मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Thursday, 17 May 2012

लाल बत्ती और सांसद

         मोटर वाहन (संशोधन) अधिनियम पर चर्चा के दौरान हमारे सांसदों में जिस तरह से अपने वाहनों पर लाल बत्ती लगाने की बेचैनी दिखी उससे यही लगता है कि ये माननीय लोग किसी भी प्रकार से अपने को आम लोगों से अलग ही दिखने के लिए लालायित हैं. अभी तक जिस तरह से केंद्र सरकार ने इस बात पर सहमति नहीं दी उससे उसकी परेशानी को समझा जा सकता है क्योंकि उसे पूरे देश के साथ दिल्ली में संसद चलने के समय वहां की कानून व्यवास्था को भी दिल्ली पुलिस के माध्यम से देखना पड़ता है. जब लगभग ७०० लाल बत्ती लगी गाड़ियाँ सत्र के दौरान वीआईपी क्षेत्र में चलने लगेंगीं तो पुलिस के लिए यह एक बड़ी समस्या बनकर सामने आने वाली है क्योंकि आज जो सांसद यह मांग कर रहे हैं कि उन्हें दिल्ली के इस क्षेत्र को छोड़कर बाकी हिस्सों में लाल बत्ती लगाने का अधिकार मिलना ही चाहिए वे क्या यह अधिकार मिलने पर दिल्ली की सीमा में अपनी बत्ती उतार लेंगें ? आज भी अनधिकृत तौर पर बहुत सारे माननीय लाल बत्ती लगाये घूमते रहते हैं जबकि उन्हें इस बात का कोई अधिकार नहीं मिला हुआ है. इससे अच्छा यह होगा कि सांसद लिखित में अपनी एक गाड़ी बताये और उस पर लगाने के लिए कुछ विशेष प्रकार की पट्टी जिस पर संसदीय क्षेत्र संख्या और क्षेत्र का भी उल्लेख हो संसदीय सचिवालय द्वारा दी जाये जिसे लगाना सांसदों के लिए अनिवार्य कर दिया जाये और पुलिस प्रशासन को भी इस बारे में जानकारी दे दी जाये इससे जहाँ एक तरफ इनको कुछ विशेष दर्ज़ा भी मिल जायेगा साथ ही इनके पदनाम लगी अनधिकृत गाड़ियों को रोकने में भी पुलिस को मदद मिलेगी.
         आज केवल प्रभाव और धमक दिखाने के लिए ही सांसद इस तरह की मांग करने में लगे हुए हैं क्योकि कुछ राज्यों ने इस मामले में तुष्टिकरण की हद करते हुए विधायकों और पार्षदों तक को लाल बत्ती लगाने की अनुमति दे रखी है जिससे उन क्षेत्रों के सांसदों को यह बात अखरती रहती है कि बड़े क्षेत्र और बड़ी चौपाल के प्रतिनिधि होने के बाद भी उन्हें यह हक़ क्यों नहीं मिला हुआ है ? आज भी हमारे नेता लोग जिस तरह से कानून की धज्जियाँ उड़ाने में नहीं चूकते हैं उसके बाद इस तरह की छूट मिल जाने पर वे इसका दुरूपयोग नहीं करेंगें इस बात की गारंटी कौन देगा ? आज भी किसी भी सांसद या विधायक के पास जितनी भी गाड़ियाँ होती हैं सब पर उनके पद लिखे होते हैं जबकि उनमें से किसी एक का ही उपयोग इनके द्वारा किया जाता हैं पर जब ये अनधिकृत वाहन क्षेत्र में घूमते रहते हैं तो स्थानीय पुलिस और प्रशासन इन पर हाथ नहीं डालना चाहते हैं क्योंकि इससे बिना बात का बखेड़ा खड़ा होता है. किसी भी सांसद के पास कितनी गाड़ियाँ होनी चाहिए जिनका वे अधिकारिक तौर पर प्रयोग करें इस बारे में भी कुछ नियम अवश्य होने चाहिए.
        क्या आज हमारे जनप्रतिनिधि इस बात के लिए लिए खुद को ज़िम्मेदार नहीं मानते हैं कि उन्हें जो भी सुविधाएँ मिलती हैं वे बिना सोचे अपने चहेतों को भी वही सब देना चाहते हैं भले ही वह संवैधानिक रूप से कितना भी ग़लत क्यों न हो ? अधिकार मागते समय हमारे नेता यह भूल जाते हैं कि उन्हें आज जो अधिकार मिले हुए हैं वह भी भारत में आम नागरिक को नहीं मिलते हैं और क्या उन अधिकारों के साथ संसद या विधानमंडल की सदस्यता की शपथ लेते समय जो कुछ वे केवल पढ़ देते हैं कभी उसे उठाकर भी देखते हैं कि उन्होंने देश से क्या वायदा किया था ? जब हमारे नेताओं को ही केवल अपने अधिकारों से ही मतलब रह गया है तो उस स्थिति में जनता से यह आशा कैसे की जा सकती है कि वह अपने कर्तव्यों के प्रति सचेत रहेगी ? देश को कानून की नहीं  उसके अनुपालन करने वालों की अब ज्यादा ज़रुरत है क्योंकि जिस रफ्तार से रोज़ ही नए कानून बन रहे हैं उस रफ्तार से ही देश में नयी नयी समस्याएं भी खड़ी होती जा रही हैं अब इस मामले में संसद के ६० वर्ष पूरे होने पर जो संकल्प नेताओं ने लिए थे उन पर अमल करने का समय आ गया है वरना कौन पूछ रहा है या किसकी हिम्मत है जो कुछ पूछ भी सके ? 
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