मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 4 September 2013

सुरक्षा झमेले और कोर्ट

                                         सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ ने लालबत्ती और सुरक्षा के नाम पर किये जाने वाले उपायों पर नाराज़गी जताते हुए सरकार से यह पूछा है कि किसी एक व्यक्ति की सुरक्षा के लिए आख़िर किस तरह से इतने लोगों को लगाया जा सकता है ? कोर्ट ने परोक्ष रूप से आसाराम मसले पर हैरानी जताते हुए कहा कि टीवी पर इतने दिनों से दिखाया जा रहा है कि एक व्यक्ति की सुरक्षा के नाम पर कितना बल अनावश्यक रूप से लगा हुआ है. कोर्ट द्वारा लालबत्ती और सुरक्षा उपायों के दुरूपयोग पर सुनवाई के दौरान जिस तरह से अपनी मंशा ज़ाहिर की उससे सरकार और सुरक्षा के तामझाम को पसंद करने वालों के लिए अब एक नयी मुसीबत सामने आने वाली है कोर्ट ने दिल्ली की एक कोर्ट के जज द्वारा अपनी पंजाब यात्रा के दौरान सुरक्षा की मांग किये जाने पर भी उतनी ही नाराज़गी जताई और कहा कि प्रोटोकाल के अनुसार चलने की ज़िम्मेदारी हम सभी की है और इसमें किसी भी तरह से ढील नहीं दी जा सकती है फिर भी रोज़ ही यह देखने में आता है कि नियमों को ताक पर रखकर सुरक्षा देने में सरकारें कोताही नहीं करती हैं.
                                        कोर्ट ने किसी भी आरोपी के लिए लगायी जाने वाली अनावश्यक सुरक्षा पर भी हैरानी जताई और कहा कि आजकल जिस तरह से सरकारें किसी अभियुक्त पर इतनी सुरक्षा लगा देती हैं उसका भी कोई औचित्य नहीं होता है इसलिए इस मामले में सभी सरकारों को एक घोषित नीति का अनुपालन करना चाहिए. कोर्ट ने इस बात पर भी टिप्पणी की कि जिस तरह से अपराधी अब धर्म और राजनीति का सहारा लेकर इस तरह से समाज में अपनी पैठ बना लेते हैं और बाद में समाज को अपनी तरफ़ करने का काम करते हैं जबकि किसी को भी कानून इस तरह का काम करने की अनुमति नहीं देता है. इस बारे में अब समाज को ही सचेत होने की आवश्यकता है क्योंकि जब तक आम नागरिक ही इस तरह के तत्वों से खुद को दूर नहीं रखना चाहेगा तब तक कोई भी कानून या सरकार इस मसले पर कुछ ख़ास नहीं कर सकती है क्योंकि आज भी अपराधियों द्वारा जिस तरह से समाज में अपनी घुसपैठ को मज़बूत किया जा रहा है वह आने वाले समय में देश के लिए घातक ही है.
                                         इस मसले पर किसी भी सरकार या सुरक्षा एजेंसी के लिए जो कुछ भी आवश्यक है वह नियमों से ही तय किया जा सकता है पर कोई भी नियम अपने आप में निरापद नहीं हुआ करते हैं और उनका दुरूपयोग करने वाले कहीं न कहीं से उनकी कमियों को खोज कर अपने हितों को साधने का काम शुरू कर दिया करते हैं ? ऐसे में अब जब बड़े राजनैतिक दल और धर्म से जुड़े स्थानों में इन अपराधियों का प्रवेश हो जाता है तो वे अपने बाहुबल का इस्तेमाल कर अपने लिए एक ऐसी व्यवस्था बना लेने में सफल हो जाते हैं जिसमें समाज के एक बड़ा हिस्सा भी उनके साथ जुड़ जाया करता है और सरकार के लिए किसी भी विपरीत परिस्थिति में कानून के अनुसार काम करने में बहुत बड़ी बाधा आने लगती है ? इन लोगों के अंध समर्थकों को समझा पाने में कोई भी सफल नहीं हो सकता है क्योंकि वे अपने इन आदर्शों के लिए कुछ भी करने के लिए तत्पर हो जाते हैं ? अब यह समय आ चुका है कि समाज भी अपनी ज़िम्मेदारी को समझे और किसी भी अनैतिक या गैर कानूनी काम करने में लिप्त किसी भी कितने भी महत्वपूर्ण व्यक्ति को कानून के चंगुल से दबाव बनाकर छुडाने की किसी भी नीति पर चलने की कोशिश न करे और साथ ही सरकार भी पहले पूरी तैयारी करे और तभी इन लोगों पर हाथ डाले जिससे समाज में इनके दुष्प्रभाव को कम किया जा सके.     
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