मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 13 March 2013

लैपटॉप आवश्यकता या वोट ?

                                          समाजवादी चिंतन में परिवर्तन करने के साथ पिछले चुनावों में यूपी की सत्ता पर बैठने वाले अखिलेश यादव के सपनों की परियोजना की उन्होंने लखनऊ में खुद ही शुरुआत की जिसके बाद एक बार यह लगा कि समाजवादी चिंतन में इस बदलाव का प्रदेश और देश की राजनीति पर बहुत अच्छा असर पड़ेगा पर जिस तरह से शुरुवाती समाचार आ रहे हैं उसके अनुसार लखनऊ की सबसे बड़ी कम्प्यूटर मार्केट में इससे लाभान्वित होने वाले छात्र इन्हें बेचने के लिए घूमते नज़र आए और उन्होंने वहां पर दुकानदारों से इसके दाम भी लगवाने के प्रयास किये वे व्यवस्था और आवश्यकता की पूरे तौर पर पोल ही खोलते नज़र आते हैं. यह सही है कि आज के तेज़ी से बढ़ते हुए सूचना तकनीक के ज़माने में यदि विद्यार्थियों को इस तरह की सुविधाएँ सरकार की तरफ से उपलब्ध करायी जाएँ तो आने वाले समय में पूरे प्रदेश में इसका प्रसार बढ़ सकता है पर जिस तरह से आम यूपी वाली मानसिकता के चलते इस तरह की किसी भी सुविधा को बाज़ार में ले जाकर लाभ उठाने की कोशिश की जा रही है उसके बाद इसका क्या हाल होने जा रहा है यह सभी जानते हैं. अखिलेश सरकार के लिए जब कानून व्यवस्था संभालना ही मुश्किल हो रहा है तो वह इस तरह से वितरित किये जाने वाले लैपटॉप को बिकने से कैसे बचा पायेगी ?
                       यह योजना केवल कुछ हद तक युवाओं और पहली बार वोट देने वालों के लिए एक सपना हो सकती है पर जिस तरह से रेवड़ियों की तरह इन्हें बांटा जा वह किसी भी तरह से इन युवाओं की वास्तविक आकांक्षाओं की पूर्ति नहीं कर सकती है क्योंकि जिन्हें आगे बढ़ना है वे आज भी बिना किसी इस तरह के सहारे के भी आगे बढ़कर प्रदेश और देश का नाम आगे बढ़ाने में लगे हुए हैं और जो कुछ नहीं करना चाहते हैं उनके पास कोई भी सुविधा क्यों न हो वे अपनी जगह पर ही रह जाते हैं ? इस योजना में जितना पैसा खर्च हो रहा है उतने खर्च में यदि पहले ब्लॉक स्तर पर उच्च गति की इन्टरनेट सुविधा से युक्त ज्ञान केन्द्रों की स्थापना की जाती और सम्बंधित विद्यालयों के शिक्षकों और इस परियोजना का लाभ उठाने के इच्छुक छात्रों को उनके विद्यालय के परिचय पत्र के आधार पर इनमें प्रवेश दिया जाता तो यह योजना वास्तव में कुछ कर सकती थी पर केवल व्यक्तिगत हितों के लिए इस तरह से कुछ भी करने की कोशिश से समाज का किस तरह से भला हो सकता है यह दिखाई ही देने लगा है. यदि इस धन के हर विद्यालय में एक पूरी तरह से आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित कम्यूटर लैब ही बना दी जाती तो संभवतः उससे भी अधिक लाभ मिल सकता था.
                    आज जब पूरे प्रदेश में बिजली की इतनी समस्या है कि सरकार के बिजली आपूर्ति के सभी दावे खोखले साबित होते जा रहे है तो इस तरह से बिजली से चलने वाले उपकरणों को वितरित करके सरकार क्या साबित करना चाहती है ? जिस यूपी बोर्ड के सफल परीक्षार्थियों को लैपटॉप दिए जा रहे हैं वे किन परिस्थितियों में पढ़ाई कर रहे हैं यह भी सोचने के विषय है पर सरकार को जनता के धन से कुछ भी करने का हक जब जनता द्वारा दे ही दिया जाता है तो जनता के पास इस सब को देखने के आलावा और कुछ शेष बचता भी नहीं है उस परिस्थिति में कोई सुनना भी नहीं चाहता है कि आख़िर क्यों सरकारें इस तरह से सार्वजनिक धन की बंदरबांट किया करती हैं ? इस तरह के व्यक्तिगत लाभ के स्थान पर यदि सरकार सामजिक हितों पर विचार करती तो आने वाले समय में वास्तव में व्यवस्था में बड़ा परिवर्तन दिखाई दे सकता था पर आज केंद्र और राज्य सरकारों में सरकारी खज़ाने पर बोझ का रोना रोने के बाद भी इस तरह से धन लुटाने का काम किया जाता है वह किसी को दिखाई नहीं देता है. देश/ प्रदेश के हित में प्रयास ज़रूरी हैं पर इस तरह से प्रयासों के नाम के नाम पर लाभार्थियों को झुनझुने पकड़ने से किसका हित होने वाला है यह तो समय ही बता पायेगा.         
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