मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Saturday, 12 January 2013

अब गैस कनेक्शन भी पोर्टेबल

                      देश में तेज़ी से बदल रही उपभोक्ता आधारित सेवाओं में सरकारी क्षेत्रों की कम्पनियों की साख़ को फिर से लौटाने के लिए जिस तरह से कई प्रयास किये जा रहे हैं उससे निश्चित तौर पर अंत में उपभोक्ताओं को ही सबसे अधिक लाभ मिलने लगेगा. घरेलू गैस के कनेक्शन को अब जिस तरह से उपभोक्ता अपनी मर्ज़ी की किसी भी गैस एजेंसी में ट्रान्सफर करवा सकने में सक्षम होने वाले हैं उससे उन गैस एजेंसियों पर बहुत बड़ा दबाव आने वाला है जो अभी तक अपने ग्राहकों की बिलकुल भी नहीं सुनती थीं और अपनी ख़राब सेवाओं से उपभोक्ताओं को बराबर परेशान करके रखती थीं. अब उन पर भी अच्छी सेवाएं देने का दबाव आने वाला है क्योंकि जिस तरह से कनेक्शन पोर्टिबिलिटी के बाद अब उपभोक्ताओं को भी यह अधिकार दिया जाने वाला है कि वे एजेंसी की सेवाओं को अपने हिसाब से रेटिंग दे सकेंगें तो नए उपभोक्ताओं या वर्तमान उपभोक्ताओं के लिए भी सही एजेंसी का चुनाव करने में अब कठिनाई नहीं रहने वाली है क्योंकि पहले से ही जब किसी कम्पनी की रेटिंग सभी को पता होगी तो उस आधार पर उपभोक्ता सेवाएं लेकर अपनी रेटिंग भी दे सकेंगे.
             इस पूरे परिदृश्य में जहाँ अंत में उपभोक्ताओं को ही सबसे अधिक लाभ मिलने वाला है वहीं कम्पनियों को भी अब इस बारे में विचार करना होगा कि सही प्रति स्पर्धा के माहौल को बनाये रखने के लिए अब कम से कम तहसील मुख्यालय पर तीनों गैस एजेंसियों के डीलर भी नियुक्त किये जाएँ क्योंकि आज भी अधिकांश जगहों पर केवल एक ही डीलर है जिससे उसके अकेले होने से अधिकांश ग्राहकों को इस नयी सेवा का कोई भी लाभ नहीं मिल पायेगा ? ऐसी स्थिति में यह पूरी क़वायद किसी काम की भी नहीं रहने वाली है क्योंकि जब भी किसी को पोर्टिबिलिटी की ज़रुरत होगी तो उसे नयी एजेंसी कहाँ पर मिलेगी और जब तक यह आधारभूत स्पर्धा नहीं शुरू की जाएगी तब तक कोई भी इस नयी योजना का लाभ नहीं उठा पायेगा. इस स्थिति में अब सरकार को अपनी विभिन्न योजनाओं को गैस डीलरशिप से जोड़ना चाहिए जिससे दूर दराज़ के क्षेत्रों में नयी एजेंसियां केवल उन समूहों को ही मिल पायें जो आर्थिक या सामाजिक रूप से पिछड़े हों इसमें अल्पसंख्यक और अन्य वर्गों को भी शामिल किया जा सकता है पर पूरा लाभ किसी स्वयं सहायता समूह या किसी सहकारी समिति के माध्यम से ही जनता तक पहुँचाने का प्रयास करना होगा क्योंकि केवल किसी एक वर्ग के लिए व्यक्तिगत रूप से आरक्षित होने वाली डीलरशिप को स्थानीय नेता या अधिकारी अपने अनुसार घुमा फिरा सकते हैं.
            एक तरफ़ इस तरह की योजना बनाए जाने से जहाँ पूरे देश में सहकारिता या स्वयं सहायता समूह पर आधारित समाज को बनाने में मदद मिलेगी वहीं दूसरी तरफ़ उन क्षेत्रों में भी एजेंसियां खोली जा सकेंगीं जिन जगहों पर अभी केवल एक ही एजेंसी काम कर रही है. इस एजेंसियों का मक़सद केवल आर्थिक लाभ ही नहीं होना चाहिए क्योंकि अब यदि समाज की भागीदारी इस तरह से सुनिश्चित की जा सकेगी तो इससे जहाँ कमज़ोर वर्गों के लिए सहकारिता और स्वयं सहायता समूह के माध्यम से काम करने की प्रक्रिया समझने में मदद मिलेगी वहीं दूसरी तरफ़ इस वर्ग के लोगों के लिए वास्तव में कुछ ठोस काम भी किया जा सकेगा. किसी भी इस तरह से समाज से जुड़ी हुई योजना को यदि समाज के हाथों में दिया जा सके तो इससे उस भ्रष्टचार पर भी अंकुश लगाया जा सकता है जो कुछ कम लोगों के हाथों में सञ्चालन होने के कारण आम तौर पर भ्रष्टाचार को पनपाता रहता है. केवल बड़े शहरों के लिए ही नई योजनाएँ बनाने से पूरे देश में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं आने वाला है क्योंकि आज भी समाज में बड़े शहरों का प्रतिशत कम ही है और वहां पर मीडिया और अन्य वर्गों के जागरूक होने से इस तरह की धांधली बड़े पैमाने पर नहीं हो पाती है पर देश के असली हिस्से में जहाँ पर कोई किसी बात के लिए चिंतित नहीं होता वहां के लिए इस तरह की योजनाओं को कौन बनाकर उनका सञ्चालन करना चाहेगा ?     
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