मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Monday, 30 January 2012

इन्टरनेट और भाषा

        अब से कुछ साल पहले तक यह कहा जाता था कि इन्टरनेट ने भौगोलिक और भाषाई बंधनों को तोड़ दिया है पर आज जब तेज़ी से बढ़ते हुए बाजारों की बात की जाती है तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह बंधन नहीं बल्कि इन्टरनेट पर पूरी दुनिया के लिए आगे बढ़ने का अवसर भी है. भारत में अभी तक मुख्य रूप से अंग्रेजी को ही नेट की भाषा माना जाता था जिस कारण से शुरुवाती चरणों में इन्टरनेट के विकास की गति कम ही रही पर जैसे जैसे नेट से होने वाली सुविधा का लोगों को पता चला तो उन्हें रोज़ के कामों को निपटाने के लिए भी इसकी ज़रुरत पड़ने लगी अब ऐसा तो नहीं हो सकता है कि बाज़ार कुछ मांगें और बेचने वाली कम्पनियाँ उसे उपलब्ध न कराएँ ? बस इसी के साथ शुरू हो जाती है बाज़ार आधारित अर्थव्यवस्था जो किसी भी बड़े से बड़े संगठन या व्यापारिक प्रतिष्ठान को कुछ भी करने के लिए राज़ी कर दिया करती है. हमारे देश में शिक्षा की जो स्थिति आज भी है उसमें कोई बहुत आशावादी तस्वीर तो सामने नहीं आती है पर बाज़ार के लिए अपने पैर जमाने के लिए इसमें बड़ी संभावनाएं निकल कर आगे आ गयी हैं जिस कारण से ही आज नेट कंटेंट के मामले में भारतीय भाषाओं की भी सुनी जा रही है.
     एक आंकलन के अनुसार अंग्रेजी में जो भी विकास होना था व हो चुका है और अगर इन नेट कंटेंट देने वाली कंपनियों को आगे बढ़ना है तो उन्हें अब भारतीय भाषाओं पर ध्यान देना ही होगा क्योंकि जिस तरह से भारत बढ़ती हुई आर्थिक ताकत बन चुका है उस परिस्थिति में किसी के लिए भी इसकी अनदेखी करना बहुत भारी पड़ सकता है. इस सबसे जो अच्छा होने वाला है वह या कि जो भारतीय भाषाएँ आज तक केवल नेताओं की राजनीति की भेंट चढ़ जाया करती थीं आज वे अपने आप ही बिना किसी शोर शराबे के आगे बढ़ रही हैं जिससे भाषा का भला तो हो ही रहा है साथ ही शिक्षापरक रोज़गार भी  मिलने की सभावनाएं खुल गयी हैं. अभी तक जो काम केवल अंग्रेज़ी में होने के कारण चंद लोगों को रोज़गार के अवसर मिला करते थे वहीं अब नेट पर लगभग सभी भारतीय भाषाओं के तीव्र विकास के कारण इन भाषाओं के साथ अंग्रेज़ी जानने वालों के लिए भी विकास के नए आयाम खुल गए हैं. अब इस स्थिति का ढंग से उपयोग किया जाये तो भारतीय भाषाओं के विकास में जो बातें आज तक पाँव की बेडी का काम किया करती थीं अब नयी परिस्थितियों में वह आगे बढ़ने का पतवार भी बन सकती हैं. 
    अब सही समय है कि सरकारी स्तर पर जो भी प्रयास इस काम के लोए किये जा रहे हैं उन्हें इन बन्धनों से मुक्त कर दिया जाये और भाषा को अवरोध के स्थान पर अवसर के रूप में देखना शुरू किया जाए क्योंकि अब तुच्छ राजनीति के स्थान पर आगे बढ़ने के राजमार्ग की तरफ देखने का समय आ गया है और जब तक हम सभी भारतीय वैश्विक नेट समुदाय की इस मजबूरी को अपने हित में मोड़ना नहीं सीखेंगें तब तक हमारे लिए आने वाले अवसर रुकते ही चले जायेंगें. भाषा को कभी भी इस तरह से अवरोधक के रूप में नहीं देखना चाहिए पर देश की राजनीति ने इन अवसरों को बहुत बार ख़राब किया है पर अब जब नेट ने यह बाधा तोड़ ही दी है तब इस तरह की बातें करना ही बेमानी है. अब देश में शिक्षा को इस तरह से आगे बढ़ाना होगा जिससे वह देश की भाषाओं को समृद्ध करने का काम करे और पूरे देश में प्राथमिक शिक्षा के स्तर से ही मातृभाषा के साथ एक अन्य भाषा पढ़ाए जाने को कानूनन अनिवार्य बना दिया जाना चाहिए जिससे हमारे पूरे देश में आने वाली पीढ़ी कम से कम एक और भारतीय भाषा के ज्ञान के साथ रोज़गार पाकर आगे बढ़ने में गर्व का अनुभव कर सकेगी.      
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