मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Thursday, 20 September 2012

१९७१ के सिपाही ओमान में ?

                    भारत-पाक के बीच हुए निर्णायक १९७१ युद्ध के बारे में आज भी बहुत सारे नए नए तथ्य सामने आते रहते हैं क्योंकि आज भी भारत का पाक पर यही आरोप है कि उसने १९७१ के युद्ध के दौरान हिरासत में लिए गए ५४ युद्ध बंदियों को कहीं छिपा कर रखा हुआ है और इस बात की पुष्टि अब ओमान में काम करके वापस आने वाले एक व्यक्ति ने भी कर दी है. ओमान में बढई के तौर पर काम करने के लिए गए सुखदेव सिंह ने बताया कि उसे उच्च सुरक्षा वाली मसीरा जेल में काम करने के लिए भेजा गया था जहाँ उसकी मुलाक़ात पंजाब रेजिमेंट के सिपाही जसपाल सिंह से हुई जिन्होंने बताया कि १९७१ की लड़ाई में पाक ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया था और ५ वर्ष अपने यहाँ की जेलों में रखने के बाद उसे और उसके कुछ साथियों को ओमान की जेलों में भेज दिया गया था. पाक हमेशा से ही किसी भी अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करने वाले देशों में शामिल रहा है और संभव है कि उसने १९७१ के उन लापता युद्ध बंदियों को इसी तरह से इस्लामी देशों की जेलों में भेज दिया हो जिससे उनके बारे में बाक़ी दुनिया को पता ही न चल सके.
          पाक से मानवाधिकारों के सम्मान की बात की अपेक्षा नहीं की जा सकती है क्योंकि उसने अपने गठन के समय से ही मानवीय मूल्यों को कोई तरजीह नहीं है अब इतने वर्षों बाद उससे यह आशा भी नहीं की जा सकती है कि वह कुछ बदल जायेगा ? युद्धों में दुश्मन देशों के सैनिकों को बंधक बनाया जाता ही रहता है और साथ ही उनके मानवाधिकारों का उल्लंघन न होने पाए इस बात के लिए भी अन्तराष्ट्रीय स्तर पर कुछ नियम बनाये गए हैं जिनके अनुपालन की अपेक्षा सभी देशों से की जाती है. पाक के सामने तो यह मजबूरी रही होगी कि वह इन कैदियों को अपने यहाँ कैसे छिपाए पर ओमान जिसके साथ भारत के रिश्ते कभी भी ख़राब नहीं रहे हैं उसने इस तरह की कार्यवाही में शामिल होना क्यों स्वीकार कर लिया यह बात समझ से परे है ? क्या पाक के ओमान और अन्य इस्लामी देशों के साथ इस तरह के कोई अघोषित समझौते हैं जिनके तहत इस्लामी देश अपने को बचाने के लिए इस तरह से एक दूसरे के क़ैदियों को अपने यहाँ की जेलों में रखते हैं ? अगर ऐसा है तो यह मानवाधिकारों और अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का खुला उल्लंघन है और इस बारे में अब संयुक्त राष्ट्र में भारत को अपने नागरिकों के पक्ष में आवाज़ उठानी ही चाहिए.
        पाक से इस मसले पर किसी भी तरह की आशा नहीं की जा सकती है क्योंकि जब खुलेआम हुए मुंबई हमलों के दोषी कसाब को जिंदा पकड़ने के बाद भी पाक इस पूरे हमले में अपनी संलिप्तता से इनकार ही करता रहता है तो ४० वर्ष पुराने किसी भी मामले में वह अपने को कैसे दोषी साबित करवाना चाहेगा ? पाक की इस हरकत से एक बार फिर यह बात साबित हो गयी है कि पाक किसी भी तरह से विश्वास करने लायक देश नहीं है क्योंकि उसके पास कानूनों को तोड़ने में महारत है और वह अपने देश या अन्य किसी देश के साथ इस तरह से कानून तोड़ने वाली घटनाओं में निरंतर लगा ही रहता है. इस बात का खुलासा होने पर निश्चित तौर पर भारत उन ५४ युद्ध बंदियों के बारे में फिर से पाक से बात करेगा पर अब जब ये सैनिक पाक में हैं ही नहीं तो इनके बारे में सीधे ओमान से बात करनी चाहिए और उससे अपने संबंधों का लाभ लेते हुए किसी तरह से इन युद्ध बंदियों को वापस लाने का प्रयास किया जाना चाहिए. अगर वे किसी अन्य मामले में ओमान में बंद किये गए हैं तो उसके बारे में भी जानकारी लेकर आगे की कार्यवाही की जानी चाहिए जिससे अब जीवन के अंतिम दौर में इन सैनिकों के लिए भारत में जीने की राह खोली जा सके.  
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