देश के किस हिस्से में किस रूट पर अधिक यात्रियों की संख्या होती है क्योंकि इससे ही गाड़ियों से पूरी कमाई की जा सकेगी और घाटे को कम किया जा सकेगा. जिन जगहों पर कम डिब्बे की गाड़ियाँ चलायी जा रही हैं और वहां पर डिब्बों के अनुपात में बिकने वाले टिकटों की संख्या काफी अधिक है तो अविलम्ब वहां पर डिब्बों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए क्योंकि उस क्षेत्र से रेलवे को बिना अधिक संसाधन झोंकें अधिक आय हो सकती है. साथ ही अब इस तरह की परिस्थितियों के बारे में रेलवे के स्थानीय तंत्र पर भी ज़िम्मेदारी डाली जाये कि वे अपने यहाँ घटने बढ़ने वाले यात्रियों के अनुसार ही मंडल स्तर पर सूचनाएँ प्रेषित करें. अब ज़िम्मेदारी के साथ रेलवे को आगे बढ़ने का समय आ गया है केवल हाथ फ़ैलाने से अब कुछ नहीं किया जा सकेगा.      


मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

3 comments:

  1. Nice .

    http://commentsgarden.blogspot.com/

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  2. कल 05/10/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  3. बढ़िया लेखन...
    सादर...

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