मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Monday, 21 January 2013

बीएसएनएल और भारत

                 देश की सार्वजनिक क्षेत्र और लैंडलाइन सेवा देने वाली देश व्यापी दूरसंचार कम्पनी भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) में जिस तरह से प्रबंधन से जुड़ी ख़ामियों के कारण घाटा बढ़ता ही जा रहा है वहीं उसमें आज भी शीर्ष पर फ़ैसले लेने के लिए बैठे हुए लोगों पर इसका कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा है. एक समय में हज़ारों करोड़ का लाभ अर्जित करने वाली कम्पनी में लगातार ग़लत फ़ैसलों के कारण आज यह स्थिति बन चुकी है कि वह सेवाओं में फिसड्डी साबित हो रही है और उसके कर्मचारियों में एक निगम के स्थान पर सरकारी विभाग के रूप में काम करने की मंशा आज भी पली हुई है. यह सही है कि कई सामजिक दबावों के चलते आज भी निगम को देश के उन दूर दराज़ के क्षेत्रों में सेवाएं देनी पड़ती हैं जहाँ पर उनसे कोई आर्थिक लाभ नहीं मिलता है फिर भी देश के सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनी होने के कारण वह अपना दायित्व निभाती रहती है. आख़िर ऐसा क्या रहा कि एक समय अपनी सेवाओं के लिए तत्पर रहने वाले इस निगम में सब कुछ इतना बिगड़ गया कि अब उसके सामने परिचालन को बनाये रखने तक की चुनौती भी आने लगी है कहीं ऐसा तो नहीं कि कुछ लोगों की सोची समझी रणनीति के तहत ही इस भारी भरकम उपक्रम को धीरे धीरे खोखला किये जाने की प्रक्रिया चलायी जा रही है ?
                आज के समय में इसके अतिरिक्त कर्मचारियों का बोझ ही इसके लिए सबसे बड़ी मुसीबत बन चुका है क्योंकि एक समय में जब लैंडलाइन की बहुत आवश्यकता होती थी तो इसमें बड़े पैमाने पर भर्ती की गयी थी पर अब मोबाइल युग के तेज़ी से आने के बाद इसकी लैंडलाइन सेवा पर सबसे बुरा असर पड़ा है पर आज भी पूरे देश के महानगरों को छोड़कर किसी भी जिला मुख्यालय की बात की जाये तो आज भी आधुनिक सेवाओं के लिए संचार निगम के अलावा लोगों के पास कोई विकल्प नहीं है फिर भी इस लाभ की स्थिति से निगम कुछ नहीं कर पा रहा है. इसमें आज की तकनीक के अनुसार दक्ष कर्मचारियों की भर्ती करने को प्राथमिकता देनी चाहिए और पुराने कर्मचारियों के सामने वीआरएस का विकल्प रखा जाना चाहिए. देश में इस निगम का सञ्चालन करने के लिए अधिकारियों की एक अलग टीम भी बनाई जानी चाहिए क्योंकि आज जिले स्तर पर जो भी अधिकारी तैनात हैं वे केंद्र सरकार से प्रतिनियुक्ति पर यहाँ भेजे गए हैं और इन अधिकारियों के तुगलकी फ़ैसलों के कारण भी आज निगम पिछड़ता जा रहा है. सबसे पहले निगम को लैंडलाइन सेवा में सुधार कर अपने नेटवर्क का उपयोग पूरी क्षमता से करने का प्रयास करना चाहिए जिसमें बहुत कम शुल्क पर पूरे देश में अपने नेटवर्क पर नि:शुल्क बात करने की योजना भी शामिल की जा सकती है जिससे खाली पड़े हुए लैंडलाइन नेटवर्क का सदुपयोग किया जा सकेगा और निजी दूरसंचार सेवा प्रदाताओं से मूल्यों के स्तर पर भी कड़ी प्रतिस्पर्धा की जा सकेगी.
               २ जी घोटाले की सबसे बड़ी मार निगम पर ही पड़ी है क्योंकि उसके बाद फिर से भ्रष्टाचार होने के डर से सभी तरह की खरीद प्रक्रिया में ही रोक लग गयी जिसका असर नगम के नेटवर्क को विस्तृत करने और आज के अनुरूप सेवा देने पर पड़ गया. आज भी निगम के पास पूरे देश में ३ जी सेवा देने का अधिकार तो है पर उसके नेटवर्क में ३ जी लायक उपकरण ही नहीं हैं जो उपभोक्ताओं को यह सेवा दे सकें. केवल राजमार्गों और बड़े शहरों तक ही इसकी यह सेवा ठिठक कर रह गयी है जबकि उपभोक्ताओं को यह काफी पहले मिल जानी चाहिए थी. निगम में जब तक कर्मचारियों और अधिकारियों की संख्या का अनुपात ठीक नहीं किया जायेगा तब तक कुछ भी नहीं सुधर सकता है क्योंकि आज के समय में जब केवल बेतार संचार को ही प्राथमिकता दी जा रही है तो लैंडलाइन सेवाओं के लिए तैनात कर्मचारियों के बड़े बोझ को ढोने की क्या आवश्यकता है ? २००० में विभाग से निगम में बदल चुके इस उपक्रम में आज भी सरकारी ऐंठ बाकी बची हुई है जिससे आज केवल उपभोक्ता वहीं पर इसकी सेवाएं ले रहा है जहाँ पर उसके पास कोई विकल्प नहीं है वर्ना बड़े शहरों में तो इसका आधार सिमट ही चुका है. आज भी केवल संचार निगम में ही दम है कि वह देश के पूरे संचार क्षेत्र में लाभ कमाने की मंशा को कहीं से रोक पाए पर आज जिस तरह से इसका सञ्चालन किया जा रहा है तो यह अधिक समय तक नहीं चल पायेगा और आने वाले समय में इसका सरकार द्वारा विनिवेश कर दिया जायेगा और तब उपभोक्ताओं के पास मंहगी सेवाएं लेने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं बचेगा.     
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