मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Monday, 22 April 2013

बजट सत्र और सरकार

                      लगभग एक महीने के अवकाश के बाद एक बार फिर से बजट सत्र का दूसरा हिस्सा सरकार के लिए नयी तरह की चुनौतियाँ लेकर सामने आने वाला है. एक तरफ सरकार के पास लंबित बिलों की एक लम्बी सूची है तो साथ ही कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर उसकी नीतियों को आगे बढ़ाने का दबाव भी है पर सत्र के शुरू होने से पहले ही जिस तरह से २जी पर संसदीय समिति की रिपोर्ट लीक होने और लैंड बिल जैसे महत्वपूर्ण बिल भी पारित होने की बाट जोह रहे हैं वहीं दिल्ली में मासूम बच्ची से रेप की घटना होने के बाद सरकार पर फिर से नाकाम होने के आरोप लगने ही वाले हैं. राष्ट्रीय मुद्दों पर जिस तरह से सरकार और विपक्ष के बीच कुछ न कुछ अनावश्यक तकरार बनी ही रहती है वह तो इस बार भी दिखाई ही देगी पर द्रमुक के सरकार से अलग होने के फैसले के बाद अब राज्य सभा में पहले से ही अल्पमत झेल रही सरकार के सामने अब लोकसभा में भी वही संकट आने वाला है. सरकार पर अब सारा दबाव केवल इस अंक गणित को बनाये रखने और अपने कार्यकाल को पूरा करने के बारे में ही सोचना एक मजबूरी होने वाला है.
                        इस पूरे मसले में जहाँ सरकार के ख़िलाफ़ जाते हुए दलों ने अपनी मंशा साफ़ कर दी है वहीं हो सकता है कि कुछ मुद्दों पर संप्रग के बाहर के उन दलों का भी सरकार को समर्थन मिल जाये जो आगामी चुनावों में राजग को भी सत्ता में नहीं देखना चाहते हैं और जो मोदी के नाम पर या तो राजग से दूर हो रहे हैं या फिर समय आने पर वे राजग से पूरी दूरी बना भी सकते हैं ? समय से चुनाव होने में लगभग एक वर्ष शेष रहने के बाद भी जिस तरह से भाजपा ने आक्रामक तरीक़े से मोदी के नाम को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया है उससे भी उसके लिए बहुत तरह की अनदेखी समस्याएं सामने आने लगी हैं क्योंकि मोदी ने अपने दम पर जिस तरह से गुजरात में पार्टी पर अपनी प्रभुता जमा ली है अगर वह उसी रूप में उनको आगे करके बढ़ना चाहती है तो उसे राष्ट्रीय स्तर पर बहुत कुछ सहना और चुप भी रहना पड़ेगा. इस तरह के नए बनते माहौल में जहाँ भाजपा अपने को जीता मान रही है वहीं मोदी विरोधी क्षेत्रीय दलों को अपने पैर जमाये रखने के लिए अब भाजपा के साथ खड़े रहना मुश्किल साबित होने वाला है.
                         सरकार यूपी के धुर दोनों विरोधी दलों सपा-बसपा के संप्रग को समर्थन दिए जाने के कारण भी आश्वस्त है क्योंकि इन दोनों दलों में से कोई भी अभी चुनाव नहीं चाहता है जिससे ये दल ससंद से बाहर चाहे जो कुछ भी करते रहें पर जब भी सरकार गिराने की बात आएगी तब ये किसी न किसी रूप में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में सरकार के मददगार ही साबित होंगें. ममता भले ही सरकार से कुछ मुद्दों पर कितना भी नाराज़ क्यों न हों पर आवश्यकता पड़ने पर वे सरकार को गिराने वाले तत्वों में शामिल होना नहीं चाहेंगीं क्योंकि उन्हें पता है कि वाम दलों के संप्रग के साथ खड़े हो जाने से आगामी किसी भी चुनाव में तृणमूल के लिए परेशानियाँ बढ़ सकती हैं इसलिए वे खुद अपनी तरफ़ से किसी भी मुद्दे पर सरकार गिराने की किसी भी मुहिम को शुरू नहीं करेंगीं. इस तरह के इस माहौल में सरकार भले ही बची रहे और अपना कार्यकाल पूरा कर ले पर केवल सामंजस्य बनाये रखने के प्रयासों के साथ सरकार चलने की किसी भी मंशा से देश कैसे भला हो सकता है यह सोचने का विषय है. हर दल को अपने लिए कुछ वोट ही चाहिए भले ही उसके लिए देश की प्रतिष्ठा और प्रगति पर ही संकट उत्पन्न होता हो ?  
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