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Friday, 26 July 2013

मुठभेड़ और पुलिस

                             बटला हाउस में छापेमारी के दौरान हुई मुठभेड़ को अदालत ने जिस तरह से लम्बी बहस और गवाहों के बयानों के बाद सही और असली पाया है उससे देश में केवल वोट के लिए कुछ भी कहने और करने वालों के लिए एक मुद्दा हाथ से निकलता सा लगता है क्योंकि अभी तक हमारी पुलिस जिस तरह से पूरे देश में पुलिस फर्ज़ी मुठभेड़ों के लिए कुख्यात रही है उस स्थिति में कोर्ट ने इस बार पूरे साक्ष्यों के आधार पर यह बात कही है. किसी भी सुरक्षा दस्ते के लिए इस तरह से किसी सुरक्षित स्थान में छिपे हुए अपराधियों से निपटना हमेशा से ही कठिन चुनौती रहा है पर जब इस तरह की किसी भी घटना को राजनेता या समाज के कथित मानवाधिकार वादी फर्जी घोषित करने की कोशिश करने में लग जाते हैं तो उसका पुलिस के मनोबल के साथ पूरे समाज पर ही बुरा असर पड़ता है क्योंकि इससे जहाँ अनावश्यक सामजिक विभाजन होता है और सामान्य जनता भी पुलिस पर बिना बात के संदेह करने लगती है पर जिस तरह की स्थितियों में पुलिस को काम करना पड़ता है उसमें वह और क्या कर सकती है ?
                           इस पूरे प्रकरण को जिस तरह से राजनेताओं द्वारा फर्ज़ी घोषित करने की तरफ़ इशारा करना शुरू कर दिया था उसके बाद इसमें विवाद तो होना ही था और सबसे ग़लत बात जो इसमें की जाने लगी कि राजनैतिक बयानबाज़ी करके कोर्ट के नतीज़ों को प्रभावित करने की चेष्टा की गई उसका देश के पास कोई जवाब नहीं है. आज कुछ कथित मानवाधिकार वादी अपने को कोर्ट और कानून के साथ संविधान से भी ऊपर मानने लगे हैं और बिना मांगे जिस तरह से वे हर बात में अपनी टांग अड़ाने की कोशिशें करते रहते हैं उससे कहीं न कहीं उनका ही नुक्सान होता है क्योंकि उनके हर मामले में इस तरह से अनर्गल प्रलाप करने से उनकी समाज में स्वीकार्यता घटती है और आने वाले समय में उनके लिए काम करने का मार्ग और कठिन भी हो सकता है जिससे उन लोगों की मदद भी समय से नहीं हो पाएगी जिन्हें इसकी वास्तव में ज़रुरत होगी ? इस तरह से ये नव मानवाधिकार वादी आख़िर क्या साबित करने की कोशिश में लगे हैं कि सरकार और कानून देश में कुछ नहीं कर सकते हैं ?
                           पुलिस के सामने किसी भी स्थान पर छिपे आतंकियों से लोहा लेना कितना कठिन होता है यह सभी जानते हैं क्योंकि अन्दर बैठे हुए आतंकियों को यह पता होता है कि बाहर से पुलिस द्वारा क्या क़दम उठाए जा रहे हैं पर पुलिस उनकी नज़र में होने के साथ अपने बचाव की कोशिश में भी लगी रहती है क्या उन पुलिस कर्मियों के वहां जाने मात्र से ही उनके मानवाधिकार निरस्त हो जाते हैं क्या उनके पास आत्मरक्षा में गोलियां चलाने का अधिकार नहीं होता हैं ? केवल पुलिस या सैन्य सुरक्षा बल में भर्ती हो जाने से ही उनके सभी वे अधिकार निरस्त हो जाते हैं जो उन्हें एक मानव होने के नाते मिलने ही चाहिए ? यह सही है कि अपराधियों को पकड़कर लम्बी कानूनी प्रकिया से बचने के लिए बहुत बार पुलिस उनको मौके पर मार देना भी उचित मानती है जिसे किसी भी तरह से सही नहीं ठहराया जा सकता है पर इसका मतलब यह भी नहीं होता है कि पुलिस हर जगह ग़लत ही होती है क्योंकि इसी पुलिस के दम पर उन नेताओं को पूरी सुरक्षा मिलती है और वह पूरे देश में बहुत सारे अच्छे काम भी किया करती है. यहाँ पर पुलिस के हाथ पाँव बाधकर उससे अपराधियों, नक्सलियों या आतंकियों पर नियंत्रण पाने की लालसा करना कहाँ तक उचित है जब आतंक का दानव पूरे देश में अपने पैर पसारने में लगा हुआ है ?       
                        
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