मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 23 May 2012

रेलवे आरक्षण और सुविधा

       जिस तरह से गर्मियों में भारी भीड़ के चलते रेलवे के आरक्षण के सारे उपाय कम लगने लगते हैं उनसे निपटने के लिए किये जाने वाले सारे प्रयास जिस स्तर पर किये जाते हैं उनमें बड़े स्तर पर परिवर्तन करने की आवश्यकता है क्योंकि देश की जनता को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने की ज़िम्मेदारी स्वाभाविक रूप से इसी पर है. आज जिस तरह से ४ महीने पहले आरक्षण शुरू किया जाने लगा है उससे टिकटों की मारामारी और भी बढ़ गयी है. यह सही है कि इससे रेलवे को ४ महीने पहले ही काफ़ी पूँजी मिलनी शुरू हो जाती है जिसके लिए उसे सुविधा बाद में देनी होती है. इस तरह की व्यवस्था में रेलवे को पैसे तो मिल जाते हैं पर इतने दिनों पहले से आरक्षण होने से कम सूचना पर यात्रा करने वालों के लिए टिकट पाने के लिए तत्काल कोटे के अलावा कोई अन्य चारा नहीं बचता है. आम लोगों की इस समस्या का समाधान निकालने के लिए अभी तक रेलवे के पास कोई व्यवस्था नहीं बची हुई है. इस बारे में अब किसी भी तरह से कुछ गंभीर प्रयास किये जाने की आवश्यकता है पर अभी भी रेलवे को केवल काम चालू विभाग की तरह जिम्मेदारियों से दूर रहकर ही चलाया जा रहा है.
     पिछले कुछ वर्षों में मंडल स्तर पर कुछ अधिकारियों के प्रयासों के चलते भीड़ भाड़ वाली ट्रेनों में प्रतीक्षा सूची को देखते हुए अतिरिक्त कोच लगाये जाने की व्यवस्था शुरू की गयी है जिससे काफ़ी हद तक यात्रियों को सुविधा मिलनी शुरू हो गयी है फिर भी यह प्रयास उस स्तर पर नहीं हो पा रहे हैं जितनी संख्या में यात्रियों को सकी आवश्यकता है ? ऐसे में रेलवे को देश में अच्छी होती सड़कों और आधुनिक बसों के आने के बाद से बड़े शहरों से ५०० किमी तक की दूरी के यात्रियों को रोक कर रखने में दिक्कत आने वाली है जिसका अंदाज़ा अभी रेलवे के लोग नहीं लगा पा रहे हैं कहीं ऐसा न हो कि इन दूरी के शहरों तक की यात्रा करने के लिए लोग आने वाले समय में बसों से तय करने लगें ? यह भी सही है कि रेलवे ने अपनी तरफ से लोगों को घर बैठे आरक्षण की सुविधा भी दे रखी है पर सुबह ८ बजे से जिस तरह से इसकी वेबसाइट लटकना शुरू कर देती है उसके बाद काम करना ही मुश्किल हो जाता है और आम आदमी के लिए टिकट विंडों से तत्काल टिकट पा लेना किसी युद्ध को जीत लेने से कम नहीं है. इस व्यवस्था को भी और सुदृढ़ करने की बहुत आवश्यकता है क्योंकि जब लोगों को टिकट ही नहीं मिल पायेंगें तो वे किस तरह से अपनी यात्री पूरी कर पायेंगें.
         अब रेलवे को अपने बड़े में एक रणनीति के तहत बड़ी संख्या में कुर्सी यानों को जोड़ने का प्रयास करना चाहिए क्योंकि जब किसी भी ट्रेन में जगह नहीं मिलती है तो लोग बसों में सफ़र करने को मजबूर हो जाते हैं जिससे रेलवे को कम प्रयासों के बाद मिलने वाले अधिक लाभ से हाथ धोना पड़ता है. जिस तरह से बड़े शहरों को जोड़ने वाली रात्रिकालीन गाड़ियों में पूरी तरह से शयनयान ही लगे होते है और इनके साथ मुश्किल से २ सामान्य कोच ही होते हैं जिनमें घुस पाना किसी लड़ाई से कम नहीं होता है. इन गाड़ियों में आवश्यकता को देखते हुए प्रायोगिक तौर पर एक एक कुर्सी यान लगाया जाना चाहिए जिससे कम खर्चे में बड़ी संख्या में यात्रियों को गंतव्य तक पहुँचाया जा सके. यदि सामान्य श्रेणी के इन कोचों में यात्रियों की संख्या ठीक रहती है तो बाद में इसमें वातानुकूलित कुर्सी यान भी जोड़े जा सकते हैं जिससे रेलवे बड़ी संख्या में उन यात्रियों को भी सेवाएं दे पाने में सफल हो सकेगी जो चाहकर भी रेल का उपयोग नहीं कर पाते हैं.जिस तरह से आज रेलवे के सामने वित्तीय संकट बढ़ता ही जा रहा है उस स्थिति में केवल कुछ छोटे छोटे प्रयासों के द्वारा भी इसकी आर्थिक गति को बनाये रखते हुए कम प्रयासों में ही यात्रियों को सेवा देने का सामाजिक उद्देश्य भी पूरा होता रहेगा.    
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2 comments:

  1. आपने सही समस्या को उठाया है. मैंने दो महीने पूर्व आरक्षण करवाया था. वेटिंग 34 था. आखिरी स्टेटस 28 तक पहुँचा. तत्काल आरक्षण के लिए आईआरसीटीसी की साइट हैंग होती रही और दो-तीन असफल प्रयासों में 129 सीट भर गई. अंततः दो महीने पूर्व किया गया प्लान चौपट हो गया.
    रेल के अलावा दूसरा कोई जरिया ही नहीं है यात्रा का.

    रेलवे!! कुछ करो. हम दो-तीन गुना किराया देने को तैयार हैं. बस हमारे लिए सुविधानुसार ट्रेन की सीटें मांग पर उपलब्ध करवाओ!!!

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  2. but what is your opinion about population? Neither railway nor any other department can fulfil the high raising demand of the uncontrolled huge crowd.

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