मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Friday, 7 December 2012

केजरीवाल और अन्ना

               सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने एक बार फिर से अरविंद केजरीवाल पर अविश्वास जताते हुए कहा है कि उन्होंने अपनी राजनैतिक महत्वकांक्षा के चलते ही इस महत्वपूर्ण आन्दोलन में फूट डाल दी और आज़ादी के बाद पहली बार इतने बड़े स्तर पर चल रहे जनांदोलन को नुकसान पहुँचाया है. किसी हद तक क्या अन्ना का यह कथन पूरी तरह से सही है क्योंकि जिस तरह से उन्होंने महाराष्ट्र में छोटे छोटे आन्दोलन चलाने के स्थान पर दिल्ली से बड़ा आन्दोलन चलाने का प्रयास किया था उसमें अरविन्द समेत बहुत सारे लोगों का बहुत बड़ा योगदान था पर व्यवस्था से लड़ना और उसे बदलना एक बात है और व्यवस्था को खुद बढ़कर संभाल लेना बिलकुल दूसरी बात है. इस पूरे मामले में केंद्र सरकार ने शुरू में इन आन्दोलनकारियों और बाबा रामदेव को पूरा सम्मान दिया पर अपनी अपने राजनैतिक महत्वकांक्षा के चलते इनमें से अधिकतर लोगों ने अपने लिए अलग अलग रास्ते चुन लिए जिससे पूरे आन्दोलन का बंटाधार हो गया और व्यवस्था परिवर्तन का एक बड़ा सपना जो सच होता दिखाई देने लगा था एक बार फिर से सबकी आँखों से ओझल हो गया. किसी भी व्यवस्था परिवर्तन के लिए उसमें शुद्धिकरण आवश्यक है पर अपने को दूसरों से अलग साबित करने की होड़ में हम यह भूल जाते हैं कि हम सभी का मार्ग भले ही अलग अलग हो पर संघर्ष एक बात के लिए ही है.
           मीडिया के भरोसे बड़े शहरों में मोमबत्ती जलाकर जनजागरण करना आसान है पर जब दूर दराज़ के गाँव में जाकर अपने लिए वोटों का जुगाड़ करना पड़ता हैं तो सबकी बोलती बंद हो जाती है. ऐसा भी नहीं है कि इस डर से कोई परिवर्तन के लिए आगे नहीं आएगा पर जब परिवर्तन की बात करनी हो तो खुद की महत्वकांक्षाएं किनारे रखनी ही पड़ती हैं जो कि बाबा रामदेव और अरविन्द केजरीवाल नहीं रख पाए. दिल्ली में होने वाले विधान सभा चुनावों में अरविन्द कुछ सीटें जीत भी सकते हैं क्योंकि दिल्ली में उनके समर्थकों का एक बड़ा वर्ग तैयार हो चुका है पर उस वर्ग को वोटिंग के लिए बूथों तक कैसे पहुँचाया जायगा यह अब बड़ा प्रश्न है. देश का यही दुर्भाग्य है कि जिन लोगों के हाथों में देश का भविष्य सौंप कर सुरक्षित किया जा सकता है उनको केवल घरों की बैठकों में ही समर्थन मिला करता है और जिन्हें केवल जाति- वर्ग - और धर्म की राजनीति करनी होती है उनका समर्थन सड़कों पर उतर कर वोट डालकर अपने अनुरूप प्रत्याशियों को जिता लेता है ? देश को सही तरह से वोट करने की क्षमता वाले वोटर चाहिए या भीड़ तंत्र में बदलकर अपने वोटों के दम पर राजनैतिक रोटियां सेंकने की मानसिकता वाले वोटर अभी तक यही नहीं तय हो पाया है.
           निसंदेह केजरीवाल में अन्य लोगों से हटकर काम करने की चाह है और वे अपने आन्दोलन के भरोसे कुछ बड़ा बदलाव लाने का प्रयास भी कर रहे हैं पर जिस तरह से उन्होंने राजनीति में आने में जल्दबाजी दिखाई उससे यही लगता है कि टीवी पर अपने समर्थकों की भीड़ देखकर वे इतना गदगद हो गए कि अब इसके भरोसे ही वे परिवर्तन कर देंगें. दिल्ली के चुनावों में वे खुद और अपने कुछ साथियों को चुनाव जितवा भी सकते हैं पर उससे उन्हें तो विशेषाधिकार मिल जायेंगें पर उस जनता का क्या होगा जो अपने मूल अधिकारों के लिए लड़ने हेतु इनके साथ खड़ी हुई थी ? कहीं ऐसा तो नहीं है कि देश के घाघ राजनेताओं ने अरविन्द को इसी तरह से अपने क्षेत्र में बुलाकर वास्तविकता से रूबरू करवाने का काम किया हो क्योंकि बिना स्वार्थ जनता के मुद्दों को उठाने पर जो समर्थन मिल जाता है वह खुद के लिए वोट मांगने पर नहीं मिल पाता है. राजनीति के बारे में अरविन्द और उनके समर्थकों के लिए सीमित अवसर होने के कारण भी उनका मार्ग कठिन होने वाला है. अच्छा होता कि वे अन्ना की तरह केवल जनता को जगाने का काम करते और पूरे देश में अपने संगठन को व्यवस्था से लड़ने के लिए ज़मीनी स्तर पर तैयार करने का काम करते उसके बाद ही कोई राजनैतिक पहल की जाती तो उसका भरपूर लाभ देश और उन्हें मिल सकता था.          
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