मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Thursday, 10 November 2011

मानवाधिकार की राजनीति

     सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब के एक आतंकी को सज़ा देने में हुई देरी की बात पर वकील से और राष्ट्र से यह सवाल पूछकर बहुत ही प्रासंगिक प्रश्न सबके सामने ला दिया है की क्या जो हमारी रक्षा कर रहे हैं उनके लिए कोई मानवाधिकार नहीं होते ? आख़िर क्यों सभी लोग हर बात की अपनी अपनी तरह से व्याख्या करने लगते हैं ? हर व्यक्ति की नज़रों में मानवाधिकार का मामला अलग अलग मायने क्यों रखता है जबकि मानव एक ही है ? शायद इसलिए भी क्योंकि सुरक्षा कर्मी सरकार से वेतन पाते हैं और सरकारें अपनी सुविधा और आवश्यकता के अनुसार ही यह तय करती हैं कि क्या सही और क्या ग़लत है ? जब इस देश में आतंकियों के लिए मानवाधिकारों की बात की जाती है तो यह मांग उठाने वाले यह भूल जाते हैं कि सुरक्षा बलों में भी जो जवान होते हैं वे भी मानव ही होते हैं ? आज जिस तरह स एहर बात का ठीकरा कानून के दायरे में आने वालों अपर ही फोड़ देने की परंपरा बनती जा रही है उसकी कोई आवश्यकता नहीं है. आज कश्मीर में शांति के वापस लौट आने पर जो नेता सैन्य कानून को वापस लेने की मांग कर रहे हैं वे उस समय कश्मीर में थे भी नहीं जब सुरक्षा बल अपनी जान पर खेल कर आतंकियों से मोर्चा लेने में लगे हुए थे.
    कोर्ट ने भूख, आत्महत्या और हिंसा में मारे गए जवानों के मानवाधिकारों के बारे में यह भी पूछा कि आख़िर कोई कैसे केवल आतंकियों के मानवाधिकारों की बात कर सकता है क्योंकि इन आतंकियों से जो भी प्रभावित हैं क्या उनको मानव होने के बाद भी सारे अधिकारों से वंचित कर दिया गया है ? अब जब यह बात सामने आ ही गयी है तो उपद्रवग्रस्त क्षेत्रों में इस तरह की थोथी दलीलें देना अब बंद कर दिया जाना चाहिए क्योंकि केवल एक ही पक्ष के बारे में विचार करने से दूसरे पक्ष के प्रति न्याय नहीं किया जा सकता है और अब समय की आवश्यकता है कि जिन लोगों ने इस तरह की आतंकी गतिविधियों में शामिल होकर किसी भी तरह से देश का नुकसान किया है तो उनके इस तरह के अधिकारों को निलंबित कर दिया जाना चाहिए क्योंकि जो देश को तोड़ने और यहाँ के संसाधनों के बारे में नहीं सोचता वह हमारा दुश्मन है और अब दुश्मनों को कोई अधिकार नहीं दिए जा सकते हैं. हम दयालु राष्ट्र हैं यह सभी जानते हैं पर हमारी दयालुता कायरता का रूप तो नहीं धारण किये ले रही है हमे इस बात पर भी विचार करने की ज़रुरत है.
   अब यह सही समय है कि आतंक रोधी कानून में उचित संशोधन कर दिया जाये जिससे इस तरह की किसी भी गतिविधि में शामिल लोगों के बारे में अगर कुछ भी करना हो तो तो इन बातों पर विचार भी नहीं किया जाये. जिन लोगों को दूसरे मानव ही नहीं दिखाई देते उनके बारे में ऐसे सोचकर हम समाज और देश का भला नहीं कर सकते हैं. भले ही किसी कारण से भी सही पर जो देश विरोधी गतिविधियों में शामिल रहा है उसके लिए किसी भी तरह के अधिकार आख़िर कैसे सुरक्षित रह सकते हैं ? हम किसके लिए और कैसे अधिकारों की बात कर रहे हैं यही चिंता का विषय है क्योंकि जब तक इन लोगों को देशद्रोही नहीं माना जायेगा तब तक उनके ख़िलाफ़ सही कठोर क़दम भी नहीं उठाये जा सकेंगें. अब देश के नीति निर्धारकों को यह तय करने का समय आ गया है कि वे देश के बारे में सोचना चाहते हैं या फिर केवल कुछ सालों के लिए किसी भी प्रकार से सत्ता को अपने कब्ज़े में रखना चाहते हैं ? कहीं नेताओं द्वारा बहुत देर हो जाने पर ऐसा न हो कि जनता नेताओं के सारे अधिकार ही ज़ब्त कर ले फिर उनके पास अपने अधिकार पाने का कोई रास्ता ही शेष न रह जाये ?

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