मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Monday, 24 October 2011

टीम अन्ना और विवाद

      लगता है कि टीम अन्ना अपनी सद्भावना में यह भूल गयी है कि इस देश में कोई भी किसी भी समय अजीब तरह से व्यवहार करने का आदी रहा है और सबसे बड़ी बात यह है कि किसी भी तरह से अपने को सुर्ख़ियों में बनाये रखने की कोशिश करने वालों की इस देश में कोई कमी नहीं है. अब जिस तरह से पहले से ही कुछ लोग टीम अन्ना के लोगों को विवादों में खींचने की कोशिशों में लगे हुए हैं उससे यही लगता है कि अभी भी टीम अन्ना अपनी सद्भावना के कारण इन लोगों की हरकतों को माफ़ करने में लगी हुई है. अभी भी जिस तरह से किरण बेदी, अरविन्द केजरीवाल आदि को निशाने पर लेने की कोशिशें जारी हैं उससे यही लगता है कि कुछ लोग सही को सही कहने में भी डरते हैं. जहाँ तक स्वामी अग्निवेश का सवाल है तो वह हमेशा से ही किसी न किसी कारण से कहीं न कहीं विवादों में शामिल हो जाया करते हैं. उनको मानने वालों कि एक बड़ी संख्या है फिर भी कई बार उनकी तरफ़ से कुछ न कुछ विवाद खड़े हो जाया करते हैं जिनकी कोई आवश्यकता नहीं होती है.  
    सार्वजनिक जीवन में कुछ भी कर पाना बहुत मुश्किल होता है जिस कारण से लोगों को यहाँ पर अधिक सावधानी बरतने की ज़रुरत होती है. आज जिस तरह से टीम अन्ना ने भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ पूरे देश में अलख जगाई है उसे देखते हुए कहीं न कहीं से वे उन सभी की नज़रों में आ गए हैं जिनकी दुकाने निकट भविष्य में इस आन्दोलन के कारण बंद होने वाली हैं. सबसे दुःख की बात यह है कि लोगों को इनकी ईमानदारी पर संदेह करवाने के अवसर पैदा किये जा रहे हैं और कुछ लाख रुपयों की हेराफेरी के आरोप लगाये जा रहे हैं. टीम अन्ना ने जिस पारदर्शिता से अभी तक अपना काम किया है और आज भी जिस तरह से काम कर रहे हैं वह अद्भुत है फिर भी लोगों को कहीं न कहीं से उनके ख़िलाफ़ कुछ चाहिए जिस कारण से वे इस तरह के आरोप लगाने से बाज़ नहीं आ रहे हैं. ऐसी परिस्थियों में टीम अन्ना पर ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है उनकी ईमानदारी पर किसी को संदेह नहीं पर उन पर वे भ्रष्टाचारी कुछ ईमानदार लोगों को आगे करके उँगलियाँ उठवाना चाहते हैं.
   जब कोई किसी बड़े अभियान की शुरुआत करता है तो उससे लोगों को परेशानियाँ होने लगती हैं तो उनको भी कहीं न कहीं से कानून के लपेटे में लेने की कोशिशें शुरू कर दी जाती हैं इससे किसी को कुछ मिले न मिले पर एक अच्छे प्रयास को धक्का अवश्य लगता है. जैसा कि देश में लोकतंत्र है और हर व्यक्ति को अपनी बात कहने का अवसर दिया जाता है फिर उनमें से ही कुछ लोग पता नहीं क्या से क्या कहना शुरू कर देते हैं जिसकी कोई आवश्यकता नहीं होती है ? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का जिस हद तक दुरूपयोग किया जाने लगा है उस पर भी रोक लगनी चाहिए क्योंकि इसे कहीं से भी सही नहीं कहा जा सकता है. देश को सच जानने का हक है पर कुछ लोग सच को भी अपने नज़रिए से ही दिखने की कोशिशें शुरू कर देते हैं जिससे सवाल उठने लगते हैं. आज आवश्यकता है कि सच को सच ही रखा जाये उस पर किसी तरह से कुछ भी चढ़ाने की कोशिश न की जाये क्योंकि झूठ भी कई बार सच को धुंधला करने की ताक़त पैदा कर लेता है और देश इसे अब इस तरह की बकवास और झेल नहीं सकता है.     


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1 comment:

  1. कोलाहल में संदेश छिप जाता है।

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