मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Thursday, 7 February 2013

लाल बत्ती कोर्ट में ?

                  गोवंशीय पशु तस्करी में आरोपी उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद् के उपाध्यक्ष के सी पाण्डेय की नियुक्ति को चुनौती देते हुए दायर की गई जनहित याचिका पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने राज्य सरकार से इस मामले पर दो हफ्तों में जवाब माँगा है हालांकि इस मुद्दे पर राज्य सरकार की तरफ से कोर्ट में विरोध दर्ज कराया गया पर कोर्ट ने इसे जनहित याचिका के रूप में स्वीकार करके एक तरह से अच्छा ही किया है. अभी तक सभी राजनैतिक दल अपने प्रभावशाली पर चुनावी दंगल में हारे हुए नेताओं को इसी तरह से चोर रास्ते से लाल बत्ती उपलब्ध करते रहे हैं जिसका कोई मतलब नहीं है क्योंकि इस तरह के निगमों और परिषदों से जुड़े हुए अधिकतर काम जब मुख्यमंत्री के स्तर से ही किये जाते हैं तो इन लोगों को फालतू के पद बनाकर वहां पर बैठकर राज्यमंत्रियों का दर्जा दिया जाना किसी भी तरह से उचित नहीं कहा जा सकता है. एक तरफ देश में हर राज्य सरकार अपने खज़ाने के खाली होने का रोना रोती नज़र आती है तो वहीं दूसरी तरफ़ वे इस तरह से राजनैतिक लोगों की नियुक्तियां करके जनता पर और अधिक भार डालती रहती हैं.
          अभी तक जिस तरह से संविधान ने जिस तरह से राज्यों के मुख्यमंत्रियों को इस बात के अधिकार दे रखे हैं कि वे अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए सरकार के बेहतर सञ्चालन के लिए कर्मठ लोगों को अपनी आवश्यकतानुसार इस तरह के पदों पर बैठकर काम करवा सके पर पिछले कुछ दशकों में जिस तरह के रोज़ ही नए नए पद सृजित करके उन पर अपनी पार्टियों के प्यादों को बिठाने का काम शुरू किया जा चुका है उसके बाद संविधान की उस भावना का कोई मतलब ही नहीं रह जाता है जिसके तहत मुख्यमंत्रियों को यह अधिकार मिले हुए हैं ? राजनैतिक कारणों से कई बार अच्छे प्रशासक साबित हो सकने वाले नेता भी चुनाव हार जाते हैं तो उस स्थिति में राज्य सरकारें उन्हें अपने अनुसार विधान परिषदों में नामित कर मंत्री पद दिया करती हैं या फिर उन्हें इस तरह से उन्हें महत्वपूर्ण परिषदों में बैठाया करती हैं पर आज इस पूरी व्यवस्था में जिस स्तर पर ख़ामी नज़र आती है तो वास्तव में इसकी गहन समीक्षा किये जाने की ज़रुरत भी है. कोर्ट ने जिस तरह से इस मामले में पूरे ब्योरे को तलब किया है उससे आने वाले समय में इस तरह की मनमानी करने से संभवतः राज्य सरकारों को कुछ हद तक रोक जा सके.
          बेहतर प्रशासन दिखाने के लिए जिस इच्छा शक्ति कि आवश्यकता होती है आज के नेताओं में उसकी बहुत बड़ी कमी हो गई है क्योंकि पहले एक समय में केवल योग्यता को ही हर जगह एक पैमाने के रूप में माना जाता था पर संक्रमण की राजनीति के चलते आज केवल सत्ता को पैसों के दम पर संतुष्ट कर पाने और चापलूसी करके बड़े नेताओं के करीबी बनकर आज इन पदों का हथियाया जाने लगा है तो उससे अच्छे प्रशासन की क्या आशा की जा सकती है ? देश में हर स्तर पर जिस तरह से सभी लोग अपने कर्तव्यों से मुंह मोड़कर केवल अपने अधिकारों के दोहन में ही लगे हुए हैं आज दिखाई देने वाला कुशासन उसी का नतीज़ा है क्योंकि जब भी कोई इस छोटे रास्ते से आगे बढ़ता है तो वह अपनी चालाकी भरी सोच से आगे बढ़कर कभी भी जनता के हित की बातों में संलिप्त दिखाई नहीं देता है. बेहतर हो कि सभी राजनैतिक दल अपनी इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाएं और बेहतर सरकारें देने में विश्वास करें क्योंकि देश में इस तरह की राजनीति करने के कारण ही आज सरकारों के काम काज में वह धमक नहीं दिखाई देती है जो कभी उन्हें जनता की नज़रों में जननेता के पद तक पहुँचाया करती थी. 
 
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