मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Sunday, 7 April 2013

फांसी पर नया खेल

                     लगता है कि कानून की कुछ ख़ामियों का सहारा लेकर देश में कुछ लोगों ने कानून का मज़ाक बनाने को ही अपना कर्तव्य मान लिया है क्योंकि वर्षों से फाँसी पाए हुए अपराधियों की लंबित दया याचिकाओं पर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा जिस तरह से प्राथमिकता के आधार पर फैसले लिए गए और यह देश को यह संदेश देने की कोशिश भी की गयी कि कानून से सज़ा पाए इन लोगों ने भले ही किन्हीं कारणों से अब तक मौत न पाई हो पर अब जब इस तरह के मामलों को एक तरह से नए सिरे से सोचकर निस्तारित किया जा रहा है तो उसमें किसी भी तरह का दख़ल बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए. अभी तक जो लोग देश की सरकारों पर राजनैतिक कारणों से फैसले न लेने के आरोप लगाया करते थे वे ही अचानक उन फैसलों के लिए जाने पर ही उँगलियाँ उठाने लगे हैं. कोर्ट की एक प्रक्रिया होती है जिसके अंतर्गत कोई भी वहां जाकर अपनी बात को रख सकता है और यदि उसके तथ्यों में कुछ सार्थक होता है तो कोर्ट उस पर कोई रोक या अंतरिम आदेश भी दिया करती है पर अब जिस तरह से हत्यारों की पैरवी मानवाधिकार के नाम पर करने की एक नई परंपरा डाली जा रही है उसका कोई मतलब नहीं है.
                     संसद पर हमले के आरोपी अफज़ल को फाँसी दिए जाने पर जिस तरह से राजनीति की गयी उसके बाद कोर्ट ने इसी आधार पर इन ८ लोगों की सज़ा पर अमल करने पर ४ हफ़्तों की रोक लगा दी है जिसमें उनके परिजनों को कानूनी तौर पर सूचित किया जा सके और उसके बाद ही उनकी सज़ा पर अमल किया जाए. देखने में तो यह मानवाधिकार का बहुत ही आदर्श मामला लगता है पर जिन लोगों ने ये अपराध किए और दूसरे के अधिकारों के बारे में कुछ भी नहीं सोचा उनके लिए इस तरह की संवेदनाएं क्या मान्यता रखती हैं यह भी सोचने का विषय है ? जिन लोगों ने दूसरे के जीने के अधिकार का भी सम्मान नहीं किया वे चाहे पहली बार के अपराधी हों या दुर्दांत आतंकी उनके बारे में एक बार सक्षम कोर्ट द्वारा सज़ा मिल जाने पर उनको किसी भी तरह के सामान्य अधिकार की सुविधा भी नहीं दी जानी चाहिए और समाज तथा देश के इन दुश्मनों को तुरंत ही फाँसी पर लटका दिया जाना चाहिए.
                       एक बात यहाँ पर और विचार करने योग्य है कि जब लम्बी कानूनी प्रक्रिया के बाद किसी भी सक्षम कोर्ट द्वारा किसी भी अपराधी को मृत्युदंड दिया जाता है तो उसके बाद उस अपराधी को राष्ट्रपति के सामने इस तरह की दया याचिका डालने का अधिकार दिया जाना भी किस तरह से उचित है क्योंकि जब इस तरह के दुर्लभतम मामलों में कोर्ट पहले ही बहुत विचार करने के बाद ही इतना अतिवादी फैसला सुनाती है तो उस पर फिर से विचार करने का अधिकार किसी के पास भी नहीं होना चाहिए और भारतीय संविधान ने जिस तरह से यह अधिकार कहने को तो राष्ट्रपति के हाथों में दिया है पर वे भी गृह मंत्रालय की राय मानने को एक तरह से बाध्य ही हैं क्योंकि राष्ट्रपति आज के कानून के अनुसार अपने दम पर किसी की फाँसी की सज़ा को माफ़ नहीं कर सकते हैं तो फिर इस तरह के मामलों में उनको मोहरा क्यों बनाया जाता है ? कोर्ट द्वारा इस तरह की सज़ा पाए किसी भी व्यक्ति को फाँसी दिए जाने की एक समय सीमा भी निर्धारित की जानी चाहिए जिससे आने वाले समय में इस तरह का नाटक दिखाई ही न दे और भारतीय संविधान की इस तरह की कमियों को दूर करने की दिशा में भी प्रयास आरम्भ किए जा सकें. 
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

1 comment:

  1. न्याय प्रक्रिया को लम्बा खिचने से किसी को लाभ नही होने वाला,बेहद प्रभावशाली प्रेरक आलेख.

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