मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Friday, 29 March 2013

ढोलकिया समिति और एयर इंडिया

                           एयर इंडिया के कायाकल्प के लिए भारतीय प्रबंध संस्थान अहमदाबाद के प्रमुख प्रो रवींद्र ढोलकिया की अध्यक्षता में बनाई गयी समिति ने अपनी 46 सिफारिशें सरकार को सौंप दी हैं जिनमें महाराजा के प्रबंधन से जुड़ी समस्याओं पर गंभीर विचार करने के बाद इसको सुचारू रूप से परिचालन लायक बनाये रखने के लिए विभिन्न सुझाव दिए गए हैं. अभी तक जिस तरह से देश में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को बिना किसी ठोस नीति के ही चलाने की एक परंपरा सी रही है और नए वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में अब इस तरह से कुछ भी नहीं चलाया जा सकता है. भारत में भी आज निजी क्षेत्र की कई कम्पनियां हवाई व्यापार में आ चुकी हैं और अपने कुशल प्रबंधन के दम पर ही वे अपने खर्चे निकलने के साथ ही तेज़ी से आगे भी बढ़ती जा रही हैं. विमानन क्षेत्र में पूँजी निवेश की सीमा बढ़ाये जाने के बाद कई विदेशी कम्पनियों की नज़रें भी भारत के तेज़ी से बढ़ते हवाई व्यापार पर पड़नी शुरू हो चुकी हैं उस परिस्थिति में यदि देश की सार्वजनिक सेवा को सुधारने की दिशा में काम नहीं किया जायेगा तो आने वाले समय में इसको बंदी का सामना भी करना पड़ सकता है.
                      सबसे पहले सरकार को इस तरह की विशेषज्ञ समिति के सभी सुझावों को मानने पर विचार करना चाहिए क्योंकि राजनैतिक कारणों से यदि इसी तरह से काम किया जाता रहा तो आने वाले दिनों में महाराज को आकाश छोड़कर ज़मीन पर ही अपना ठौर तलाशना पड़ सकता है. किसी भी सरकारी उपक्रम के साथ देश में सबसे बड़ी यही समस्या है कि वह आरक्षण प्रोन्नति और अन्य मुद्दों पर इस तरह से उलझ जाता है कि परिचालन के सामान्य नियम कहीं ताक पर रख दिए जाते हैं इसका दुष्प्रभाव कम्पनी के परिचालन पर भी पड़ता है. देश में बहुत सारी सेवाएं हैं जिनमें सरकार भरपूर तरह से राजनीति कर सकती है पर आर्थिक और परिचालन सम्बन्धी मोर्चों पर इस तरह की नीतियां अक्सर पूरे तंत्र को ही ले डूबती हैं जिससे कुछ समय बाद पूरी कम्पनी ही संकट में आ जाती है. अब इस तरह की राजनीति से पार पाने की आवश्यकता है क्योंकि केवल बातों के दम पर अब कुछ भी सुधारा नहीं जा सकता है.
                           निजी क्षेत्र से खुली प्रतिस्पर्धा करते समय इस बात पर विचार अवश्य ही किया जाना चाहिए कि व्यापारिक गतिविधियाँ चलाने के लिए जिस व्यापारिक सोच की आवश्यकता होती है उसके बिना किसी भी तरह से प्रगति नहीं की जा सकती है. आज हमारे देश में बहुत सारे काम केवल राजनैतिक संकल्पों को पूरा करने के लिए किये जाते हैं जबकि यथार्थ में उनका कोई मतलब नहीं होता है. लोकतान्त्रिक देश में लोकतान्त्रिक ढंग से चुनी हुई सरकारों को पूरा हक़ संविधान ने दिया है कि वे देश के विकास के लिए इस तरह के आवश्यक क़दमों को उठाकर आगे बढ़ने के बारे में सोचें पर वास्तव में आज जो कुछ भी हो रहा है उससे संविधान की मूल भावना का सम्मान तो हो ही नहीं रहा साथ ही देश के संसाधनों का दुरूपयोग भी किया जा रहा है. इस परिस्थिति से निपटने के लिए देश के पास कोई कारगर तंत्र या व्यवस्था नहीं है जिसके माध्यम से व्यासायिक रूप से किये जाने वाले कामों को व्यावसायिक रूप से सक्षम हाथों में सौंपा जाए और सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियों को व्यावसायिक ढंग से चलने की दिशा में काम किया जा सके.       
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