मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 4 July 2012

वाहन, निधि और "गरीब" विधायक

       यूपी की अखिलेश सरकार ने प्रदेश के विधायकों का ध्यान रखते हुए जिस तरह से उनको विकास निधि से २० लाख रूपये तक का वाहन खरीदने के लिए अनुमति प्रदान की है वह अब उनकी सरकार के लिए उलटी पड़ती नज़र आ रही है क्योंकि जनता के पैसे और वास्तविक विकास की बातें अचानक ही प्रदेश के माननीयों के दिलों में हिलोरें मारने लगी है. यह एक अलग तरह की स्थिति है जिसमें सरकार तो कह रही है कि आप बढ़िया वाहन से अपने क्षेत्र में चलकर अपनी विधायकी का रोब ग़ालिब करो पर जनता के एहसानों तले दबे हुए ये लोग इतनी हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं कि इस सुविधा का लाभ उठा सकें ? देश मेंं माननीयों के विकास निधि से किसका विकास हो रहा है यह सभी जानते हैं और पूरे देश से ही इस निधि के अपने हितों के लिए दुरूपयोग किये जाने की शिकायतें हमेशा ही मिलती रहती हैं फिर भी इस मद को केवल माननीयों की हनक बनाये रखने के लिए चलाते रहना कहाँ तक उचित है ? जनता के पैसों का किस हद तक दुरूपयोग हो रहा है और जनता के पास ऐसा कोई भी उपाय नहीं है कि वह अपने मेहनत से कमाए गए इस धन का दुरूपयोग किस तरह से रोके ? विधायकों के खुले विरोध के बाद सरकार के चहेते आज़म खान ने यह कह कर लीपा पोती करने की कोशिश की है कि यह प्रस्ताव है और सभी के लिए यह बाध्यकारी नहीं है बल्कि यह केवल उन "गरीब" विधायकों के लिए है जो अपने क्षेत्र के दौरे के लिए कोई वाहन रख पाने की स्थिति में नहीं है. खान साहब देश ने ऐसे गरीबों को साल भर में ही ३० लाख की गाड़ियों पर घूमते देखा है आप को परेशान होने की ज़रुरत नहीं है बस अभी कुल तीन महीने ही तो हुए हैं थोड़ा इंतज़ार कर लेते फिर ऐसी बात कहते तो शायद कुछ अच्छा लगता पर जिस रफ्तार से माननीयों की आर्थिक हैसियत बढ़ती है वैसे देखा जाये तो अलगे एक वर्ष में कोई भी गरीब नहीं रहने वाला है और जो एक साल में भी अमीर नहीं हो पाया तो मान लेना चाहिए कि उसे भले ही प्रधानमंत्री बना दो पर उसकी आत्मा उसे कभी भी अमीर होने ही नहीं देगी.
    किसी भी प्रदेश में इस निधि से हुए विकास की स्थिति पर गौर किया जाये तो स्थिति सामने स्पष्ट हो जाती है क्योंकि कहीं पर भी किसी ने भी उन क्षेत्रों में काम करवाने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई जिसमें रूपये का प्रवाह निधि से माननीयों की तरफ़ न होता हो ? यह कोई आरोप नहीं है यह सच्चाई है और आज भी इसे देखने के स्थान पर इस बार बात ही नहीं की जा रही है. देश में विकास करवाने के लिए बहुत सारी संस्थाएं लगी हुई हैं ऐसी स्थिति में इस तरह की निधियों में भी कम से कम ५० % राशी का आवंटन ऊर्जा क्षेत्र के लिए होना ही चाहिए और जिस माननीय द्वारा इस आवंटन का उल्लंघन किया जाये उनकी निधि को तुरंत ही आधा कर दिया जाना चाहिए पूरा देश ऊर्जा के संकट से जूझ रहा है अगर इस तरह की फालतू की निधियों को बंद कर दिया जाये तो इस तरह के ज़रूरी क्षेत्रों में काम करना आसान हो जायेगा और साथ ही धरातल पर विकास की बातें भी हो सकेंगीं ? जब देश में सभी के काम करने और न करने की स्थिति में उसको पुरूस्कार या दंड देने की व्यवस्था है तो फिर क्यों हमारे नेताओं को इससे छूट दी जाती है ? आवश्यकता तो इस बात की है कि नेताओं द्वारा खुद ही उच्च आचरण वास्तव में प्रस्तुत किये जाएँ जिससे जनता पर उसका सकारात्मक प्रभाव पड़े बिना नहीं रह सके. लोकतंत्र में जनता की आवश्यकता केवल वोट लेने के समय ही होती है क्योंकि वह संवैधानिक मजबूरी है वर्ना हम लोग चिल्लाते ही रहते और ये लोग हमारी कुछ भी नहीं सुनते.
       सरकार का यह क़दम और प्रभावशाली हो सकता था अगर इसमें निधि से गाड़ी खरीदने के स्थान पर कम ब्याज धन देने वाला एक अलग से कोष बनाया जाता जो आवश्यकता में विधायकों की इस तरह की ज़रूरतों को पूरा करने का काम करता या सरकार इस धन को बिना ब्याज के भी उपलब्ध कर सकती है और जो भी खर्च महीने के हिसाब से बने उसे इनके वेतन से कटौती करके वापस लेने की व्यवस्था भी की जा सकती है पर सरकार ने जिस तरह से इन लोगों को खुली छूट दे दी उसकी कोई आवश्यकता नहीं है. अखिलेश जिस तरह से युवा हैं और उनकी सोच होनी चाहिए अब लगता है कि वह बहुत जल्दी ही भारतीय राजनीति को सीख रहे हैं क्योंकि वास्तविक विकास और इस तरह के झुठलाने वाले विकास के बीच अब फर्क करना उन्हें भी अच्छा नहीं लगता है जिससे अब कोई भी इस सरकार से किसी बड़े परिवर्तन की आशा लगाकर बैठा है तो उसे आने वाले समय में बहुत ही निराशा होने वाली है. जनता के पास करने के लिए कुछ खास नहीं होता तब तक जो लोग इस निधि से वास्तव में या फिर किसी अन्य रास्ते से कमाए गए धन से मंहगी गाड़ियाँ खरीदने वाले हैं जनता तो उसकी धूल खाने के लिए तैयार ही बैठी है. फिलहाल इस घटना ने यह तो साबित कर ही दिया कि हमारे माननीयों में वह सब स्वीकार करने की हिम्मत नहीं है जो वे छिपकर करते रहते हैं पर सरकार द्वारा खुलेआम कहने पर वे उस काम को करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते हैं.     

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