मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Saturday, 25 August 2012

अब नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी भी

            यूपी के लोकायुक्त न्यायमूर्ति एन के मेहरोत्रा ने बांदा के एक आरटीआई कार्यकर्ता आशीष सागर दीक्षित की शिकायत पर जांच करते हुए बसपा के कद्दावर नेता और पूर्ववर्ती सरकार में शक्तिशाली मंत्री रहे नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी को आय से अधिक सम्पत्ति के मामले, अवैध रूप से खनन पट्टे देने और नजूल ज़मीन को हड़पने के आरोप सही पाए हैं. जिस तरह से शिकायत की जांच करने में लोकायुक्त को पूरे १० महीने लगे उससे मामले की गंभीरता का पता चलता है. साथ ही वित्तीय अनियमितता के मामले भी पाए जाने के कारण ही लोकायुक्त ने इस पूरे प्रकरण की जांच किसी ऐसी एजेंसी से कराने की सिफ़ारिश भी की है जो इस तरह की वित्तीय अनियमितताओं की विवेचनाओं में दक्ष हो. आख़िर क्या कारण है कि सत्ता के केंद्र के नज़दीक रहने मात्र से ही किसी व्यक्ति की आर्थिक हैसियत में इतना इज़ाफ़ा कैसे हो जाता है जबकि वह ईमानदारी, क़ानून और संविधान की क़समें लगातार ही खाता रहता है ? क्यों किसी भी आम आदमी के नेता बनते ही उसमें सामान्य व्यक्ति वाले वे सभी लक्षण गायब से हो जाते हैं जो अभी तक उसकी धरोहर रहे होते हैं ? क्यों नेता बनते हैं व्यक्ति पर बेताल की तरह कुछ अन्य तत्व हावी जाते हैं जो उसके आम आदमी होने तक उस पर हमला नहीं करते हैं ?
          यहाँ पर दो बातों पर ही विचार किये जाने की ज़रुरत है कि क्या अखिलेश सरकार सिद्दीक़ी के ख़िलाफ़ किसी भी तरह की जांच की सिफ़ारिश करेगी और अगर लोकायुक्त की सिफारिशों को लगातार ही इस तरह से कूड़े के ढेर में डालना है तो फिर जनता के पैसे से इस तरह के किसी भी आयुक्त या कार्यालय को चलाने की ज़रुरत ही क्या है ? भ्रष्टाचार के मामले में सभी राजनैतिक दलों का इतिहास लगभग एक जैसा ही रहा है तो फिर सरकार में चाहे जो भी दल हो वह अपने भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए अन्य दलों के बड़े नेताओं पर तब तक हाथ नहीं डालना चाहता जब तक उस पर कोर्ट का डंडा चलने का ख़तरा न हो ? कोर्ट के डर से ही आज बड़े बड़े घोटाले खुल रहे हैं और कई मामलों में बड़े नाम वाले नेताओं को जेल की हवा भी खानी पड़ी है फिर भी नेता लोग अपने भ्रष्टाचार से जुड़े हुए कारनामों को बंद करने के मूड में नहीं दिखाई देते हैं. देश में आज भ्रष्टाचार ने इतने पैर पसार लिए हैं कि कोई भी उनके ख़िलाफ़ जाने की हिम्मत भी नहीं कर पाता है फिर भी कुछ सिरफिरे (ईमानदार- शायद यही शब्द ठीक है ) लोग आज भी सत्ता के दलालों से लोहा लेने के लिए क़ुर्बान होने को तैयार बैठे हैं ?
         अभी तक अपने काम करने के रवैये के कारण सामान्य से कम नंबर पाने वाली अखिलेश सरकार इस तरह के मुद्दों पर क्या रवैया अपनाती है यह तो समय ही बताएगा पर जिस तरह से अभी तक सरकार के काम करने का नज़रिया रहा है उससे तो कहीं से भी यह नहीं लगता है कि यह पूर्ण बहुमत से आई हुई केवल ४ महीने पुरानी सरकार है. इस सरकार का रवैया तो मध्यावधि चुनाव की आशंका में जी रही उस सरकार जैसा है जो किसी भी फ़ैसले को करने से पहले नफ़ा नुकसान जोड़ने में ही पूरा समय ख़राब करती रहती है ? जिस भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करने के कारण ही जनता ने सपा को सत्ता दी थी आज वह पता नहीं कहाँ खो गयी है और भ्रष्टाचारियों के ख़िलाफ़ काम करने की मंशा दिखाने के स्थान पर सरकार के मंत्री ही थोड़ी थोड़ी चोरी करने की सलाह देने में नहीं चूक रहे हैं भले ही वो बातें मजाक में ही कही जा रही हों ? अखिलेश के युवा और पूर्वाग्रह से मुक्त होने की जो आशा प्रदेश की जनता ने लगायी थी उस पर वे पूरी तरह से असफल रहे हैं क्योंकि बदलाव जिस तरह से महसूस होना चहिये था अगर नहीं है तो इसके लिए अखिलेश ही ज़िम्मेदार हैं. अपने राजनैतिक करियर की शुरुआत कर रहे अखिलेश सख्त प्रशासक बनते हैं या आम राजनेता यह तो अगले एक साल में ही पता चल पायेगा. 
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