मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Tuesday, 8 May 2012

नियम और मनमानी

    देश के दवा उद्योग ने जिस तरह  चुपके से कुछ महत्वपूर्ण दवाओं के दामों में चोरबाज़ारी करके उनके दाम मनमाने तरीक़े से बढ़ा दिए हैं और उस बारे में आम लोगों को ख़बर भी नहीं है यह देश के लिए चिंता की बात है. दवाओं के महत्त्व और आवश्यकता को देखते हुए कुछ दवाओं के लिए सरकार ने अधिकतम खुदरा मूल्य निर्धारित कर दिया है जिस कारण से इन्हें बनानी वाली कम्पनियां इनको अधिक दाम पर नहीं बेच सकती हैं पर जनता के लाभ के लिए बनाये गए इस नियम की दवा कंपनियों द्वारा जिस तरह से धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं वह वास्तव में चिंता का विषय है. इसी क्रम में एक ताज़ा उदाहरण एंटीबायोटिक डाक्सीसाइक्लीन के संदर्भ में देखा जा सकता है अभी तक यह दवा सभी कम्पनियों द्वारा १ रूपये तक उपलब्ध करायी जा रही थी पर इतने कम दामों पर ये दवा बेचने में किसी भी दवा कम्पनी को कोई रूचि नहीं थी इसलिए डाक्सीसाइक्लीन बनाने वाली सभी कंपनियों ने एक रणनीति के तहत इसमें लक्टोबसिलस मिलाकर इसका मूल्य ५ रूपये से अधिक कर दिया है जबकि लक्टोबसिलस भी बाज़ार में बहुत कम दामों पर उपलब्ध है. यदि बाज़ार के दामों पर इनकी तुलना की जाये तो इनका संयुक्त उत्पाद भी २.५० रूपये से अधिक का नहीं होना चाहिए पर दवा कम्पनियों के मनमाने रवैये के कारण आम रोगी इस दवा के लिए अब ५ गुनी कीमत देने के लिए मज़बूर है.
     यहाँ पर इस बात का कोई महत्त्व नहीं है कि क्या नियम हैं और क्या बनना चाहिए पर जिस तरह से दवा कम्पनियों ने अपनी मनमानी करके इस कम मूल्य पर उपलब्ध दवा को ५ गुना मंहगा कर दिया है उसका क्या औचित्य है ? यह सही है कि आज सभी कम्पनियां जो व्यापार करने के लिए बाज़ार में हैं उन्हें किसी और बात से कोई मतलब नहीं है पर इन कम्पनियों पर नियंत्रण रखने वाली संस्थाओं की क्या ज़िम्मेदारी बनती है ? जिन दो सस्ती दवाओं को मिलकर मंहगा करके बेचा जा रहा है क्या वास्तव में उनको मिलाकर बेचने की ज़रुरत भी है या फिर केवल सरकारी कानून से बचने और मोटा मुनाफा कमाने के लिए ही ये कम्पनियां इस तरह से हरकतें कर रही हैं ? आज की स्थिति में अब यह विचार करने की बात है कि इन कम्पनियों को इस तरह के बेमतलब के संयोग वाली दवा बनाकर बेचने की अनुमति कैसे मिली और आज तक जब यह दवा केवल अलग से बेचीं जा रही थी तो उससे रोगियों को वास्तव में क्या नुक्सान हो रहे थे जिससे इस तरह के संयोग वाली दवाओं को बनाना आवश्यक हो गया था ? जब तक इन बातों पर पूरी तरह से विचार नहीं किया जायेगा तब तक किसी भी नियम का कोई मतलब नहीं है. जो भी व्यापार करने के लिए बाज़ार में बैठा है उसे अपने धंधे को आगे बढाने की पूरी छूट है पर इस तरह से नियमों को अनदेखा करके कुछ भी बेचना किस तरह से उचित कहा जा सकता है ? 
    इस मसले पर अभी तक किसी ने भी कोई क़दम उठाने के बारे में नहीं सोचा है जो रोगी होता है उसे किसी भी दवा को चिकित्सक द्वारा लिखने पर खाना ही होता है और उस बात का ही ये कम्पनियाँ पूरा लाभ उठा रही हैं. अभी तक इसी दवा को बेचने से भी ये लोग लाभ ही कमा रहे थे पर अब अधिक कमाने की चाह ने ही इन्हें इस तरह के अनैतिक काम करने के लिए उकसाया है. देश में बहुत सारे नियम हैं और कोई भी सरकार इस तरह से नए नियम बनाने के साथ पुराने नियमों की रखवाली भी क्यों नहीं करना चाहती है ? रोज़ नए नियम बनने से उनसे बचने के नए नए रास्ते निकलते रहते हैं. इस बारे में सरकार को यह स्पष्ट कर देना चाहिए कि किसी भी दशा में किसी को भी इस तरह से मनमानी नहीं करने दी जाएगी. जिन दवाओं का अधिकतम मूल्य सरकार ने निर्धारित कर दिया है उसे बनाने वाली कम्पनी किसी भी चोर रास्ते से अगर इस तरह का काम करते पायी जाये तो उसके खिलाफ कड़े आर्थिक दंड लगाये जाने की व्यवस्था अब करनी ही होगी वरना आने वाले समय में दवाओं में मनचाहा फेरबदल करके रोगियों के लिए मंहगे होते इलाज़ में ये कम्पनियाँ और समस्या बनकर सामने आती रहेंगीं.     
 
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

2 comments:

  1. are sahab puccho mat ek dawai pr kitna fayda hota hai ...agar sahi daam pr milti to gareeb bhi apna ilaj kara lete

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  2. होता चर्चा मंच है, हरदम नया अनोखा ।

    पाठक-गन इब खाइए, रविकर चोखा-धोखा ।।

    बुधवारीय चर्चा-मंच

    charchamanch.blogspot.in

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