मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Tuesday, 10 July 2012

बेरोजगारी भत्ते का स्वरुप

         यूपी सरकार ने जिस तरह से बेरोज़गारी भत्ते के लिए आवेदन करने वालों के लिए भत्ते के बदले काम लेने की जो योजना बनाई गयी है वह आज के परिप्रेक्ष्य में बिलकुल सही है क्योंकि जहाँ विभिन्न सरकारी कार्यालयों में काम करने वाले कार्मिकों की कमी है वहीं दूसरी तरफ़ इस योजना का बाद सरकार के पास बड़ी संख्या में कार्मिक उपलब्ध होने की सम्भावना है. पिछली बार जिस तरह से घर बैठे ही भत्ता दिया गया था उसका कोई औचित्य नहीं था क्योंकि इस तरह से विभिन्न जगहों पर निजी क्षेत्र में काम करने वालों ने भी ग़लत तरीके से इस योजना का लाभ उठाया था और सरकार की उस मंशा पर ही पानी फेर दिया था जो वास्तव में ज़रुरत मंद लोगों केए बदलाव ला सकती थी. उस अस्थायी व्यवस्था से किसी को कुछ विशेष हासिल नहीं हुआ था पर इस बार जहाँ यह योजना वास्तव में गुणवत्ता और सेवा में सुधार करने का काम करने वाली है वहीं दूसरी तरफ़ इससे सामजिक ढांचे में भी कुछ बदलाव हो सकता है.
     इस योजना में अभी भी सुधार की बहुत गुंजाईश है क्योंकि इसके तहत बहुत सारे ऐसे काम स्थानीय स्तर पर लिए जा सकेंगें जो अभी तक करने के लिए सरकार को अलग से पैसे खर्च करने पड़ते थे. सबसे बड़ी बात यह है कि जिस तरह से किसी भी सरकारी क्षेत्र के बैंक या अन्य जगह पर जाने पर पता चलता है कि वहां पर काम करवाने के लिए लोग कितनी देर तक पंक्तियों में खड़े रहते हैं जिससे कार्य दिवसों का बहुत नुकसान हुआ करता है पर जब इस भत्ते से मिलने वाली श्रम शक्ति को सही तरह से नियोजित किया जायेगा तो उससे दोनों पक्षों को पूरा लाभ मिलने लगेगा. शिक्षा के अनुरूप काम कर सकने वाले वाले युवाओं को इस योजना से वास्तविक लाभ मिल सकेगा और उनकी कार्य दक्षता में भी बढ़ोत्तरी होगी. सरकार जिस तरह से अपने इस काम को लागू करवाना चाहती है उसे देखते हुए कुछ तो परिवर्तन होगा ही.
    इसके साथ ही सरकार को इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि इस योजना का दुरूपयोग करने में कहीं किसी स्तर पर नेतागिरी न शुरू हो जाये क्योंकि जिस तरह से इन युवाओं की भारी संख्या होगी तो आने वाले समय में कोई सरकार इन्हें सेवा में स्थायी करने के लिए चुनावी लालच दे सकती है जिससे कम कुशल लोगों की सरकारी कर्मचारियों के रूप में भर्ती होने की सम्भावना हो जाएगी ? शिक्षा के अनुरूप रोज़गार मिलने पर किसी भी तरह की कोई समस्या नहीं है पर जब केवल राजनीति के लिए ही कुछ किया जाने लगता है तो उसका वास्तविक उद्देश्य ख़त्म हो जाता है. एक समय मुलायम सरकार द्वारा भर्ती किये गए उर्दू अनुवादकों ने वास्तव में उर्दू भाषा के नाम पर रोज़गार तो पाया पर क्या वे आज अनुवादन की प्रक्रिया से उर्दू का कोई भला कर पा रहे हैं जो सरकार की मंशा थी ? वे केवल भाषा के नाम पर अपने पेट को तो भर पाने में सफल हो रहे हैं पर उससे भाषा का कितना नुकसान हुआ है यह किसी को नहीं पता इसलिए इन बातों से भी सावधान रहने की बहुत आवश्यकता है.    
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