मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 27 June 2012

नगर निकाय या विधान सभा

             आख़िर में यूपी सरकार ने एक महत्वपूर्ण फैसला लेते हुए यह निर्णय कर ही लिया है कि नगर निकाय के किसी भी अध्यक्ष के सांसद या विधायक चुने जाने के बाद उसे दोनों पदों में से किसी एक पर से इस्तीफ़ा देना होगा जबकि अभी तक नगर निकाय अधिनियम में यह स्थिति है कि उसके अध्यक्ष संसद या विधायक भी हो सकते हैं. इस तरह से दो महत्वपूर्ण पदों पर रहने से एक ही व्यक्ति द्वारा दोनों जगहों पर अपने पदों के साथ न्याय नहीं किया जा सकता है ऐसे में यह नया संशोधन वास्तव में प्रदेश के निकायों में विकास के कामों को गति देने का काम करने में सहायता करने वाला साबित होगा. अभी तक नेताओं में जिस तरह से पद की भूख बढ़ती ही जा रही है और एक एक नेता के पास कई कई पद एक साथ में हैं उससे देश के लोकतंत्र का मजाक ही उड़ रहा है पर अब यह स्थिति इस संशोधन के बाद पलटने वाली है.
       इस संशोधन से जहाँ एक तरफ नेताओं को मजबूरी में अपनी इस तरह की जिम्मेदारियों को छोड़ना पड़ेगा वहीँ दूसरी तरफ़ उनके कार्य क्षेत्र के सीमित हो जाने का कारण वे वास्तव में जनता से जुड़े मसलों पर सही ढंग से ध्यान भी दे सकेंगें. इस मामले में राज्य सरकार की गंभीरता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसने पहले ही विधि विभाग से इस मसले पर राय कर ली है और जल्दी ही इसे कानूनी रूप देने की तैयारियां भी की जा रही हैं. इस तरह के महत्वपूर्ण कामों को करने के लिए जिस इच्छा शक्ति की ज़रुरत होनी चाहिए अभी तक नेताओं ने वह नहीं दिखाई थी पर अब जब यह स्थिति सुधारने की कवायद चल ही रही है तो इसका पूरा समर्थन किया जाना चाहिए. अभी तक जिस तरह से इन दोनों पदों पर रहते हुए नेताओं ने जिस तरह की लूट मचाई और दोनों पदों के एक जगह होने के कारण उन्होंने विधायक होने का लाभ अधिकारीयों पर अनावश्यक दबाव डालकर लिया वह निंदनीय है.
       हो सकता है कि इस तरह के संशोधन को राज्य सरकार आसानी से नहीं पारित करा पाती क्योंकि जिस स्तर पर नेता लोग इससे लाभ उठा रहे हैं तो वे आसानी से अपने हाथ से इतनी शक्ति नहीं जाने देंगे पर राज्य सरकार की दृढ इच्छा शक्ति के आगे अब इन विधायकों की बिलकुल भी नहीं चलने वाली है. देश में आज भी बहुत सारे ऐसे अनावश्यक और निरर्थक कानून अस्तित्व में हैं जिनसे किसी भी तरह से किसी को भी कोई लाभ नहीं मिलता केवल उन पदों पर बैठने वाले लोग ही मलाई काटते रहते हैं जिसका लोकतंत्र में कोई मतलब ही नहीं बनता है. अब जिस तरह से अखिलेश सरकार ने इस मसले को अपने हाथों में लेकर इसे सुधारने का प्रयास शुरू किया है वह आने वाले समय में नगर निकायों के लिए अच्छा ही साबित होने वाला है.      

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