मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Monday, 9 April 2012

अब बुंदेलखंड नहीं ?

     किसी समय छोटे राज्यों को विकास का माडल मानने वाली भाजपा द्वारा ओरछा में आयोजित राज्य कार्यकारिणी की बैठक में जिस तरह से अलग बुंदेलखंड राज्य के बारे में अपना बदला हुआ मत व्यक्त किया गया उससे यही लगता है कि पार्टी किसी नए समीकरण के चलते इस तरह की बातें करने में लगी हुई है. मध्य प्रदेश में वह २००३ से सत्ता में है और जिस तरह से उत्तर प्रदेश में बुंदेलखंड का समर्थन करने वाले दलों को हार का सामना करना पड़ा है उससे यह लगता है कि भाजपा ने भी अब यह मान लिया है कि छोटे राज्य किसी भी तरह से विकास का पैमाना नहीं बनाये जा सकते हैं उसके लिए अच्छे शासन और नीतियों की आवश्यकता होती है. भाजपा के समय में बनाये गए छोटे राज्यों में केवल छत्तीसगढ़ ही विकास के मायने में अपनी रफ़्तार को बनाये रख पाने में सफल रहा है जबकि झारखण्ड और उत्तराखंड में कोई बहुत बड़ा परिवर्तन नहीं दिखाई देता है ये दोनों राज्य तो अस्थिर राजनीती के नए गढ़ के रूप में दिखाई देने लगे हैं. देश में जिस तरह का संवैधानिक ढांचा मौजूद है उसके साथ पूरे देश में विकास की बयार बह सकती है पर आज के समय में भ्रष्टाचार के कारण कोई भी काम ठीक से नहीं हो पाता है.
     अभी तक राज्य सरकारों और केंद्र की नीतियों ने जिस तरह से देश के प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर भागों का दोहन किया है उससे इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के मन में व्यवस्था के ख़िलाफ़ गुस्सा है और जब तक इनकी इस समस्या का समाधान नहीं किया जायेगा तब तक किसी भी तरह से पूरा देश समग्र रूप से विकास नहीं कर पायेगा. आज देश में इस तरह के दोहरी नीतियों के कारण ही कुछ क्षेत्र बहुत पिछड़े हुए हैं जबकि वे आर्थिक रूप से संपन्न हो सकते थे पर कुछ नीतियों की ख़ामियों और कुछ स्थानीय लोगों की दबंगई के कारण भी इन जगहों पर विकास की पहुँच हो ही नहीं पाई ? देश के समुचित विकास के लिए केवल नीतियां बनाये जाने से ही काम नहीं चलने वाला है बल्कि उनका सही ढंग से अनुपालन कराये जाने की अधिक आवश्यकता है क्योंकि जब तक नीतियों के साथ उन्हें धरातल पर उतरने का संकल्प भी नहीं जोड़ा जायेगा तब तक कोई भी नीति किसी भी क्षेत्र को विकास तक नहीं पहुंचा सकती है. हमारे नेता और राजनैतिक दल केवल अपने स्वार्थ के लिए ही अपने वायदों का निर्धारण किया करते हैं जबकि नीतियों का निर्धारण क्षेत्र विशेष की आवश्यकताओं के अनुसार किया जाना चाहिए जिससे विकास में इस तरह के असंतुलन को ख़त्म किया जा सके.
      यह सही है कि देश में आज भी बहुत सारे ऐसे क्षेत्र मौजूद हैं जहाँ पर विकास की कोई किरण भी नहीं पहुंची है वैसे में केवल कुछ कहने से ही काम नहीं चलने वाला है अब राजनैतिक गतिविधियों के स्थान पर इन क्षेत्रों के विकास के लिए ढंग से नीतियां बनाये जाने की आवश्यकता है जिससे किसी भी क्षेत्र के लोगों को उपेक्षा होती न लगे क्योंकि जब किसी तरह की भेदभाव की बात लोगों को महसूस होने लगती है तो वे माओवादियों या अन्य अलगाववादियों के चक्कर में फँस जाते हैं और आने वाले समय में देश के लिए समस्या बन जाते हैं. क्या कारण है कि राज्यों की राजधानियों और अन्य बड़े शहरों के लिए तो सरकारों के पास पैसे कम नहीं पड़ते पर जब किसी दूर दराज़ के क्षेत्र में किसी नदी पर पुल, संपर्क सड़क, अस्पताल और विद्यालय की बात आती है तो अचानक ही संसाधनों का रोना रोया जाने लगता है ? ऐसा कैसे हो सकता है कि किसी के लिए पैसे हैं और किसी के लिए नहीं हैं यह सब केवल सरकारी मंशा पर ही निर्भर करता है. नरसिंह राव के समय शुरू की गयी सांसद निधि से यह आशा की गयी थी कि इससे स्थानीय स्तर पर लोगों की मदद हो सकेगी पर इसमें से भी जिस तरह से बंदरबांट शुरू की गयी उससे पूरी योजना का उद्देश्य ही ख़त्म हो गया. देश में संसाधनों की कमी नहीं है और न ही नीतियों की बस हमारे नेताओं में इच्छा शक्ति की ही कमी दिखाई देती है जो विकास को सही जगह तक पहुँचाने का कोई ठोस प्रयास करना ही नहीं चाहते हैं. 
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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