मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 14 March 2012

राजनीति की रेल

     संसद में प्रस्तुत होने वाले रेल बजट से वैसे तो देश को बहुत आशाएं नहीं हैं फिर भी कुछ मोर्चों पर सुधारात्मक कदम उठाये जाने की आवश्यकता है अब उनके बारे में रेल मंत्री कब सोच पाते हैं यह देखने का विषय है. एक समय पटरी पर लौटती रेल को केवल पिछले रेल मंत्रियों रेल मंत्रियों ने केवल अपने राज्यों की राजनीति के चलते जिस तरह से उलटने में कोई कोर कसर नहीं रखी उससे यही लगता है कि अगर अगले दो तीन वर्षों तक भी यही नियति बनी रही तो देश के लिए इस घाटे की रेल को चलाना बहुत ही कठिन हो जायेगा ? कोई भी तंत्र कितना भी कुशल और सक्षम क्यों न हो अगर उसके लिए उचित नीतियां और उनका अनुपालन सुनिश्चित नहीं किया जायेगा तो उसके लम्बे समय तक चल पाने की संभावनाएं बहुत कम हो जाती है. २००३ से जिस तरह से अपने अपने कारणों से मंत्रियों ने रेल का किराया बढ़ाया नहीं गया है उससे रेल आज पैसों और संसाधनों की कमी से जूझ रही है अब यह अंतिम समय जैसा है कि अगर इस बार यात्री किराये में कुछ व्यावहारिक सुधार नहीं किये गए तो आने वाले समय में रेल को भी हर वर्ष जनता के करोड़ों रूपये मात्र सञ्चालन के लिए खर्च करने पड़ेंगें जिससे सरकार की अन्य मदों में दी जाने वाली राशि पर दुष्प्रभाव पड़ेगा. उस स्थिति में केंद्र द्वारा राज्यों को दी जाने वाली सहायता और अन्य योजनाओं में कटौती तो करनी ही होगी.
      यह सही है कि सड़क मार्ग से प्रतिस्पर्धा के कारण अब मालभाड़े में बहुत अधिक बढ़ोत्तरी नहीं की जा सकती है पर यात्री किराये को तत्काल ही ठीक किये जाने की आवश्यकता है क्योंकि जिस तरह से डीज़ल के दामों में वृद्धि हुई है उससे रेल के लाभ पर कुप्रभाव पड़ा है और अब इसे केवल यात्री किराये को तर्क संगत न सही पर कुछ हद तक सुधार कर ही ठीक किया जा सकता है. रेल को सरकारी स्तर पर चलाने का यह मतलब तो कतई नहीं है कि उसे इस हद तक संसाधनों की कमी से जूझना पड़े कि यात्रियों की संरक्षा पर खर्च करने के लिए उसके पास धन ही न बचे ? जब रेल चलने की हालत में ही नहीं रह जाएगी तब किस तरह से इसे चलाया जायेगा ? एयर इण्डिया की तरह इसे कब तक सरकारी सहारे के दम पर संचालित किया जा सकता है ? और सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आख़िर जनता से एक तरफ कर के रूप में लिए गए धन को इस तरह से अपनी अक्षमता के कारण ग़लत तरीके से खर्च करने का हक क्या केंद्र को है भी या नहीं ? कोई भी व्यापारिक गतिविधि केवल तभी तक ठीक तरह से चल सकती है जब तक उसके पास व्यावहारिक और व्यापारिक सोच जिंदा रहती है पर जब उसमें राजनीति को हावी होने दिया जाता है तो सारा कुछ गड़बड़ होने लगता है जिससे रेलवे जैसे अच्छे भले चलते हुए संस्थान भी ठहराव तक पहुँचने लगते हैं.  इस तरह से डूबती ही रेल को देखना क्या देश की नियति बन चुकी है या इसे फिर से अपने दम पर चलाने की मंशा नेताओं में बची भी है ?
      वित्तीय स्थितियों पर जिस तरह से मनमोहन और प्रणब अपने क़दम फूँक-फूँक कर रखते हैं उसे देखते हुए रेलवे के लिए कोई बड़ा सुधार करने का यह अंतिम अवसर है क्योंकि अगले बजट तक क्या सीन रहता है या फिर २०१४ में होने वाले चुनावों के कारण सरकार रेल मंत्री पर कितना दबाव बना पाती है यह तो सभी जानते हैं. गठबंधन की राजनीति अगर देश के संसाधनों पर भारी पड़ने लगे तो उसके लिए क्या किया जाये ? दोनों राष्ट्रीय दलों को एक बात समझनी ही होगी और इस पर सहमत भी होना होगा कि सरकार में दोनों में से चाहे कोई भी हो पर रेल जैसा महत्वपूर्ण मंत्रालय सदैव गठबंधन के मुख्य दल के पास ही रहे क्योंकि जब तक रेल के बारे में केवल क्षेत्रीय सोच रखी जाती है तो उसके विकास और परिचालन पर क्या असर पड़ता है अब यह सभी को दिखाई दे रहा है पर क्या इन दलों में इतना नैतिक साहस है कि वे सत्ता की बन्दरबाँट करते समय सहयोगियों को कड़े शब्दों में समझा सकें ? शायद आज के भारतीय राजनैतिक परिदृश्य में ऐसा सोचना भी अधिक आशावादी होना है. रेल देश को जोड़ती है और इस जीवन रेखा का देश की धड़कन की तरह चलना बहुत आवश्यक है. ऐसा नहीं है कि ऐसे सुझाव रेल मन्त्री को नहीं मिले होंगें पर अपनी छवि के चक्कर में रेल की ऐसी तैसी करने में नितीश कुमार से लेकर ममता बनर्जी तक सभी मंत्रियों ने एक जैसा ही काम किया है और अब दिनेश त्रिवेदी क्या गुल खिलाने वाले हैं यह भी आज पता चल जायेगा ? अब नेताओं को यह तय करना है कि आने वाले समय में उन्हें सार्वजानिक क्षेत्र की सामयिक रेल और सुविधाएँ चाहिए या निजी क्षेत्र की रेल ?
        
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