मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 27 March 2013

खेल पर हावी होती राजनीति

                                 श्रीलंका में तमिलों के सिंहलियों द्वारा किये जाने वाले कथित उत्पीड़न के बाद जिस तरह से भारत में छोटे छोटे मुद्दों पर तमिल स्वाभिमान की बातें की जाने लगी हैं उससे यही लगता है कि देश में वोट पाने के लिए अब नेता कुछ भी करने और बोलने के लिए तैयार बैठे हैं. यह बात भी सही है तीन दशकों पहले श्रीलंका में शुरू हुए गृह युद्द से वहां पर व्यापक स्तर पर तबाही हुई है और लिट्टे प्रमुख प्रभाकरन को मारने के लिए चलाये गए अभियान में हज़ारों निर्दोषों को भी अपनी जान से हाथ धोना पड़ा है और आज भी वहां पर तमिल बहुल इलाकों में सेना द्वारा नियमित तौर पर चलाये जाने वाले अभियानों से तमिलों को बहुत असुविधा का सामना करना पड़ता है. भारत के तमिलनाडु में जिस तरह से सभी राजनैतिक दल किसी भी तरह से तमिल हितों की संवेदनशील बातों में आम जनता को उलझाये रखना चाहते हैं उस परिस्थिति में भारत, श्रीलंका, सिंहली और तमिलों सबका बहुत अहित होने वाला है. आज भारत और श्रीलंका के बीच जिस तरह से अविश्वास की खाई चौड़ी होती जा रही है उस स्थिति में अब बड़े स्तर पर राजनयिक और कूटनीतिक उपायों की आवश्यकता है और बिना इस तरह के प्रयासों के आगे बढ़कर इस समस्या से निपटा नहीं जा सकता है.
                                 क्रिकेट के नाम होने वाले धन के खेल आईपीएल में चेन्नई में होने वाले मैच में तमिलनाडु सरकार ने श्रीलंकाई खिलाड़ियों के आने पर अनुमति न देने कि जो शर्त रखी और पैसों की लालची बीसीसीआई ने जिस तरह से घुटने टेकते हुए उनकी इस मांग को मान लिया वह भारत जैसे किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए बहुत शर्मनाक है क्योंकि खेलों में इस तरह से राजनीति का समावेश करने वालों के लिए कुछ नीति तो अवश्य ही होनी चाहिए ? यदि तमिलनाडु सरकार इस तरह का प्रतिबन्ध लगाने की बात करती तो बोर्ड को चेन्नई में होने वाले सभी मैचों को वहां से हटाने के बारे में सोचना चाहिए था क्योंकि आज के समय हमें खेलों में इस तरह की राजनीति का हर स्तर पर विरोध करना ही चाहिए क्योंकि बिना सही प्रतिरोध के समाज में पनप रहे इस तरह के तत्वों पर रोक लगाने के स्थान पर हम अनजाने में ही उनको बढ़ावा देने की तरफ बढ़ते जा रहे हैं और हो सकता है कि कल वो किसी दिन श्रीलंका के खिलाड़ियों के भारत आने पर ही अपना दखल देना शुरू कर दें ? २००९ में सरकार द्वारा सुरक्षा न दे पाने की स्थिति में जब पूरा आईपीएल देश से बाहर जा सकता है तो खेल के प्रति एकजुटता दिखाने के लिए चेन्नई को मैदानों की सूची से क्यों नहीं हटाया जा सकता है ?
                             इस मुद्दे पर बोर्ड को जिस तरह से सोचना चाहिए था उसमें वह पूरी तरह से असफल रहा है और उन टीमों के साथ यह खेल की भावना का प्रदर्शन भी नहीं किया गया है जिनमें श्रीलंका के खिलाड़ी खेलते हैं क्योंकि यदि अच्छा खेलने वाले किसी खिलाड़ी को केवल चेन्नई में होने वाले मैच के दौरान बाहर बिठाया जाता है तो वह भी किसी तरह से खेल की मूल भावना के साथ न्याय नहीं होगा ? किसी टीम के महत्वपूर्ण खिलाड़ी के बाहर बैठने पर उसके साथ किस तरह से न्याय हो पायेगा यह पैसों की चमक में खेल की भावना को भूल चुके बोर्ड और राजीव शुक्ल ने कहीं से भी स्पष्ट नहीं किया है ? क्या इस तरह के अनुचित दबावों के बाद दिल्ली डेयरडेविल्स की टीम बिना अपने कप्तान के चेन्नई में कोई मैच खेलकर अपेक्षित परिणाम हासिल कर पायेगी ? अच्छा होता कि इस तरह के दबाव से निपटने में बोर्ड कुछ सख्ती का प्रदर्शन करता और साफ़ शब्दों में यह जता देता कि ऐसी किसी भी हरक़त के कारण किसी भी खिलाड़ी को बाहर बैठाने के स्थान बोर्ड खेल का मैदान ही बदल देगा पर लगता है कि पैसों की चमक में कभी भद्र लोगों के रहे इस खेल में अब अभद्रता पूरी तरह से हावी हो चुकी है ?
       
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1 comment:

  1. तमिलनाडु सरकार ब्लैकमेल कर रही है,होली की हार्दिक शुभकामनाएँ.

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