मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Sunday, 19 February 2012

आंतरिक सुरक्षा और राजनीति

        आजकल जिस तरह से राष्ट्रीय आतंकवाद रोधी केंद्र का विरोध किया जा रहा है और केंद्र सरकार इसे उसके और राज्यों की साझा ज़िम्मेदारियों में से एक बता रही है उससे यही लगता है कि आज भी देश ने यह नहीं सीखा है कि भविष्य में आने वाली चुनौतियों से किस प्रकार निपटा जाना चाहिए ? यह भी सही है कि वैश्विक आतंक की चपेट में भारत भी है और आने वाले समय में यह किस तरह की चुनौतियाँ और समस्याएं लेकर सामने आएगा यह कोई नहीं कह सकता है इससे निपटने का एक ही तरीका है कि समय बद्ध तरीके से इससे उत्पन्न होने वाले खतरों के बारे में नीतियां बनायीं जाती रहें और उन पर समय रहते अमल भी किया जाये. केवल चिंता करने से कुछ भी नहीं होने वाला है और जिस तरह से मुंबई हमले के बाद केंद्र ने एनएसजी के चार केंद्र गठित किये जाने का फैसला किया था उससे भी आतंक से निपटने में कुछ तेज़ी दिखाई जा सकेगी. आतंक का कोई चेहरा नहीं है और वह अचानक ही हमारे बीच में से निकल कर सामने आ जाता है और उसके इस स्वरुप के कारण ही उससे निपटने में बहुत कठिनाई होती है. अपने ख़ुफ़िया तंत्र को मज़बूत करने और सूचनाओं के तेज़ी से आदान प्रदान करने की क्षमता का विकास करने के बाद ही हम इससे अच्छे से लड़ सकते हैं पर नेता पहले आपस में ही तो लड़ लें ? 
      एनसीटीसी पर जिस तरह से नाक का सवाल बनता जा रहा है उसके बाद यह नहीं लगता कि इसके लिए आने वाला समय में इस पर कुछ सार्थक प्रगति हो सकेगी ? जिस तरह से केंद्र मौजूदा प्रावधानों के तहत इस एक समन्वित केंद्र की योजना पर काम करना चाहता है वह आज की आवश्यकता बन चुका है और राज्यों को आख़िर किन मुद्दों पर यह लगता है कि इससे उनके अधिकारों का हनन होता है ? क्या संविधान में सुरक्षा की ज़िम्मेदारी केवल राज्यों को ही दी गयी है क्या केंद्र ऐसे किसी मसले पर राज्यों के साथ मिलकर कोई नए केंद्र स्थापित नहीं कर सकता है ? ऐसा कुछ भी नहीं है क्योंकि जब कोई आतंकी हमला होता है तो सम्बंधित राज्य सरकार तुरंत ही इसकी ज़िम्मेदारी केंद्र पर डाल देती है और यह कह कर बचने का प्रयास करती है कि उसे केंद्रीय सुरक्षा तंत्र से कोई सूचना नहीं मिली थी ? अब इस स्थिति में केंद्र की सरकार या ख़ुफ़िया एजेंसियां कहाँ से कुछ ढूंढ कर लायें जब उनका राज्यों के साथ बेहतर समन्वय ही नहीं होता है और घटना के बाद दोनों ही अलग अलग दिशाओं में काम करती नज़र आती हैं ? क्या देश के किसी राज्य में होने वाली घटनाओं के लिए केवल राज्य सरकारों या केंद्र को ही ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है ?  क्या देश के हित के लिए केंद्र और राज्य के नेता अपने कुछ स्वार्थों को छोड़ पायेंगें ?
     अब समय आ गया है कि हर बात में संविधान और अधिकारों की दुहाई देना बंद कर देनी चाहिए और अगर कोई ऐसा अधिकार जो राज्यों या केंद्र को अभी तक मिला हुआ है और वह इस तरह के कड़े प्रावधान बनाने में आड़े आता है तो उसे ही बदलने का काम भी करना चाहिए क्योंकि देश अब वायदों पर नहीं चल सकता है और इन झूठे वायदों से बाहर निकल कर बदलाव को सही दिशा देने की आवश्यकता आ गयी है. इससे बचकर केवल संविधान की बातें करने से काम नहीं चलने वाला है. देश को आतंक से लड़ने, देश की संपत्ति और नागरिकों की सुरक्षा के लिए जिन भी प्रावधानों की आवश्यकता है उन्हें तत्काल किया जाना चाहिए अब यह कहने से काम नहीं चलने वाला ही कि क्या हो सकता है और क्या नहीं ? जब संविधान बनाया गया था तब ऐसी चरम स्थिति की कल्पना भी नहीं की गयी थी पर आज इस बारे में सोचने की आवश्यकता है तो संविधान के अनुच्छेदों में आवश्यक बदलाव भी करने चाहिए और अगर वर्तमान कानून से ही उद्देश्य की पूर्ति हो सकती है तो उन पर अमल किया जाना चाहिए. देश के सामने आसन्न संकट की अब अनदेखी नहीं की जा सकती है क्योंकि इससे भले ही नेताओं का कुछ न बिगड़ रहा हो पर आने वाले समय में देश को इससे बहुत नुकसान हो सकता है.     
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