मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 29 August 2012

मोबाइल टावर और बिजली

           पर्यावरण के लिए काम करने वाली संस्था ग्रीन पीस ने भारतीय परिप्रेक्ष्य में बढ़ते हुए मोबाइल के उपयोग और इससे होने वाले पर्यावरण के नुकसान का आंकलन करते हुए कहा है कि अगर यदि इन सभी को वैकल्पिक ऊर्जा के संसाधनों से जोड़ दिया जाये तो आने वाले ८ सालों में पर्यावरण को स्वच्छ रखने के साथ ही कम्पनियां लगभग ८० हज़ार करोड़ रुपयों की बचत भी कर सकती हैं. यह सही है कि भारतीय दूरसंचार उद्योग भी देश के अन्य उद्योगों की तरह देश में व्याप्त बिजली संकट के कारण अपनी सेवाओं को चालू रखने के लिए भारी मात्रा में डीज़ल का उपयोग अपनी टावरों को चलाने में करता है जिससे एक तरफ़ उसकी परिचालन लागत बढ़ जाती है वहीं दूसरी तरफ़ इससे पर्यावरण को भी सतत नुकसान पहुँचता रहता है. आने वाले वर्षों में बिजली की इस समस्या से छुटकारा मिलने की उम्मीद नहीं दिखाई दे रही है तो इस स्थिति में अगर इन टावरों को वैकल्पिक ऊर्जा पर चलाया जाए तो इससे वास्तव में बहुत सारी समस्याओं से बचाव किया जा सकता है.
           भ्रष्टाचार ने देश में जिस स्तर पर पाँव पसार रखे हैं उस स्थिति में इन मोबाइल टावरों को चलाने में भेजे गए डीज़ल की कालाबाज़ारी भी बड़े पैमाने पर होती रहती है जिससे जहाँ दूरसंचार कम्पनी के पैसे तो खर्च हो जाते हैं पर दूर दराज़ के क्षेत्रों में लगे टावरों में रात के समय सिग्नल इस डीज़ल चोरी के कारण गायब ही रहते हैं. जिस तरह से इस पूरे मसले में तेल का खेल चलता रहता है उसे देखते हुए इस पर लगाम लगा पाना इन कम्पनियों के लिए बहुत ही मुश्किल काम है क्योंकि हर जगह पर काम करने के लिए ईमानदार व्यक्ति मिल ही जाएँ इस बात की क्या गारंटी है ? सबसे बड़ी बात यह भी है कि आज कि सब्सिडी के दर से देखा जाये तो इस डीज़ल की खपत पर सरकार को हर साल लगभग २७३ करोड़ रूपये की बचत भी हो सकेगी जो उसके द्वारा डीज़ल पर आवश्यक कार्यों के लिए दी जाती है. देश में संसाधनों का ग़लत जगह पर इस्तेमाल किये जाने की पुरानी परंपरा रही है और आज भी इस मसले पर कोई सोचना भी नहीं चाहता है जिस कारण से भी इस तरह की समस्याएं भी बहुत बड़ी होती जाती हैं और उनसे निपटने के लिए जब सोचना शुरू किया जाता है तब तक देर हो चुकी होती है. 
           इस पूरे मसले पर अब सरकार को ही कोई कड़ा कदम उठाना पड़ेगा क्योंकि कोई भी कम्पनी अपनी मर्ज़ी से इस व्यवस्था को लागू नहीं करना चाहेगी क्योंकि इसमें शुरुआत में बड़े पैमाने पर निवेश की ज़रुरत होगी जो कि आज के समय बढ़ती प्रतिस्पर्धा और लागत के कारण कोई भी कम्पनी नहीं करना चाहेगी ? सरकार को इस क्षेत्र में अपनी डीज़ल पर दी जाने वाली सब्सिडी को इस तरह से व्यवस्थित करना चाहिए जिससे यह धनराशि इन कम्पनियों को वैकल्पिक ऊर्जा के विकास और ढांचागत सुधार में उपलब्ध करायी जा सके. इससे जहाँ एक तरफ़ कम्पनियों की परिचालन लागत कम होगी और दूसरी तरफ़ सरकार को डीज़ल पर सब्सिडी से होने वाला घाटा भी सही दिशा में लगकर आने वाले वर्षों में बचत के रूप में वापस मिल जायेगा. इसके लिए सरकार को एक लक्ष्य निर्धारित कर देना चाहिए जिससे हर वर्ष एक निश्चित संख्या में टावरों को वैकल्पिक ऊर्जा से चलाने के लक्ष्य को पाया जा सके. इसके लिए सबसे पहले दूर दराज़ के क्षेत्रों से शुरुवात करनी चाहिए जिससे इनकी संभावनाओं पर भी विचार किया जा सके और पर्यवार को भी सुधारने में मदद मिल सके.    
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