मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Sunday, 26 August 2012

न्यायपालिका और विधायिका

                 "संवैधानिक ढांचे का न्यायशास्त्र" विषय पर इंडिया इंटरनॅशनल सेंटर में अपने संबोधन में सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस, जस्टिस एच एस कपाड़िया ने आज के समय में कोर्ट के द्वारा दिए जाने वाले निर्णयों की समीक्षा करते हुए कहा कि जजों को देश चलाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए क्योंकि देश के संविधान ने न्यायपालिका और विधायिका के अधिकारों को स्पष्ट रूप से बाँट कर रखा है. पिछले वर्ष दिल्ली में बाबा रामदेव के आन्दोलन को रात के समय समाप्त करवाने की घटना का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि उस निर्णय में कोर्ट द्वारा सोने को मौलिक अधिकार बताया गया जबकि इसके अनुपालन में बहुत सारी व्यवहारिक कठिनाइयाँ सामने आ सकती हैं ? यह सही है कि कोर्ट की सक्रियता के चलते ही पिछले कुछ दशकों से देश की कार्यपालिका पर दबाव बना है और जनता का भरोसा भी कोर्ट पर और मज़बूत हुआ है पर इसका मतलब यह नहीं लगाया जा सकता कि जज अपने निर्णयों से विधायिका के काम में हस्तक्षेप करना शुरू कर दें ? यह अच्छा ही हुआ कि इस तरह का मंथन चीफ़ जस्टिस की तरफ से शुरू किया गया है जिसका असर अब कहीं न कहीं भविष्य में आने वाले निर्णयों पर दिखाई भी दे सकता है.
         कोर्ट की सक्रियता से किसी को भी शिकायत नहीं है पर जब संविधान ने विधायिका को कानून बनाने के अधिकार दे रखे हैं तो कोर्ट किस तरह से सरकार को किसी कानून को बनाने के किये निर्देश दे सकती है ? कोर्ट की अवमानना के डर के चलते विधायिका ऐसे मसलों पर अपने वोट बैंक पर नज़र रखते हुए कानून में ही संशोधन करके कोर्ट द्वारा दिए गए निर्णय को ठेंगा दिखा देती है. शाहबानो के मसले पर देश देख चुका है और अब प्रोन्नति में आरक्षण के मुद्दे पर देश एक बार फिर से वोटों की राजनीति में कोर्ट के निर्णय की धज्जियाँ विधायिका द्वारा उड़ाए जाने की तैयारियां कर ली गयी हैं. जब देश का राजनैतिक माहौल इस हद तक पहुँच चुका है कि कोर्ट के फ़ैसले भी देश हित के स्थान पर वोट हित में माने या ठुकराए जाते हैं तो कोर्ट की तरफ से इस तरह की बातें चीफ़ जस्टिस द्वारा उठाये जाने से वास्तव में न्यायपालिका को अब आत्म मंथन करने की ज़रुरत महसूस होने लगेगी. कोर्ट के निर्णय का सम्मान करने की बातें तो केंद्र और राज्य सरकारें करती ही रहती हैं पर देश में पर्यावरण, शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोज़गारी आदि ऐसी मुद्दे हैं जिन पर देश को पहले ध्यान देना चाहिए पर इससे नेताओं के वोटों पर कम असर पड़ता है इसलिए वे केवल इन्हीं मुद्दों पर कोर्ट के आदेश को मानते हैं.
          जब देश की विधायिका अपने काम में असफल होती दिखाई दे तो जनता के पास एकमात्र रास्ता कोर्ट के फ़ैसले से विधायिका को जगाने का ही बचता है. जस्टिस कपाड़िया का यह कहना कि आदेश देते समय कोर्ट कानून का ध्यान रखे यहाँ पर बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि हर बड़े मुद्दे पर दिए गए किसी भी फ़ैसले का बहुत दूरगामी परिणाम देश पर पड़ता है और इसे हलके में नहीं लिया जा सकता है. जस्टिस कपाड़िया ने एक महत्वपूर्ण बात और भी रेखांकित की कि यदि कोर्ट द्वारा दिए गए किसी निर्णय को विधायिका मानने से ही इनकार कर दे तो कोर्ट के पास क्या अन्य रास्ते बचते हैं जिन पर चलकर वह अपनी बात मनवा सकती है ? विधायिका को इस बात से खुश होने कि ज़रुरत नहीं है कि अब कोर्ट से कड़े फ़ैसले नहीं आयेंगें बल्कि उसे आत्म मंथन करने की ज़रुरत है कि आख़िर उसके स्तर पर क्या कमी रह रही है कि आम लोग अपने काम करवाने के लिए अब कोर्ट की शरण में जाने लगे हैं ? अगर विधायिका अपनी ज़िम्मेदारी न्यायपालिका की तरह ही समझने का प्रयास करती होती तो आज न इस तरह के निर्णय आये होते और न ही न्यायिक सक्रियता बढ़ने और मौलिक अधिकारों के उल्लंघन और उनको फिर से समझाए जाने की आवश्यकता पड़ती. पूरे मसले में एक बार फिर से कोर्ट ने अपनी सीमाओं को समझा है पर देश की विधायिका इसे कब समझ पायेगी इस बात का जनता को इंतज़ार है....          
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