मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Friday, 25 November 2011

किशनजी कहाँ ?

       पश्चिम बंगाल और केंद्रीय सुरक्षा बलों के संयुक्त अभियान में माओवादियों के शीर्ष कमांडर किशनजी के मारे जाने की अटकलों के बीच उनकी मृत्यु पर अभी भी संशय बना हुआ है क्योंकि किशनजी के ताज़ा उपलब्ध चित्रों से उसका मिलन करने के बाद ही सरकार कोई घोषणा करना चाहती है. अभी तक केंद्रीय गृह सचिव ने जिस तरह से यह कहा है कि मारा गया व्यक्ति ९९% किशनजी से मिलता है तो इसका मतलब यही है कि किसी भी घोषणा से पहले सुरक्षा बल और दोनों सरकारें यह सुनिश्चित कर लेना चाहती हैं कि वह किशनजी ही था ? जिस तरह से माओवादियों में छापेमारी को प्राथमिकता दी जाती है उसकी ट्रेनिंग देने में किशनजी ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी और माओवादियों के अभियान को बहुत धार दे दी थी. जिस तरह से पश्चिम बंगाल, ओडिशा, झारखण्ड, छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश में माओवादियों ने अपने पैर फैला रखें हैं और उनको एक जगह से ही नियंत्रित किया जा रहा था किशनजी के मारे जाने से इसको बहुत बड़ा झटका लगने वाला है.
      अभी तक पूरी लाल बेल्ट में हताशा में माओवादी जिस तरह से पलटवार करते रहे हैं तो अब किशनजी की मृत्यु की पुष्टि हो जाने के बाद वे चुप नहीं बैठने वाले हैं इसलिए इस अभियान में पूरे देश में लगे सभी राज्यों के और केंद्रीय सुरक्षा बलों के जवानों के लिए अब यह बहुत आवश्यक हो गया है कि वे इस तरह के संभावित खतरे वाले क्षेत्रों में अपनी गतिविधियों को पूरी तरह से पूरी सुरक्षा और सावधानी के साथ चलायें क्योंकि माओवादी हर बार सुरक्षा बलों के लिए एक जाल बुनकर उनको इसमें फँसाकर बड़ा नुकसान कर देते हैं. इस बार अतिरिक्त सतर्कता बरतकर इस तरह की घटनाओं को रोकने का प्रयास किया जाना चाहिए. अपनी उपस्थिति और प्रभाव को दिखने के लिए माओवादी कहीं न कहीं से किसी बड़े हमले को अंजाम देने का प्रयास करेंगें जिससे वे स्थानीय लोगों पर यह दबाव बना सकें कि किशनजी के जाने के बाद भी उनके अभियान में कोई कमी नहीं आई है और आवश्यकता पड़ने पर वे कुछ भी कर सकते हैं. इस स्थिति में सुरक्षाबलों और स्थानीय निवासियों के लिए मुश्किल समय शुरू हो जाता है और अब किसी भी स्थिति में दोनों पक्ष इन लोगों को संदेह की दृष्टि से देखना शुरू कर देते हैं.
       अब यह समय है कि माओवादियों पर सही ढंग से दबाव बनाया जाये जिससे वे इस तरह की घटनाओं को अपने हिसाब से बनाकर अंजाम न दे सकें. सही ढंग से चलाये जा रहे अभियानों से माओवादियों पर हथियार डालने का दबाव तो बनाया ही जा सकता है और जिस तरह से बांग्लादेश, भूटान और म्यांमार ने अब यह तय कर लिया है कि वे भारत विरोधियों को अपने यहाँ पैर नहीं जमाने देंगें उसका लाभ इस समय उठाना भी चाहिए क्योंकि जिस तरह से अब तक यहाँ पर दबाव बनने पर वे पड़ोसी देशों में भाग जाया करते थे और वहां के स्थानीय कारणों से इन्हें शरण भी मिल जाया करती थी अब वह नहीं हो पायेगा. भारतीय सुरक्षा बलों के लिए वह स्थिति बहुत ही मुश्किल हुआ करती थी जब वे इनक पीछा करते हुए इनके तार पड़ोसी देशों से जुड़े पाते थे. माओवादी अभियान की कमर तोड़ने के लिए सरकार को इन क्षेत्रों के समग्र विकास के बारे में सोचना ही होगा क्योंकि अभी तक इन स्थानों की बदहाली का लाभ उठाकर ये लोग स्थानीय निवासियों को देश और सरकार के ख़िलाफ़ भड़काने का काम किया करते हैं.          

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