मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Thursday, 28 March 2013

कारगिल पर मुशर्रफ़ का फ़ख्र ?

                    पाक वापस लौटे ही जिस तरह से तानाशाह मुशर्रफ़ ने कारगिल आपरेशन पर फ़ख्र जताया उससे साफ़ तौर पर यही पता चलता है कि पाक में चाहे वे नेता हों या सेना के अफ़सर सभी में भारत के लिए कितनी दुर्भावना भरी हुई है. एक समय जब पाक को अमेरिका के तलवे चाटने होते थे तो मुशर्रफ़ यह कहा करता था कि यह कश्मीर की आज़ादी के लिए मुजाहिदीन द्वारा चलाया जा रहा अभियान है और उसमें पाक सेना यह कोई अन्य शामिल नहीं है पर अब जब सेना की शक्ति उसके हाथों से जाती रही है तो उसने भी नेताओं वाली भाषा बोलनी शुरू कर दी है जिससे उसे यही लगता है कि आने वाले चुनावों में उसकी मुस्लिम लीग पार्टी को कुछ वोट हासिल हो जाएंगे. अभी तक मुशर्रफ़ ने जिस तरह से मौके के अनुसार अपने रंग बदलने में महारत हासिल की हुई है उस परिस्थिति में यह कहना बहुत ही मुश्किल है कि मुशर्रफ़ एक भरोसे लायक आदमी भी नहीं है तभी शायद पाकिस्तान में स्थित आतंकी संगठनों ने उसके दोगले पन के कारण ही उसे मारने के लिए के फिदायीन दस्ता पहले ही बना लिया है.
                   पाकिस्तान का पूरा का पूरा इतिहास ही इस तरह से अपनों की पीठ में छुरा घोंपने और फ़ख्र करने की कहानियों से ही भरा हुआ है पर मुशर्रफ़ के झूठ को उस समय भी भारत ने साफ़ तौर पर मजबूती से नकारा था और आज भी हर परिस्थिति में भारत यही कहता है कि पाक में पूरा का पूरा तंत्र हर तरह से भारत को अस्थिर करने वाले लोगों से भरा पड़ा है. किसी भी देश का चरित्र वहां के शासकों से ही पता चलता है और इस मामले में पाक ने घात प्रतिघात को शुरू से ही बहुत महत्त्व दिया है जिससे वहां के सभी शासकों ने कमोबेश एक जैसी गति ही पायी है. जिस मुशर्रफ़ को कारगिल के लिए कभी पाक में जनता सर आँखों पर बैठाती थी वह आज अपनी राजनैतिक मजबूरियों के चलते इतना कमज़ोर हो चुका है कि उसे पाक की जनता को यह भी बताना पड़ रहा है कि उसे भी कारगिल पर फ़ख्र है ? पाक में सेना भी जिस तरह से मुशर्रफ़ की सुरक्षा के लिए चिंतित नज़र आ रही है और आने वाले चुनावी माहौल में किसी आतंकी संगठन के लिए मुशर्रफ़ को फिदायीन हमला करके उड़ाने की नीति ने सेना की भी नींद उड़ा दी है.
                   इस पूरे मसले पर अब भारत को अपने कूटनीतिक प्रयासों से अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के सामने यह बात उठाने की कोशिश करनी चाहिए और जिन मंचों पर पाक भारत विरोधी शक्तियों की सहानुभूति बटोर लिया करता है वहां पर भी भारत को इस तरह के तथ्य मज़बूती के साथ जोर शोर से उठाने चाहिए क्योंकि इस तरह से कूटनीतिक मामलों में केवल समय के साथ ही प्रयास रंग ला सकते हैं और अपनी मजबूरी और स्वार्थ के चलते अमेरिका जिस तरह से पाक का आँखें बंद कर समर्थन किया करता है उस पर भी दबाव बनाने के प्रयास होने ही चाहिए. पूरी दुनिया में शायद पाक ही ऐसा देश है जिसे अपनी नाकामियों पर भी फ़ख्र हुआ करता है इससे पहले के भारत के साथ लड़े गए सभी युद्धों के बारे में पाक के बच्चों को आज भी यही पढ़ाया जाता है कि उनमें भारत की करारी हार हुई थी. बड़े होने पर जब इस पीढ़ी को यह पता चलता है कि भारत के साथ हुई हर लड़ाई में पाक केवल हारा ही है तब उनके इतिहास की पोल खुलती है. फिलहाल पाक और उसकी जनता अपनी हार पर फ़ख्र करे या ग़मगीन हो भारत को इससे कोई अंतर नहीं पड़ता है पर आने वाले दिनों में भारत को पाक को अन्य मंचो पर घेरने के लिए यह एक मुद्दा अवश्य ही हो सकता है. 
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